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निजता का अधिकार एवं जीवन का अधिकार अविच्छेद्य हैं।
Date:05-12-17
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भारतीय जेलों की स्थिति खेदजनक है। यद्यपि भारतीय जेलों में कैदियों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित रखे जाने हेतु कानून है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उनकी गरिमा का मानमर्दन कर दिया जाए। निजता के अधिकार संबंधी पीठ ने प्रेम शंकर शुक्ला का संदर्भ देते हुए कहा :‘‘हमारे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में मानवीय गरिमा की बात कही गई है। किसी इंसान को हथकड़ी पहनाना उसका अपमान करने से अधिक है।’’ जब एक साधारण कैदी को हथकड़ी पहनाना असाधारण माना जा सकता है, तो अपंगता से जूझ रहे व्यक्ति के साथ ऐसा किया जाना कितना कठोर है।
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मानवीय विविधता के प्रति सम्मान
उच्चतम न्यायालय यह भी स्पष्ट करता है कि भारतीय नागरिकों को अपने मानवीय पक्ष से संबंधित जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को आत्मसमर्पित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के इन अधिकारों पर समग्र रूप से या अलग-अलग परिस्थितियों के हिसाब से विचार करे। किसी संदर्भ में व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अबाधित किए जाने का अर्थ यह न लगाया जाए कि उसने अपने जीवन के अधिकार का समर्पण कर दिया है।
जिस प्रकार से निजता के अधिकार को मानवीय गरिमा का अभिन्न अंग माना गया है और इसका संबंध जीवन के संरक्षण से भी है, उसे देखते हुए लगता है कि न्यायालयों को समाज के निःशक्तजनों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करनी चाहिए। यह हर्ष की बात है कि मानवीय विविधता और बहुलवाद के प्रति ऐसे सम्मान से जुड़े न्यायालय के इस निर्णय को कानून का रूप दे दिया गया है।प्रोफेसर साईबाबा के मामले में अपंगता कानून 2013 कहता है कि ‘ऐसे व्यक्त्यिों को हिरासत में रखने की स्थिति में उनकी शारीरिक अखंडता और स्वायत्तता की गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। यह उनके निजता के अधिकार की आत्मा है। उनके निजता के अधिकार की रक्षा न हो पाने की स्थिति में वे जमानत प्राप्त करने के अधिकारी हो जाते हैं।
निजता के अधिकार ने जीवन के अधिकार को सशक्त बना दिया है।
‘द हिन्दू’ में प्रकाशित कल्पना कन्नबिरन के लेख पर आधारित।