12-05-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
हमें अब आर्थिक अनुशासन मैं जीना सीखना होगा
संपादकीय
खाड़ी युद्ध से पैदा हुए बहुआयामी संकट के मद्देनजर प्रधानमंत्री की जनता से अपील भले ही पांच राज्यों के चुनाव के बाद आई, लेकिन देश के भविष्य के लिए बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि भारत में तेल के कुंए नहीं हैं यानी इसके लिए विदेशी मुद्रा देनी होती है, लिहाजा लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट से चलें। साथ ही यह भी कहा है कि कोरोना काल की तरह उधमों में वर्क फ्रॉम होम फिर से शुरू किया जाए। देश की माली हालत पर नजर रखने वाली संस्थाओं- आरबीआई, मूडीज, एसएंडपी, वर्ल्ड बैंक, फिच और अब एडीबी – सभी ने भारत की जीडीपी ग्रोथ घटाई है। सरकार ने टैक्स घटाकर तेल के दाम रोके रखे, एमएसएमई के लिए करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये का असुरक्षित लोन देना शुरू किया और अधिकांशतः आयातित खादों की कीमतें नहीं बढ़ने दीं। लेकिन इन सब का प्रभाव यह रहा कि इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य स्थायी विकास मदों में पूंजीगत निवेश की गुंजाइश कम हो गई। अब पीएम की अपील है कि लोग आयातित सामान न खरीदें, मितव्ययिता से रहें, विदेश यात्रा न करें आदि । चूंकि तेल संकट और ऊंचे दामों से ऊर्जा की कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं और इसका अगले कई वर्षों तक प्रभाव पड़ने की आशंका है, लिहाजा यह तो सच है कि बगैर जनता के खर्च- आचरण में बदलाव के स्थिति पर नियंत्रण संभव नहीं । देशवासियों को आर्थिक अनुशासन में जीना सीखना होगा।
Date: 12-05-26
सबसे कटकर नहीं जुड़कर भी बन सकते हैं आत्मनिर्भर
शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
पहले भारतीय बाजार अपने में बंद और अलग-थलग हुआ करता था, लेकिन अब वह वैश्विक व्यापार का अग्रदूत बनता जा रहा है। भारत के बाजार का यह रूपांतरण शायद 21वीं सदी की विश्व-अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव है।
देश ने एक बंद, रक्षात्मक आर्थिक रुख से हटकर बाहर की दुनिया पर नजर रखने वाले, वैश्विक रूप से आक्रामक रवैये को अपनाया है। जो देश कभी वैश्वीकरण का हिचकिचाता हुआ सहभागी हुआ करता था, वो अब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को आकार देने वाली एक आत्मविश्वास से भरी शक्ति बन गया है। दशकों तक भारतीय बाजार लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से परिभाषित होता रहा था।
यह नौकरशाही की जकड़न और भारी शुल्क की घुटन भरी व्यवस्था थी, जिसे विदेशी पूंजी के कथित शोषण से घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए रचा गया था। आजादी के बाद की अधिकांश अवधि के दौरान, भारत की आर्थिक रणनीति आत्मनिर्भरता, आयात सब्स्टिट्यूशन (दूसरों से खरीदे जा सकने वाले सामानों का घरेलू उत्पादन) और वैश्विक बाजारों के प्रति गहरी शंका पर आधारित थी।
हालांकि इस दृष्टिकोण ने औद्योगिक क्षमता के कुछ छिटपुट केंद्र जरूर विकसित किए, लेकिन यह आखिरकार दीर्घकालिक अक्षमता, तकनीकी ठहराव और भारत की आर्थिक क्षमता और उसके प्रदर्शन के बीच एक निरंतर बढ़ती खाई का ही कारण बना था। अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने तो इसे ‘हिंदू विकास दर’ करार दे दिया था।
हमारी अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकीय वृद्धि और बढ़ती जरूरतों के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष करती रही थी। 1991 के उदारीकरण ने रूपांतरण की शुरुआत को चिह्नित किया। भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से खुद को बचाने से लेकर उसमें बढ़-चढ़कर भाग लेने, और उसमें प्रतिस्पर्धा करने तक पहुंच गया।
यह बदलाव आर्थिक रूप से जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही इसका मनोवैज्ञानिक महत्व भी था। खुलेपन की संभावनाओं को अपनाने के लिए भारत को अपनी चिंताओं और असुरक्षा की भावना को त्यागना पड़ा। समय के साथ, वैश्विक व्यापार, पूंजी प्रवाह और प्रौद्योगिकी नेटवर्क में एकीकरण ने विकास की गति, शहरीकरण के पैटर्न और उद्यमी संस्कृति को नया आकार दिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2026 का भारत अपनी बेड़ियों को तोड़कर दुनिया की सबसे खुली और उदारीकृत उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन गया है। यह परिवर्तन एक मौलिक अंतर्दृष्टि से उत्पन्न हुआ और वो यह है कि एक डिजिटलीकृत दुनिया में सच्ची आर्थिक सम्प्रभुता अलग-थलग रहने से नहीं, बल्कि जुड़ने से मिलती है। 1991 के शुरुआती सुधारों ने जहां दरवाजे खोलना शुरू किया था, वहीं भारत ने पिछले वर्षों में व्यवधानों को पूरी तरह से हटा दिया है।
अब भारत हाशिये का खिलाड़ी नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक प्रवाहों में केंद्रीय मंच है। सेवाओं के निर्यात, डिजिटल क्षमताओं और मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं ने हमें ऐसे देश के रूप में स्थापित किया है, जिसके आर्थिक विकल्प हमारी सीमाओं से बहुत आगे तक गूंजते हैं। बहुपक्षीय मंचों के भीतर, भारत ने यूएई, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, यूके और ईयू के साथ ऐतिहासिक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा, न्यूजीलैंड और अमेरिका दोनों ने सैद्धांतिक रूप से समझौतों की घोषणा की है।
इस बदलाव के आधार में भारत सरकार के ‘आत्मनिर्भरता’ के मंत्र की एक सूक्ष्म पुनर्व्याख्या भी है। भारत के नेता अब समझते हैं कि आत्मनिर्भरता वैश्विक जुड़ाव के माध्यम से भी हासिल की जा सकती है, दूसरों से अलग-थलग होकर नहीं। भारत अब विदेशी पूंजी से नहीं डरता है और वह पूर्वी एशिया के पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग समूहों के प्रमुख विकल्प के रूप में उत्सुकता से प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
इस प्रकार, भारत के खुलेपन ने अब एक सामरिक महत्व प्राप्त कर लिया है। जो कभी घरेलू सुधार का एजेंडा लगता था, वह अब एक वैश्विक अवसर बन गया है। उभरते डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और नए व्यापार समझौतों के बीच तालमेल एक ऐसे भविष्य का संकेत देता है, जहां भारत केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि दुनिया के डिजिटल आर्किटेक्चर का भी निर्यात करेगा।
एक बड़े, स्थिर लोकतंत्र, युवा कार्यबल, बेहतर हो रहे बुनियादी ढांचे और एक ऐसे नियामक वातावरण का संयोजन- जो अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ रहा है- भारत को केवल चीन का विकल्प ही नहीं, बल्कि एक बहुध्रुवीय आपूर्ति-शृंखला संरचना में महत्वपूर्ण केंद्र भी बनाता है।
विदेशी पूंजी के विरोध से लेकर उसे आकर्षित करने तक; घरेलू अक्षमताओं से लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता तक- हमारी यात्रा की दिशा स्पष्ट है। भारत अब वैश्विक व्यवस्था में मूकदर्शक नहीं, अपने भविष्य का प्रमुख निर्माता भी है।
संकट का सामना
संपादकीय

पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। ऊर्जा संकट और व्यापार में बाधाओं के कारण पैदा हुई सुनीतियों का दायरा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रा (रुपए) के लगातार कमजोर होने से देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। उधर, अमेरिका और ईरान के तल्ख तेवरों से शांति समझौते पर बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है। ऐसे में अब मौजूदा संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक उपायों को अमल में लाना जरूरी हो गया है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते रविवार को देश की जनता से पेट्रोलियम उत्पादों का संयमित तरीके से उपयोग करने, सोने की खरीदारी से परहेज करने, गैर जरूरी विदेश यात्रा से बचने और स्थानीय वस्तुओं को प्राथमिकता देने का आह्वान किया है। सरकार का मानना है कि इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत दुनिया भर में जारी ऊर्जा संकट का प्रभावी ढंग से सामना कर सकेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, जिससे सरकारी कोष को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलेगी।
इसमें दोराय नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत सौर ऊर्जा के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो गया है, लेकिन देश की जरूरत मुख्य तौर पर अभी भी जीवाश्म ईंधन से पूरी की जा रही है। ऐसे में जरूरी है कि मौजूदा संकट के दौरान आयातित ऊर्जा संसाधनों का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से और वास्तविक आवश्यकता के अनुसार ही किया जाए। गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण होर्मुन जलमार्ग के बंद होने से तेल की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिससे ऊर्जा का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से वैश्विक ऊर्जा कीमतों में हुई बढ़ोतरी से देश की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है, जिस कारण आने वाले दिनों में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं। हालांकि, अभी तक सरकार ने पेट्रोल-डीजल और घरेलू रसोई गैस के दामों को नियंत्रित करने के प्रयास किए हैं, लेकिन संकट गहराने से अब यह सब आखन नहीं होगा। इसके लिए वैकल्पिक उपायों पर गंभीरता से काम करना होगा, ताकि प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके।
प्रधानमंत्री के आह्वान से इस बात के सकित भी मिल रहे हैं कि आने वाले समय में रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं महंगी हो सकती हैं यानी कच्चे तेल से जुड़ी महंगाई, पैकेजिंग सामग्री और ईंधन लागत में बढ़ोतरी के बीच साबुन, डिटर्जेंट, बिस्किट, पैकेट बंद खाद्य पदार्थ और पेय उत्पाद जैसी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। खबरों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करने वाली देश की प्रमुख कंपनियां मुनाफे पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए चरणबद्ध तरीके से दाम बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। प्रधानमंत्री के ये सुझाव कि कोरोना काल की तरह घर से काम करने समेत अन्य तरीकों पर फिर से अमल करना, खाद्य तेल की खपत कम करना और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाना, यह सब मौजूदा संकट की गंभीरता को दर्शाता है। यह सही है कि संकट जब गंभीर हो, तो उससे निपटने के लिए सरकारी उपायों के साथ-साथ आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे उसमें सक्रिय भागीदारी निभाएं। मगर इस सब के बीच यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इस तरह के उपायों का समाज के निचले और मध्य वर्ग की आजीविका पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
Date: 12-05-26
निगमित क्षेत्र की चाल और चुनौतियां
अजय जोशी
देश की अर्थव्यवस्था में निगमित क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह क्षेत्र अब तेजी से वृद्धि और बदलाव के दौर में है। वर्तमान में यह संरचनात्मक परिवर्तनों, तकनीकी एकीकरण और स्थिरता की दिशा में विकास के चरण से गुजर रहा है। इस क्षेत्र में विनिर्माण क्षेत्र सर्वाधिक अहम है। पिछले कुछ वर्षों से इसकी गति धीमी चल रही थी। मगर अब इसके पुनरुद्धार की दिशा में किए गए प्रयासों से विनिर्माण क्षेत्र में तेज वृद्धि देखी जा रही है। नवंबर 2025 तक विनिर्माण क्षेत्र में 8.0 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है।
सरकार की ओर से समय-समय पर जारी आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में इसमें 7.72 फीसद और दूसरी तिमाही में 9.13 फीसद वृद्धि दर्ज की गई है। सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 17 फीसद रहा है। ताजा संशोधित आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण की वृद्धि दर वर्ष 2025-26 में 11.5 फीसद रहने का अनुमान है। भारत का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 17 फीसद से बढ़ा कर 25 फीसद करना है।
निगमित क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन का दौर भी तेजी से चल रहा है। बैंकिंग, खुदरा व्यवसाय, स्वास्थ्य सेवा और सामग्री प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में कृत्रिम मेधा (एआइ) को तेजी से अपनाया जा रहा है। निगमित क्षेत्र में ब्राडबैंड और इंटरनेट उपयोगकर्ता बढ़ रहे हैं। नवंबर 2025 तक ब्राडबैंड ग्राहकों की संख्या एक सौ करोड़ के पार चली गई, जो एक दशक पहले के 13.15 करोड़ से सात गुना अधिक है। देश के 99.9 फीसद जिलों में 5जी की सुविधा है और 5.18 लाख से अधिक बेस स्टेशन कार्यरत हैं। वहीं यूपीआइ लेन-देन भी तेजी से बढ़ रहा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डिजिटल देश है। देश में डेटा की लागत वर्ष 2014 के 269 रुपए प्रति गीगाबाइट से घट कर वर्ष 2025-26 में 8-10 रुपए प्रति गीगाबाइट रह गई है। डेटा सुरक्षा के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम- 2025 में लागू हुए, जिसमें बच्चों के डेटा और गोपनीयता के संबंध में सख्त प्रावधान किए गए हैं।
अब कारपोरेट क्षेत्र में केवल मुनाफे के बजाय पर्यावरणीय और सामाजिक शासन के मापदंडों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इससे हरित ऊर्जा और सतत विकास के क्रियाकलापों में निवेश बढ़ा है। निगमित संस्थाओं में पर्यावरण और समाज के प्रति जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं। निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए बने सीएसआर कोष से इसके लिए व्यय लगातार बढ़ रहा है। कंपनियां पर्यावरणीय पहलों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन और जल संरक्षण आदि पर अधिक खर्च कर रही हैं।
सीएसआर के तहत प्रमुख कार्यों में भुखमरी, गरीबी और कुपोषण को दूर करना, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी प्रमुखता से प्रयास किए गए हैं। अब कंपनियां केवल परियोजना-आधारित व्यय के बजाय, स्थायी विकास के लक्ष्यों को अपनी मूल व्यावसायिक रणनीतियों में शामिल कर रही हैं। कंपनियां पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को अपना रही हैं, ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके। कई संस्थाएं 18 राज्यों में 2,250 गांवों और कस्बों में पांच लाख से अधिक परिवारों को जोड़ते हुए अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों के माध्यम से सतत विकास में योगदान दे रही हैं। इनका प्रमुख जोर पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने पर है।
भारतीय निगमित जगत ने वित्तीय मजबूती के लिए ऋण में भारी कटौती की है, जो वर्ष 2010 के दशक के 67 फीसद से घट कर 2024 में 48 फीसद पर आ गया है। इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है। एनएसओ द्वारा वार्षिक निगमित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण की शुरुआत के साथ, निगमित प्रशासन और डेटा पारदर्शिता में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।
‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा और रेलवे जैसे क्षेत्रों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा को उदार बना कर सौ फीसद तक की अनुमति दे दी गई है। जुलाई 2025 तक विनिर्माण विकास में 5.4 फीसद की वृद्धि देखी गई। 2025 में अप्रैल-अगस्त के दौरान उत्पाद निर्यात 2.52 फीसद से बढ़ कर 184.13 बिलियन अमेरिकी डालर हो गया। देश में आटोमोबाइल उत्पादन 1991-92 के बीस लाख से बढ़ कर 2023-24 में दो करोड़ 80 लाख इकाइयां हो गई हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में कोयला उत्पादन 7.12 फीसद से बढ़ कर 370 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत नई इकाइयों को मंजूरी देकर वैश्विक केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। इन नवीन पहलुओं के परिणामस्वरूप, भारतीय निगमित क्षेत्र न केवल घरेलू मांग को पूरा कर रहा है, बल्कि वैश्विक मूल्य शृंखला में भी एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहा है। इन सभी के बीच देश के निगमित क्षेत्र में इस समय कई तरह की आर्थिक, ढांचागत और नियामक चुनौतियां हैं। इससे विकास और उत्पादकता प्रभावित होती है। विशेष रूप से लघु और मध्य आकार की कंपनियां अपने कारोबार का विस्तार करने, नई तकनीक अपनाने या उत्पाद शृंखला में विविधता लाने के लिए आवश्यक पूंजी की कमी से जूझ रही हैं।
भारत में लाजिस्टिक लागत सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 13-14 फीसद है, जो वैश्विक औसत से अधिक है। खराब परिवहन प्रणाली, अपर्याप्त भंडारण और बिजली की कमी, ये सभी उत्पादन लागत को बढ़ाते हैं। जटिल नियामक ढांचा और नीतिगत अनिश्चितता, भ्रष्टाचार और नियमों में बार-बार बदलाव निवेश को हतोत्साहित करते हंै। अनुसंधान और विकास में कम निवेश के कारण भारतीय उद्योग नवाचार और उद्यमिता के मामले में पीछे हैं। सख्त श्रम कानूनों के कारण भी निजी क्षेत्र को कार्य बल प्रबंधन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
विपणन और तकनीक की पुरानी कार्यप्रणालियों के उपयोग, विशेष रूप से लघु उद्योगों में प्रतिस्पर्धा को कम करता है। जीडीपी के मुकाबले निजी ऋण का उच्च अनुपात भी आर्थिक चिंता का विषय है। भारत के निगमित क्षेत्र को विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, नौकरशाही और वित्तीय मोर्चों पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।
निगमित क्षेत्र के इन आयामों से जुड़ी समस्याओं के समाधान की दृष्टि से पुराने श्रम कानून और व्यवसाय शुरू करने तथा उनको चलाने में अत्यधिक दस्तावेजीकरण निवेश को हतोत्साहित करते हैं। एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली को मजबूत करना तथा श्रम कानूनों का और सरलीकरण करना जरूरी है। खराब परिवहन से उत्पादन और वितरण लागत बढ़ जाती है। गति शक्ति पहल के तहत बहु-परिवहन प्रणालियों और समर्पित माल गलियारों में निवेश तेज करना तथा सामग्री प्रबंधन लागत को कम करने के प्रयास जरूरी है।
प्रधानमंत्री की अपील
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को जो सलाह दी है, उसकी चर्चा स्वाभाविक ही तेज हो गई है। सर्वाधिक चर्चा एक साल तक सोना न खरीदने की सलाह को लेकर हो रही भारत में सोना केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक या सांस्कृतिक रूप से भी बहुत प्रचलित है। स्वर्ण के प्रति ऐसी मानसिकता है कि यहां जीवन से जुड़े हरेक संस्कार में इसकी जरूरत पड़ती है। अतः एक साल तक सोना न खरीदने की सलाह पर खूब चर्चा हो रही है। आज देश के हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि सोना न खरीदने या कम खरीदने से क्या होता है? भारत प्रति घंटे औसतन 80 किलोग्राम सोना खरीदता है और देश में खपत के लिए जरूरी 90 प्रतिशत सोना आयात करना हमारी मजबूरी है। सोना खरीदने में डॉलर खर्च करने की जरूरत पड़ती है, इसका असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। एक अनुमान है कि भारत अपनी रक्षा पर जितना धन खर्च करता है, उससे करीब आधे धन का सोना आयात करता है। सोने के साथ समस्या है कि तिजोरियों में बंद हो जाता है और उसमें निवेशित पैसा ठहर जाता है। निस्संदेह, प्रधानमंत्री की अपील के बाद सोने की खपत कम होगी, तो देश को आर्थिक बल मिलेगा ।
प्रधानमंत्री की दूसरी बड़ी अपील है- घर से काम करने की प्रथा को पुनर्जीवित करना। उन्होंने कार्यालयों और व्यवसायों से आग्रह किया है कि जहां भी संभव हो, वे घर से काम करने की विधि का उपयोग करें।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि ईंधन की बचत होगी। पेट्रोल, डीजल के आयात में धन की बचत होगी। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री की यह भी सलाह है कि पेट्रोल, डीजल और गैस का संयम से उपयोग किया जाए। यहां यह ध्यान रखना होगा कि दो महीने से भी ज्यादा समय से भारत ने पेट्रोल, डीजल की कीमतों को बहुत हद तक संभाले रखा है, जबकि दुनिया के ज्यादातर देशों में तेल के भाव में 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई है। जब दुनिया महंगाई से जूझ रही है, जब तेल का अभाव हो रहा है, तब पचास से ज्यादा देशों में पहले से ही वर्क फ्रॉम होम चल रहा है। लोग भूले नहीं हैं, कोरोना और लॉकडाउन के समय भी वर्क फ्रॉम होम की नौबत आई थी। अब एक अंतर यह होगा कि तब लोग जान बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे और अब संभावित आर्थिक मंदी और महंगाई से बचने के लिए ऐसा करेंगे। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से चर्चा की है, उससे कयास लगाया जा रहा है। कि जल्द ही कुछ फैसले होंगे और दिशा-निर्देश जारी होंगे।
प्रधानमंत्री की बाकी सलाह भी उल्लेखनीय है। निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, कारपूलिंग या साझा यात्रा को बढ़ावा, गैर-जरूरी विदेश यात्रा स्थगित करना और इलेक्ट्रिक वाहनों, रेल का उपयोग करना जैसी सलाह वाकई कारगर है। अगर इन उपायों को हमने लागू कर लिया, तो हम महंगाई से बच जाएंगे। यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब किसी प्रधानमंत्री ने देशवासियों से मितव्ययिता बरतने की अपील की है। देश बुनियादी रूप से मजबूत है। उसकी विकास दर भी तुलनात्मक रूप से सराहनीय है। महंगाई काबू में है । अतः यह न केवल अपनी, बल्कि देश की तरक्की को भी बनाए रखने की चिंता का समय है। ईरान युद्ध से भारत के लिए संकट बहुत बड़ा हो गया है। लोग संयम के लिए जरूर प्रेरित होंगे, पर ऐसे संकट के समय वर्तमान सरकारी नीतियों की एक बार अवश्य समीक्षा करनी चाहिए। जो लोग सक्षम हैं, उन्हें भार उठाने के लिए तैयार करना होगा, ताकि अक्षम लोगों को संकट के समय ज्यादा सहारा दिया जा सके।