08-07-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
Kerala’s Silver Linings Playbook for India
ET Editorials
India has long romanticised its youth bulge and ‘demographic dividend’. But an irreversible demographic pivot is already underway. Senior citizens currently make up over 10% of our population, a figure projected to nearly double to 19.5% by 2050. Against this backdrop, Kerala’s 2026-27 budget, and its decision to establish a dedicated department of elderly welfare — a national first — is a landmark intervention. This institutional milestone signals a major paradigm shift: viewing senior citizens not as a passive welfare burden but as the cornerstone of a vibrant, active silver economy.
Kerala’s new policy framework targets 3 core pillars: build dedicated elderly parks, fitness centres and day-care centres to promote independent living. Concurrently, it aims to unlock long-term economic growth by utilising the vast knowledge and professional experience of seniors through entrepreneurship and structural social participation. To ensure these policies align with real-world needs, government will conduct a statewide survey among senior citizens to form a data-driven roadmap for future welfare programmes. The national urgency for creating such supportive structures is stark. Longitudinal Ageing Study in India (LASI) paints a grim picture of our systemic gaps: 75% of our elderly suffer from chronic diseases; 70% rely on others for daily maintenance; and a staggering 78% live without any pension.
India must urgently replicate this policy and structural focus. If the state — which is wrestling with a massive 5.07 lakh cr debt burden and committed expenditures that swallow 77% of its revenue — can pioneer a dedicated silver economy, no other state across India can ever use fiscal constraints as an excuse to ignore its ageing demographics.
Grand ambitions
India’s cooperative sector can serve as a worker-centric model of development
Editorial
Hypercompetitive business models that dominate the economic lives of people have undesirable social consequences. The cooperative model offers an alternative, albeit with its own imperfections. India’s Ministry of Cooperation, which completed five years on July 6, is a bold experiment in harnessing the potential of this approach. Traditionally confined largely to agriculture, cooperatives now have the opportunity and a requirement to expand into other sectors, particularly services. Cooperatives, by their very character, are relatively small-scale and fragmented; organising them, and connecting them to the broader economy that disproportionately rewards hyper-scalers is a balancing intervention — an economic, political and social imperative. The Ministry aims to transform the cooperative landscape by bringing policy coherence across agriculture, dairy, fisheries, banking, housing, consumer cooperatives, and exports. This requires collaboration with States and national federations, capacity building, wise use of digital technology, and market linkages. Primary Agricultural Credit Societies (PACS) are the foundation of rural cooperatives. Through a reformed legal framework, they have been empowered to undertake over 25 business activities, transforming them into multifaceted institutions delivering many economic services in rural India.
The Ministry has facilitated new national-level multi-State cooperative societies, expanding market access for members and strengthening cooperative value chains from production to global markets. Cooperative enterprises are being encouraged to grow and compete, and a National Cooperation Policy is in the making. But there are challenges amid the opportunities. Corruption and inefficiency eroded the potential of India’s cooperative sector, and the fear of local communities and States losing control of cooperatives to a national-level mechanism needs to be assuaged. The task is in finding the sweet spot of consolidation and decentralisation; localisation and nationalisation; technology and human labour, for boosting the sector. Union Home Minister Amit Shah, who holds the portfolio, is pushing the cooperative sector to expand into production and marketing, beyond agricultural credit and input facilitation, which could help mitigate the sector’s endemic crisis. A well-coordinated, yet federated, cooperative sector can offset the social, environmental and political costs of global capitalism, which is the default model of the economy. Government and business leaders worldwide are viewing cooperatives with renewed interest, as the pitfalls of hypercapitalism become pronounced. India can develop its cooperative sector as a global model.
इथेनॉल के लिए मक्का एक बेहतर विकल्प होगा
संपादकीय
देश में चावल बहुत मात्रा में है- दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन, सबसे ज्यादा निर्यात, इस साल कुल पैदावार 154 मिलियन टन खाने, फ्री बांटने और निर्यात करने के बाद भी रिजर्व लेवल से चार गुना बच जाता है। लिहाजा सरकार ने पर्यावरण, तेल संकट और सस्ता देशी विकल्प तलाशने के ध्येय से 20% ई-ब्लेंडिंग शुरू की। लेकिन नीतिकारों ने यह नहीं सोचा कि चावल पैदा करने की परोक्ष और प्रत्यक्ष कीमत और पर्यावरणीय क्षति कितनी होती है। एक किलो चावल पैदा करने में 4000 लीटर पानी खर्च होता है। इसका आधा तो एक्विफायर सिस्टम में वापस हो जाता है लेकिन बाकी बर्बाद हो जाता है। इसके लिए खाद, बिजली और राज्यों द्वारा दी गई एक्स्ट्रा सब्सिडी जोड़ ली जाए तो यह बेहद महंगा पड़ता है। दूसरा कारण है धान बोने की गलत (पुनर्रोपण) विधि और समतल रोपाई, जिससे पानी पौधे से ज्यादा जमीन में जाता है। ऐसे में आज से बायोफ्यूल बनाने के लिए मक्का बेहतर विकल्प हो सकता है। गन्ने से भी एथेनॉल बनाना सही विकल्प नहीं, क्योंकि इसमें भी पानी का दोहन बहुत होता है। गन्ना महाराष्ट्र या दक्षिण भारत के राज्य ज्यादा पैदा करते हैं, जहां पानी का स्तर पहले ही काफी नीचे है। बिहार, बंगाल, यूपी गन्ने के उत्पादन के लिए बेहतर राज्य हैं, लेकिन चीनी मिलें लगीं हैं महाराष्ट्र और कर्नाटक में। वहीं मक्का पैदा करने में एमपी, बिहार और कर्नाटक आगे हैं लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन बिहार, आंध्र, बंगाल में ज्यादा है। अन्य राज्यों को भी मक्का की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
Date: 08-07-26
‘डिजिटल इंडिया’ में बच्चों की सुरक्षा भी सरकार की जिम्मेदारी
विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील )
बच्चों के यौन शोषण के मामले में यूपी के एक जूनियर इंजीनियर और उसकी पत्नी को विशेष अदालत ने फरवरी 2026 में फांसी की सजा सुनाई थी। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार इंस्टाग्राम ने भी धन लेकर रिकमेंडेशन एल्गोरिदम के माध्यम से बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को भारत में बढ़ावा दिया है। पर इस पर मुकदमा दर्ज करने के बजाय सरकार ने मेटा कम्पनी से एक सप्ताह में जवाब भर मांगा है। इस मामले से जुड़े 5 पहलुओं की समझ जरूरी है।
1. बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए मई 2017 में महिला एवं बाल विकास, गृह, कानून, आईटी, विदेश और दूरसंचार मंत्रालय की अंतर-मंत्रालय समिति का गठन हुआ था। मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर के राज्यसभा में दिए जवाब के अनुसार सोशल मीडिया में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार पॉक्सो, आईटी और बीएनएस कानूनों के अनुसार गम्भीर अपराध है। दोषियों को सजा के लिए 774 फास्टट्रैक अदालतों का गठन हुआ है।
2. नीट में पेपर लीक रोकने के लिए टेलीग्राम पर रोक लगी थी। दिल्ली हाईकोर्ट में सरकार ने कहा था कि टेलीग्राम से नकल माफिया, आतंकवाद, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, वित्तीय धोखाधड़ी, डिजिटल अरेस्ट और साइबर अपराध के मामले बढ़ रहे हैं। फेसबुक, वॉट्सएप और इंस्टाग्राम के 154 करोड़ ग्राहकों वाला भारत मेटा कंपनी के लिए सबसे बड़ा बाजार है। ऐसे में यौन शोषण के संगठित अपराध से बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाने वाली मेटा पर भारी जुर्माने के साथ आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
3. बच्चों के यौन शोषण और चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े मामलों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ईयू में टेक कम्पनियों के खिलाफ आपराधिक मामलों के साथ जुर्माना वसूलने के मामले चल रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट में अटाॅर्नी जनरल ने कहा था कि वॉट्सएप में सिम बाइंडिंग होने से साइबर अपराधों में कमी आएगी। लेकिन टेक कम्पनियों की लाॅबीइंग के बाद दूरसंचार मंत्रालय ने नियम पालन की समय-सीमा बढ़ा दी। फरवरी 2026 में आईटी इंटरमीडियरी नियमों में हुए बदलावों के अनुसार इंस्टाग्राम वाले मामले में 2 घंटे के भीतर कार्रवाई करने के बजाय उसे जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है।
4. विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस गेब्रेयेसुस और फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने डिजिटल जगत में बच्चों को बचाने के लिए अपील की है। दिल्ली हाईकोर्ट के 23 अगस्त 2013 के आदेश के अनुसार 13 से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया जॉइन नहीं कर सकते। 2021 में ट्विटर के खिलाफ गाजियाबाद पुलिस की एफआईआर के साथ दिल्ली पुलिस का नोटिस जारी हुआ था। भारत के नियमों का पालन नहीं करने वाली टेक कंपनियों की सेफ हार्बर की सुरक्षा खत्म करने के लिए आईटी मंत्री राजीव चन्द्रशेखर ने अक्टूबर 2023 में संसद में बयान दिया था। उसके अनुसार इंस्टाग्राम के नामांकित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
5. बांदा के इंजीनियर दम्पती को फांसी की सजा देते हुए बाल यौन शोषण अपराध को जज ने रेयरेस्ट ऑफ रेयर कहा था। पॉक्सो में दर्ज हजारों मामलों में लोगों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत नहीं मिल रही है। दिल्ली के 16600 स्कूलों और आंगनबाड़ी में बच्चों की सुरक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाई जा रही है। वहीं दूसरी ओर बाल यौन शोषण को बढ़ावा देने वाले इंस्टाग्राम, उसके विज्ञापनदाता और चाइल्ड पोर्नोग्राफी सम्बंधी वीडियो का प्रसार करने वाले संगठित अपराधियों के खिलाफ आपराधिक मामला तक दर्ज नहीं किया जा रहा है। इससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय होने के साथ कानून के शासन की भी बुनियाद कमजोर हो रही है।
Date: 08-07-26
99% आबादी की समस्याओं को 1% “सुपर-रिच’ हल कर सकते हैं
ज्यां द्रेज, ( प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री )
हाल ही में पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की, जिसका नाम ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट है। वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब एक शोध-समूह है, जिसका नेतृत्व प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी करते हैं। इस रिपोर्ट में आज दुनिया के सामने मौजूद दो गंभीर संकटों- जलवायु परिवर्तन और आर्थिक विषमता से निपटने की बात की गई है।
जलवायु परिवर्तन तो हमारे अस्तित्व के लिए ही एक गंभीर खतरा है। पृथ्वी हर साल गर्म होती जा रही है। औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में पृथ्वी का तापमान अब तक 1.5 डिग्री बढ़ चुका है। गर्मी बढ़ने की मौजूदा गति से यह जल्द ही 3 डिग्री तक पहुंच सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो तापमान 5 डिग्री या उससे भी ज्यादा बढ़ सकता है। तब भारत में बिहार और यूपी जैसे इलाकों में जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा। ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बंद करके उनकी जगह पवन और सौर ऊर्जा को अपनाना होगा। यह संभव है, लेकिन इसके लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। अमीर और गरीब देश इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं कि इसका खर्च किस तरह बांटा जाए।
दुनिया के सामने एक और बड़ा संकट आर्थिक असमानता का बढ़ना है। एक छोटा-सा वर्ग बेहद अमीर हो गया है और उसकी संपत्ति हर साल बढ़ती जा रही है। दुनिया में लगभग 3,000 लोगों के पास एक अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति है। यह बहुत बड़ी रकम होती है- लगभग 10,000 करोड़ रुपए। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क की संपत्ति तो ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गई है। यह 100 लाख करोड़ रु. के बराबर है।
अत्यधिक केंद्रित धन लोकतंत्र के लिए एक खतरा है। अति-अमीर लोग मीडिया, राजनीतिक दलों, चुनावी नतीजों और सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं। जब सरकारी नीतियों पर उनकी पकड़ होती है, तो वे उन्हें अपने फायदे के हिसाब से मोड़ देते हैं। वे प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफा कमाने के लिए पर्यावरण संबंधी नियमों को कमजोर करते हैं। यह प्रक्रिया अमेरिका में साफ दिखाई देती है। भारत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है।
ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट इन दोनों संकटों- ग्लोबल वार्मिंग और आर्थिक असमानता से बचने की योजना पेश करती है। इस योजना का मुख्य आधार एक ग्लोबल जस्टिस फंड है, जिसे वैश्विक धन-कर (ग्लोबल वेल्थ टैक्स) से वित्तपोषित किया जाएगा। इसके तहत 20 लाख डॉलर से अधिक संपत्ति वाले हर व्यक्ति को धन-कर देना होगा। यह 1% प्रति वर्ष से शुरू होगा और धीरे-धीरे बढ़कर उन लोगों के लिए 20% तक पहुंच जाएगा, जिनकी संपत्ति 50 करोड़ डॉलर से अधिक है।
ग्लोबल जस्टिस फंड का उपयोग इस तरह किया जाएगा कि दुनिया के सभी देश 2100 तक नई आर्थिक व्यवस्था तक पहुंच सकें। इस व्यवस्था में सभी देशों की प्रति व्यक्ति आय आज के अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के आसपास होगी। काम के घंटे घटाकर रोज केवल तीन या चार घंटे कर दिए जाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बहुत बड़ा विस्तार होगा। और ऊर्जा परिवर्तन की मदद से ग्लोबल वार्मिंग का अंत हो जाएगा।
चौंकाने वाली बात है कि 1% से भी कम आबादी वाले अति-अमीर लोगों पर कर लगाकर इतना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। कई लोग कहेंगे कि इसे राजनीतिक रूप से लागू करना संभव नहीं है। लेकिन अगर यह योजना दुनिया की 99% आबादी के लिए फायदेमंद है, तो इसे राजनीतिक रूप से लागू करना मुश्किल क्यों है? कारण, बाकी 1% लोग बहुत प्रभावशाली हैं। वे वैश्विक धन कर को लागू नहीं होने देंगे। यही आज की दुनिया में लोकतंत्र की स्थिति है।
जवाबदेही की जरूरत
संपादकीय
डिजिटल मीडिया कंपनियों मेटा और गूगल की ओर से जिस तरह यह कहा गया कि उनके लिए विवादित सामग्री की निगरानी करना संभव नहीं, वह एक तरह से जवाबदेही से बचने का बहाना ही है। यह पहली बार नहीं है, जब स्वयं को सोशल मीडिया कहने वाली कंपनियों ने फर्जी, भ्रमित करने, अफवाह, उत्तेजना और वैमनस्य फैलाने वाली खबरों की निगरानी करने के मामले में अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की हो। वे ऐसी कोशिश लगातार करती चली आ रही हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के अनेक देशों को उन्हें जवाबदेह बनाने के लिए तरह-तरह के कदम उठाने पड़ रहे हैं। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि येन-केन-प्रकारेण अधिक से अधिक लोगों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने और पैसा कमाने के लिए डिजिटल मीडिया माध्यम ऐसे तौर-तरीके अपना रहे हैं, जिसके चलते वे बेलगाम हो रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि डिजिटल मीडिया कंपनियां नियंत्रण से बाहर हो रही हैं, बल्कि यह भी है कि वे लोगों को लती बनाने के साथ उन्हें और विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही हैं। यही कारण है कि एक के बाद एक देश ऐसे कानून बनाने को बाध्य हो रहे हैं जिससे किशोरवय के लोग उनका उपयोग न कर सकें। चिंता की बात यह भी है कि डिजिटल मीडिया कंपनियां अश्लील एवं आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। अभी पिछले दिनों ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इंस्टाग्राम के स्वामित्व वाली कंपनी मेटा को ऐसे सभी विज्ञापन एवं अन्य सामग्री हटाने का आदेश दिया था, जो यौन शोषण को बढ़ावा देती है। इसी तरह कुछ दिन पहले टेलीग्राम को इसके लिए नोटिस दिया गया कि वह अपने प्लेटफार्म से पायरेटेड फिल्मों और ओटीटी कंटेंट के प्रसार को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से कदम उठाए।
टेलीग्राम लंबे समय से पायरेसी को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। यह वही इंटरनेट प्लेटफार्म है जिस पर कुछ दिनों पहले इसलिए अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगाना पड़ा था, क्योंकि उससे मेडिकल प्रवेश परीक्षा-नीट के प्रश्नपत्र लीक होने का खतरा पैदा हो गया था। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अपराधी एवं आतंकी तत्व भी डिजिटल प्लेटफार्म का इस्तेमाल करने में लगे हुए हैं। भले ही डिजिटल मीडिया कंपनियां यह दावा करती रहती हों कि वे नकारात्मक एवं आपत्तिजनक सामग्री की छानबीन करने और उन पर रोक लगाने के लिए सचेत हैं, लेकिन वस्तुस्थिति इससे विपरीत है। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि डिजिटल मीडिया कंपनियों को जबाबदेह बनाने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं। उन्हें जवाबदेही के दायरे में लाना ही होगा, क्योंकि अब वे एआइ का भी बेजा इस्तेमाल कर रही हैं।
Date: 08-07-26
मजबूत होती भारत की प्रशांत कूटनीति
अनिल वाधवा, ( स्तंभकार पूर्व राजदूत तथा भारतीय उद्योग परिसंघ की आस्ट्रेलिया आर्थिक रणनीति रिपोर्ट के लेखक हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया के साथ आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं नए सिरे से गठित हो रही हैं, तकनीकी प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है, ऊर्जा व्यवस्था एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और समुद्री सुरक्षा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आज भारत ऐसे भरोसेमंद साझेदारों की तलाश में है, जो उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने में सहयोगी बन सकें, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता पर कोई प्रभाव न पड़े। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इस दृष्टि से भारत के स्वाभाविक साझेदार हैं। दोनों लोकतांत्रिक देश हैं, समुद्री शक्ति रखते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिर, खुली तथा नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थक हैं।
पिछले एक दशक में आस्ट्रेलिया भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल हो चुका है। क्वाड के माध्यम से दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार गहरा हुआ है और रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी तथा आपूर्ति शृंखलाओं जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के सोच में भी व्यापक समानता दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी की आस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और व्यापक बनाने पर जोर रहने की संभावना है। आस्ट्रेलिया के पास लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार हैं, जिनकी आवश्यकता इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी निर्माण, सेमीकंडक्टर उद्योग और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के लिए अनिवार्य है। भारत यदि हरित ऊर्जा, उन्नत विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है तो इन संसाधनों तक दीर्घकालिक और भरोसेमंद पहुंच सुनिश्चित करना उसकी रणनीतिक आवश्यकता है। नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए यूरेनियम आपूर्ति, हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग भी दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दे सकता है। दोनों देशों के बीच वार्षिक व्यापार 25 अरब डालर से अधिक हो चुका है। भारत-आस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते ने व्यापार को नई गति दी है, जबकि अवसंरचना, खनन, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में आस्ट्रेलियाई निवेश लगातार बढ़ रहा है। अब आवश्यकता व्यापक आर्थिक साझेदारी के माध्यम से निवेश और व्यापार के लिए और अधिक अनुकूल वातावरण तैयार किए जाने की है।
यदि आस्ट्रेलिया भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का सुरक्षा स्तंभ है तो न्यूजीलैंड आर्थिक और तकनीकी सहयोग का नया द्वार खोल सकता है। हाल में संपन्न भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते ने दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा दी है। फिलहाल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 2.4 अरब डालर है, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं की क्षमता की तुलना में काफी कम है। भारत विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जबकि न्यूजीलैंड कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वानिकी, जैव प्रौद्योगिकी, शिक्षा और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट विशेषज्ञता रखता है। जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों के बीच न्यूजीलैंड का अनुभव भारत की कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उच्च शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग भविष्य की साझेदारी को और मजबूत करेगा। द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में 20 अरब डालर के निवेश का संकल्प भी व्यक्त किया है।
भारत के आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ संबंधों की एक ताकत दोनों देशों में बसे भारतीय मूल के लोग हैं। आस्ट्रेलिया में लगभग दस लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जबकि न्यूजीलैंड में भी भारतीय समुदाय तेजी से प्रभावशाली होता जा रहा है। व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और सार्वजनिक जीवन में उनका योगदान दोनों देशों के बीच एक मजबूत मानवीय सेतु बन चुका है। पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। नेताओं के बीच व्यक्तिगत विश्वास भी द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देता है। प्रधानमंत्री मोदी और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच विकसित हुई समझ ने दोनों देशों की साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वहीं न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ होने वाली वार्ता दोनों देशों के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र रहेगा। ऐसे में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ मजबूत होते संबंध भारत को केवल इस क्षेत्र में प्रभावशाली उपस्थिति ही नहीं देंगे, बल्कि उसे एक अधिक सुरक्षित, समृद्ध और आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Date: 08-07-26
उपभोक्ताओं को मिले विकल्प
संपादकीय
भारत का एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम एक अप्रत्याशित विवाद का विषय बन गया है। इसके उद्देश्य को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। यह सही है कि पेट्रोल में 20 फीसदी एथनॉल मिलाने से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है, हमारी ऊर्जा सुरक्षा बेहतर होती है और देश के स्वच्छ ईंधन लक्ष्यों को मदद मिलती है। लेकिन हालिया विवादई20 (20 फीसदी एथनॉल मिश्रण) को लेकर है और यह स्वयं एथनॉल मिश्रण पर नहीं बल्कि इसे लागू किए जाने के तरीके पर केंद्रित है। सरकार ई20 के बचाव में तमाम साक्ष्य पेश कर रही है। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), इंडियन ऑयल और वाहन विनिर्माताओं के तकनीकी अध्ययनों में उच्च एथनॉल मिश्रण से व्यापक इंजन क्षति या उसमें गंभीर रूप से जंग लगने का कोई संकेत नहीं मिल सका है। इसके साथ ही अध्ययनों ने यह भी स्वीकार किया कि वाहन मालिकों को हो रहे अनुभव भी गलत नहीं हैं। पहला, एथनॉल भीर का कम उष्मीय मान (कैलोरिफिक वैल्यू) ईंधन की दक्षता को कम करता है जिससे उनके माइलेज में कमी आती है। दूसरा, पुराने वाहनों के कुछ कलपुर्जे ई20 के कारण तेजी से खराब हो सकते हैं। अध्ययनों ने यह भी संकेत किया कि पुरानी ईंधन प्रणालियों में लगे रबर के कुछ कलपुर्जे ई20 के साथ कमजोर प्रदर्शन करते हैं और समय के साथ उन्हें बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है।
देश की सड़कों पर इस समय करोड़ों ऐसे वाहन हैं जो ई20 के लिए अनुकूल इंजन और फ्यूल सिस्टम बनने के पहले से चल रहे हैं। इन वाहनों के मालिकों के पास अब उस ईंधन का प्रयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है जो उनके वाहनों के अनुकूल है ही नहीं। पुराने वाहनों के मालिकों को इस ऊर्जा बदलाव की लागत उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है जबकि उन्हें कोई सार्थक विकल्प नहीं दिया गया।
यदि ई20 के साथ-साथ ई10 की उपलब्धता जारी रहती तो नए मानक से पहले बने वाहनों वाले उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बहुत कम पड़ता। एथनॉल की मात्रा में भविष्य में किसी भी वृद्धि के लिए ऑटो विनिर्माताओं को आवश्यक समायोजन करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। ब्राजील जैसे एथनॉल का इस्तेमाल करने वाले परिपक्व बाजारों ने दिखाया है कि उपभोक्ताओं को अलग- अलग ईंधन विकल्प देना महत्त्वाकांक्षी मिश्रण लक्ष्यों के साथ पूरी तरह संगत है। 1975 में एल्कोहल समर्थक कार्यक्रम की शुरुआत से, उस देश को एक स्थिर ई20 पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में पांच दशकों से अधिक का समय लगा, और अब यहां मानक ई30 पेट्रोल मिश्रण चलता है। वास्तव में ब्राजील ने फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को अपनाने में तेजी लाई जिससे मोटर चालकों को ईंधन पंप पर जो भी ईंधन सस्ता हो, उसे चुनने की स्वतंत्रता मिली।
एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हाल ही में चावल के दाने से बनने वाले एथनॉल के विस्तार में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिशेष चावल से एथनॉल बनाना शामिल है और यह कृषि नीति में गहरी खामियों को दर्शाता है। सरकार चावल को ऊंची आर्थिक लागत पर खरीदती है, उसे भारी सार्वजनिक खर्च पर संग्रहित करती है और फिर उसे एथनॉल उत्पादकों को भारी छूट पर बेच देती है। इसको आर्थिक आधार पर उचित ठहराना मुश्किल है। पर्यावरणीय तर्क भी उतना ही कमजोर है। चावल देश की सबसे अधिक जल खपत वाली फसलों में से एक है और मीथेन उत्सर्जन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है एथनॉल उत्पादन की अर्थव्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। जैसे-जैसे मिश्रण लक्ष्य बढ़ते हैं, भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फीडस्टॉक का चयन दक्षता से प्रेरित हो न कि प्रशासनिक सुविधा से प्रमुख कृषि अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया है कि चावल वा गन्ने की तुलना में मक्का दीर्घकालिक फीडस्टॉक के रूप में अधिक उपयुक्त है क्योंकि इसमें सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है और उत्पादकता बढ़ाने की अधिक संभावना होती है। बेहतर बीज तकनीक और कृषि पद्धतियों के माध्यम से पैदावार बढ़ाने से मक्का-आधारित एथनॉल अधिक प्रतिस्पर्धी और कम संसाधन लगाने वाला बन सकता है। इसलिए फीडस्टॉक नीति का ध्यान अधिशेष अनाज के निपटान पर कम और एक कुशल तथा टिकाऊ एथनॉल अर्थव्यवस्था के निर्माण पर अधिक होना चाहिए। भारत के एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को अधिक उपभोक्ता विकल्पों वाला एवं बेहतर आर्थिक तर्क और समझदार फीडस्टॉक नीति द्वारा निर्देशित होना चाहिए।
Date: 08-07-26
डेटा पर नियंत्रण करने वाले ही तय करेंगे भविष्य
अजय कुमार, ( लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष और पूर्व रक्षा सचिव हैं। )
जनवरी में टिकटॉक विवाद को सुलझाने का डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन का निर्णय आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के युग में डेटा संप्रभुता के विरोधाभास को उजागर करता है। उस निर्णय ने अमेरिकी कांग्रेस और सर्वोच्च न्यायालय दोनों द्वारा समर्थित रुख को पलट दिया। हालांकि बाइटडांस ने अपनी हिस्सेदारी निर्धारित सीमा से कम कर दी और अमेरिकी उपयोगकर्ताओं का डेटा ऑरेकल के क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर में स्थानांतरित कर दिया गया, फिर भी उसने टिकटॉक के अनुशंसा एल्गोरिद्म पर नियंत्रण बनाए रखा, जो यह निर्धारित करता है कि अमेरिकी क्या देखते हैं, वे कितनी देर तक जुड़े रहते हैं और उनके व्यवहार को किस तरह से आकार मिलता है। इस समझौते से डेटा के भंडारण का स्थान तो बदल गया, लेकिन उससे जानकारी निकालने वाले व्यक्ति पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि एक बार किसी विदेशी प्लेटफॉर्म के किसी राष्ट्र के समाज में गहराई से समाहित हो जाने के बाद डिजिटल संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना कितना कठिन हो जाता है।
टिकटॉक प्रकरण डेटा के लिए चल रही एक व्यापक वैश्विक प्रतिस्पर्धा की झलक दिखाता है, जिसके परिणाम हमारे समय की किसी भी सैन्य प्रतिद्वंद्विता के समान महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विशाल डेटासेट का उपयोग करने वाले राष्ट्र एआई प्रणालियों के विकास में निर्णायक बढ़त हासिल करेंगे जो अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को आकार देती हैं। लेकिन दांव केवल एआई तक ही सीमित नहीं हैं। जनसंख्या-स्तरीय व्यवहार संबंधी डेटा तक पहुंच रखने वाली कोई विदेशी खुफिया एजेंसी सामाजिक विभाजन और व्यवहार संबंधी कमजोरियों की पहचान कर सकती है, जिससे सोशल इंजीनियरिंग हमले कहीं अधिक प्रभावी हो जाते हैं। वैश्विक डेटा परिदृश्य के दो अलग-अलग स्तर हैं। पहला है अमेरिका-चीन का एकाधिकार। दूसरा स्तर उन मध्यम शक्तियों का है जो एकाधिकार पर अपनी निर्भरता कम करते हुए डेटा संप्रभुता रणनीतियों को मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं। अन्य देश संप्रभु विकल्पों के लिए आवश्यक निवेश विकसित करना अभी शुरू ही कर रहे हैं।
पिछले एक दशक में चीन ने डेटा को एक रणनीतिक संपत्ति में बदल दिया है। इसने भूमि, श्रम, पूंजी और प्रौद्योगिकी के अतिरिक्त डेटा को उत्पादन के पांचवें कारक के रूप में मान्यता दी है, राष्ट्रीय डेटा प्रशासन की स्थापना की है और डेटा की कुछ श्रेणियों को कंपनियों की बैलेंस शीट में संपत्ति के रूप में मान्यता देने की अनुमति दी है। इसके साइबर सुरक्षा और व्यक्तिगत सूचना संरक्षण कानून डेटा के स्थानीयकरण के माध्यम से संप्रभु नियंत्रण को मजबूत करते हैं, जबकि राष्ट्रीय खुफिया कानून राज्य को डेटा तक पहुंच प्रदान करता है।
चीन के विपरीत, अमेरिका ने बाजार-आधारित नवाचार के माध्यम से डेटा के क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाई है। अमेरिकी कंपनियां क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑपरेटिंग सिस्टम और सोशल मीडिया पर अपना दबदबा बनाए हुए हैं, जिनके माध्यम से दुनिया की अधिकांश डिजिटल गतिविधियां संचालित होती हैं।
हालांकि, इसका रणनीतिक प्रभाव समान है: वैश्विक डेटा जिस बुनियादी ढांचे पर मौजूद है, उस पर नियंत्रण। क्लाउड ऐक्ट के तहत अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपने नियंत्रण में मौजूद डेटा, चाहे वह भौतिक रूप से कहीं भी संग्रहीत हो, अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि डेटा संप्रभुता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि डेटा कहां स्थित है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि प्लेटफॉर्म को कौन नियंत्रित करता है।
विदेशी डिजिटल अवसंरचना पर दीर्घकालिक निर्भरता आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम पैदा करती है, जिसकी वजह से देश डेटा संप्रभुता के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपना रहे हैं। इससे चार महत्त्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। पहली, डेटा संप्रभुता अब केवल नियामक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक मुद्दा बन गई है। दूसरी, एक बार विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म गहराई से स्थापित हो जाने पर संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना कठिन हो जाता है। तीसरी, केवल डेटा का स्थानीयकरण ही पर्याप्त नहीं है; डेटा से जानकारी निकालने वाले एल्गोरिदम पर नियंत्रण भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। अंत में, प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है और कार्रवाई करने का समय अब आ गया है।
भारत, जिसे विश्व का सबसे बड़ा डेटा उत्पादक माना जा सकता है, अमेरिकी प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक का भुगतान प्रणालियों के लिए 2018 का डेटा स्थानीयकरण निर्देश और डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने की योजनाएं वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े रहते हुए डिजिटल संप्रभुता को मजबूत करने के देश के दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं। डीपीडीपी अधिनियम, 2023, गोपनीयता, संप्रभु निगरानी और अंतरराष्ट्रीय डेटा प्रवाह को संतुलित करते हुए एक सुविचारित दृष्टिकोण अपनाता है। भारत का सबसे मौलिक योगदान डेटा सशक्तीकरण एवं संरक्षण आर्किटेक्चर/अकाउंट एग्रीगेटर (डीईपीए) ढांचा है। पारंपरिक प्लेटफार्म मॉडल के विपरीत, जहां कंपनियां उपयोगकर्ता डेटा से उत्पन्न अधिकांश आर्थिक मूल्य पर कब्जा कर लेती हैं, डीईपीए व्यक्तियों को वित्तीय या अन्य लाभ प्राप्त करने के लिए अपने डेटा को सुरक्षित रूप से साझा करने में सक्षम बनाता है। सिलिकॉन वैली ने डेटा का मुद्रीकरण करने वाले प्लेटफॉर्म बनाए, यूरोप ने डेटा पर अधिकारों को मजबूत किया और चीन ने राज्य के नेतृत्व वाले डेटा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया।
भारत ने एक ऐसे मॉडल का नेतृत्व किया है जहां व्यक्ति अपने डेटा को नियंत्रित करते हैं। पहले से ही अपनाए जा रहे उपायों के अलावा, भारत डेटा संप्रभुता को मजबूत करने के लिए पांच-स्तंभ वाली रणनीति अपना सकता है। उसे स्वदेशी एआई मॉडल और कंप्यूटिंग क्षमताओं का निर्माण करके इंटेलिजेंस संप्रभुता को आगे बढ़ाना चाहिए, यह मानते हुए कि एआई युग में, इंटेलिजेंस पर नियंत्रण उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि डेटा पर नियंत्रण। उसे जोखिम-आधारित ढांचे के तहत रणनीतिक डेटासेट को वर्गीकृत करना चाहिए और उनमें अलग-अलग सुरक्षा उपाय लागू करने चाहिए। डीईपीए का विस्तार वित्त क्षेत्र से आगे बढ़कर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों तक किया जाना चाहिए। भारत को क्लाउड, एआई, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर को शामिल करते हुए एक संप्रभु डिजिटल प्रौद्योगिकी स्टैक भी विकसित करना चाहिए। अंत में, वह अपने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना स्टैक का लाभ उठाते हुए, डेटा प्रवाह, एआई शासन और डिजिटल वाणिज्य के लिए विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय साझेदारी बनाने में वैश्विक नेतृत्व कर सकता है। डेटा के लिए प्रतिस्पर्धा अभी शुरू ही हुई है। जो लोग केवल डेटा उत्पन्न करते हैं, वे किसी और के भविष्य को बढ़ावा देंगे। जो लोग इसे नियंत्रित करते हैं, वे अपना भविष्य खुद तय करेंगे।
पारदर्शिता का तकाजा
संपादकीय
राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास में कथित गबन का मामला जब से सामने आया है, तभी से इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है। कि इसमें शामिल आरोपियों के खिलाफ उचित कार्रवाई के समांतर एक संपूर्ण पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की कोई गड़बड़ी संभव न हो सके। विडंबना यह है कि इस मामले के खुलासे के बाद जहां न्यास के दायरे में जिम्मेदारी तय किए जाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी, वहां शुरू से आरोपों की दिशा भ्रमित करने की कोशिश होती रही। अब सोमवार को न्यास की एक अहम बैठक के दौरान इसके महासचिव चंपत राय और न्यासी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए और अंतरिम व्यवस्था के तौर पर एक अन्य सदस्य कृष्ण मोहन को महासचिव की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई। निश्चित तौर पर यह कदम विवाद के बीच जिम्मेदारी और आरोपियों के प्रति नरमी बरतने को लेकर उठते गंभीर सवालों की तीव्रता को कम करने की एक कवायद है, लेकिन इस बीच जैसी असहज करने वाली स्थितियां पैदा हुई, उसने आम लोगों के भरोसे को कमजोर ही किया है।
इस संबंध में अब तक सामने आए आरोप-प्रत्यारोपों के बाद स्थिति इतनी उलझ गई है कि जब तक विशेष जांच दल की अंतिम रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक एक तरह की अस्पष्टता कायम रहेगी। विडंबना यह है कि न्यास के जिन लोगों पर इसके वित्त की निगरानी, उसमें पारदर्शिता सुनिश्चित करने और इसकी संपत्तियों की रक्षा करने का दायित्व था, या तो उनके लिए ये तकाजे गैरमहत्त्वपूर्ण थे या फिर वे ही कठघरे में खड़े दिखे। सवाल है कि आरोपों की अनदेखी करके क्या अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा जा सकता है। इतने समय तक किसकी देखरेख या संरक्षण में चढ़ावे की चोरी करने वालों का धंधा बेरोक-टोक चलता रहा? क्या यह उन तमाम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है, जिनकी आस्था की बुनियाद पर ही न्यास का समूचा कामकाज टिका हुआ है? लोगों के भरोसे को ताक पर रख कर पैसों का गबन करने की हरकत कैसे संभव हुई? अब यह देखने की बात होगी कि इस अनियमितता के वास्तविक आरोपियों को कानून के कठघरे में खड़ा करके सजा दिलाई जाती है या नहीं ?”
हालांकि न्यास के नए महासचिव का कहना है कि चंदा चोरी के मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसे सजा दिलाना उनकी प्राथमिकता होगी। निश्चित रूप से सिर्फ इस्तीफा इस मामले का हल नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार कानून के दायरे में एक परिभाषित अपराध है, तो उसके लिए सजा भी निर्धारित है। जांच में जिन लोगों को वास्तव में जिम्मेदार पाया जाएगा, उन्हें कानून के मुताबिक सजा दिलाना इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी होनी चाहिए यो अनियमितता का जैसा स्वरूप सामने आया है, उसके मद्देनजर अब देश भर के लोगों की नजर इस पर रहेगी कि मंदिर में चढ़ावे, खर्च और वित्तीय खातों की निगरानी सहित न्यास के सभी कामकाज के प्रबंधन और संचालन के लिए जो नई व्यवस्था बनाई जाएगी, उसमें संपूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन कमियों को दूर करने लिए क्या किया जाता है, जिसकी वजह से न्यास के कोष में इतनी व्यापक गड़बड़ी की गई। राम मंदिर का दर्शन और वहां दान करना करोड़ों लोगों की आस्था का मामला है। मगर इस समूचे मामले की वजह से आम लोगों के भीतर न्यास को लेकर एक तरह का अविश्वास पैदा हुआ है, उसकी छवि को चोट पहुंची है।
हमारी साझेदारियों में चीन एक बड़ा मुद्दा
एम जे अकबर, ( वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व केंद्रीय मंत्री )
अब ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ (रणनीतिक साझेदारी), या इससे भी बड़ी ‘कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ (व्यापक रणनीतिक साझेदारी) जैसी शब्दावलियां इतनी आम हो गई हैं कि कई द्विपक्षीय समझौतों में इनका असर सिर्फ कूटनीतिक दिखावे तक सीमित रह जाता है। सामरिक ताकत का असली लक्ष्य ये हासिल नहीं कर पातीं। मई 2018 में भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार इंडोनेशिया गए (हालांकि, आज वह ऑस्ट्रेलिया पहुंच रहे हैं)। क्या इसका कोई खास मतलब है? या, बस यह ऐसी बात है, जो खुशनुमा एहसास देती है व एक-दूसरे के अहं को तुष्ट करती है?सिर्फ व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए देश आपसी रिश्तों को यह ऊंचाई नहीं देते। इसके लिए तो सस्ते हवाई टिकट और दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद टैरिफ सिस्टम ही काफी हैं। रणनीतिक साझेदारी, खासकर जब उसमें ‘व्यापक’ जोड़ा जाता है, तो उसका अर्थ होता है, भू-राजनीतिक दायरे में परिभाषित साझा सुरक्षा चुनौतियों पर आपसी सहयोग बढ़ाना।
निस्संदेह, शांति और सद्भाव के आदर्शों पर चलने वाली दुनिया में, दो देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी की बुनियाद किसी तीसरे देश के प्रति दुश्मनी नहीं होनी चाहिए, पर हम वास्तविक दुनिया में रहते हैं, आदर्शवादी दुनिया में नहीं। इस समय चीन और पाकिस्तान अपने सैन्य-आर्थिक संबंधों को सऊदी अरब तक विस्तार देने की कोशिशों में हैं; पिछले तीन हफ्तों में सऊदी मंत्रिमंडल के दो मंत्रियों ने बीजिंग की यात्रा की है। मुमकिन है, इस वक्त सऊदी अरब की प्राथमिकताएं पाकिस्तान और चीन से अलग हों। उसकी रणनीतिक चिंताएं खाड़ी क्षेत्र में ईरान के बढ़ते दबदबे को लेकर होंगी, खास तौर से ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के शर्मनाक प्रदर्शन और इस खित्ते से काफी हद तक (पूरी तरह नहीं) उसके पीछे हटने के बाद। पाकिस्तान का सिर्फ एक मकसद है। वह भारत के साथ टकराव की किसी भी स्थिति का अपने हित में फायदा उठाना चाहता है। उसने चीन और अमेरिका के साथ गोलमोल बातें करके यही किया था और सऊदी अरब के साथ भी वह यही करेगा। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ एक दूसरा मोर्चा भी खोल लिया है, क्योंकि उसका मानना है कि काबुल नई दिल्ली के लिए तुरुप का पत्ता है, जबकि यह उसकी गलतफहमी है और इसका उसे आगे चलकर नुकसान भी होगा, क्योंकि अफगानिस्तान किसी देश का पिछलग्गू नहीं है।
पिछले हफ्ते भारत और जापान ने 2014 में बनी अपनी ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक ऐंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ को और मजबूत करते हुए ‘स्टेल्थ तकनीक’ में सहयोग करने का फैसला किया। इस पर मीडिया में बहुत चर्चा नहीं हुई, मगर यदि यह योजना साकार होती है, तो इसे व्यापक बदलाव लाने वाला कदम माना जाएगा। शायद इसीलिए बीजिंग ने तुरंत बयान जारी किया कि किसी भी गठबंधन का मकसद किसी तीसरे देश को निशाना बनाना नहीं होना चाहिए, जबकि वह खुद ऐसा करता रहा है। जापान इस बात को नजरंदाज नहीं कर रहा कि चीन 2028 तक, या कम से कम इसी दशक में ताइवान पर कब्जा करना चाहता है, जिसकी उसने घोषणा भी कर रखी है। अगर ऐसा हुआ, तो एक ऐसी जंग छिड़ सकती है, जिससे जापान भी बच नहीं पाएगा। भारत जानता है कि चीन के एकीकरण का जो फलसफा राष्ट्रपति शी जिनपिंग बार-बार दोहराते रहते हैं, उसमें भारतीय इलाकों, खास तौर से अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करना भी शामिल है। जाहिर है, मौजूदा हालात ने भारत और जापान के बीच रणनीतिक साझेदारी को अहम बना दिया है।
भारत और इंडोनेशिया ने सोच-समझकर अपने सैन्य सहयोग को मिसाइल, युद्धपोत और तकनीक के स्तर तक बढ़ाया है। आपको लग सकता है कि जब प्रधानमंत्री मोदी का विमान इंडोनेशिया के हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ, तो वहां की वायु सेना ने जो स्वागत किया, वह बस दिखावा था या 30,000 फीट की ऊंचाई पर फोटो खिंचवाने का एक अवसर भर, किंतु मैं इसे ऐसा प्रतीक मानता हूं, जो बढ़ते सैन्य सहयोग के मद्देनजर सोच-विचारकर तैयार किया गया था। दोनों देश समझते हैं कि ऊर्जा और जल-मार्गों पर नियंत्रण के लिए होने वाली वैश्विक जंग का अगला मैदान हिंद महासागर बन सकता है और इस महासागर का सबसे अहम मोड़ या ‘चोक प्वॉइंट’ मलक्का जलडमरूमध्य है। इसी रास्ते से चीन की 80 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं, साथ ही आसियान, जापान, चीन व दक्षिण कोरिया जैसी पूर्वी एशिया की बड़ी ताकतों का व्यापार भी यहीं से होता है। होर्मुज में हुई जंग ने मलक्का जलमार्ग की सुरक्षा-जरूरतों को और बढ़ा दिया है।
अंडमान और निकोबार में नौसेना-सुविधाओं के विस्तार से नई दिल्ली की रक्षा क्षमता में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। अब भारत और इंडोनेशिया को मलक्का जलमार्ग पर वही भू-राजनीतिक बढ़त हासिल है, जो ईरान और ओमान की होर्मुज पर है। ऐसे में, भारत और इंडोनेशिया के बीच रणनीतिक सहयोग महज कूटनीतिक शिष्टाचार या दिखावटी मेल-मिलाप वाला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जरूरत बन गया है। निस्संदेह, इस तरह के शासकीय दौरों के दौरान होने वाली हर बातचीत का ब्योरा संबंधित देशों के प्रवक्ता नहीं बताया करते, पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो के बीच होने वाली बातचीत के एजेंडे में मलक्का का मुद्दा जरूर शामिल रहा होगा। इसलिए, जो बातें प्रच्छन्न हैं, उनको जानना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि दोनों देशों को सहयोग बढ़ाना चाहिए और जब इस क्षेत्र व दुनिया पर संकट आए, तो उन्हें साझा सुरक्षा नीति बनानी चाहिए। ऐसा न करना समझ से परे होगा।
प्रधानमंत्री मोदी का इंडोनेशिया दौरा उनके सबसे अहम दौरों में एक माना जाएगा, खास तौर से अमेरिका द्वारा बिना सोचे-समझे और एकतरफा ढंग से ‘हिंद प्रशांत’ शब्द में बदलाव के बाद। दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने 1990 के दशक में भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ (पूरब की ओर देखो नीति) की शुरुआत की थी, लेकिन जब हम पूरब की ओर देखते हैं, तो हमें सिर्फ आर्थिक अवसर नहीं दिखते, बल्कि सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी दिखती हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एशिया का नक्शा फिर से बदल सकती हैं। अगर भारत और इंडोनेशिया इस बात पर सहमत हों कि मौजूदा व्यवस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, तो एशिया में शांति चाहने वालों को और मजबूती ही मिलेगी।