ढीली उत्सर्जन नीति से बात नहीं बनेगी
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डॉ. विजय अग्रवाल
भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन और 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करने का लक्ष्य रखा है। 2030 तक के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी दबाव बनाया गया था। हाल ही में इस क्षेत्र में आपसी सहमति दिखाई गई है, जिससे अब लक्ष्य पूर्ति की आगे की राह संभव लग रही है।
मामला क्या है –
भारत में मारुति सुजुकी का छोटी कार सेगमेंट में बड़ा हिस्सा है। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी के ईंधन क्षमता और उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य के लिए छोटी कारों के लिए अलग मानक तय कर दिए गए थे। इससे बड़ी कारों के निर्माता कड़े लक्ष्यों में फंसे हुए थे। फलत: कीमत और निवेश के मामले में वे तुलनात्मक रूप से नुकसान में थे। लेकिन अब ब्यूरो ने छोटी कारों के लिए वह छूट हटा दी है।
भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के कुछ विपरीत नियम –
- हमारे यहाँ ग्रीनहाउस गैस कार्बन उत्सर्जन का तीसरा बड़ा स्रोत है। इसको कम करने के लिए कार्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिंशिएंसी लक्ष्य में 113 ग्राम सीओटू प्रति कि.मी. से घटाकर 2031-32 तक 77 ग्राम किमी. तक करने की सहमति है। लेकिन इस प्रस्ताव का डिजाइन बहुत लचीला है। इससे इलेक्ट्रिक कारों की ओर होता बदलाव धीमा हो सकता है।
- इथेनॉल की मिलावट, स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम, रीजनरेटिव ब्रेकिंग, और टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सुधार उपयोगी होते हुए भी बहुत मामूली हैं। साथ ही ये निर्माताओं को इलेक्ट्रिक कारों के बुनियादी लक्ष्य को पूरा किए बिना भी उत्सर्जन में कमी को पूरा करने में सहायता करते हैं।
- ब्यूरो ने सुपर-क्रेडिट का भी प्रस्ताव दिया है। इसमें तकनीक अनुपालन को कई बार गिना जा सकता है। ऐसा भी तरीका है, जिससे तकनीकी क्षेत्र में आगे आने वाले कार-निर्माता अपने अतिरिक्त क्रेडिट जमा कर सकते हैं, और उन्हें पिछड़ी हुई कंपनियों को बेच सकते हैं।
- इसके अलावा अनुपालन का मूल्यांकन सालाना के बजाय तीन साल में किया जाना है। यह निर्माताओं को समय के साथ प्रदर्शन का औसत निकालने के तरीके देता है। इससे तुरंत दबाव कम होता है, और नियमन से मिलने वाला प्रभाव भी कमजोर पड़ता है।
जीवाश्म ईंधन में उतार-चढ़ाव के समय, यह नीति सार्थक बदलाव लाने में बहुत कमजोर लगती है। अधिक प्रोत्साहन दिए बिना इस नीति से उत्सर्जन कम होने के कोई आसार नहीं दिखते हैं। यह केवल कागजों पर ही सिमट कर रह जाएगा।
(‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित 25/04/26)