22-05-2026 (Important News Clippings)

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22 May 2026
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Date: 22-05-26

कोचिंग संस्कृति की चपेट में शिक्षा

बद्री नारायण, ( लेखक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई के कुलपति हैं )

मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट के पेपर लीक कांड ने सभी को दुखी और चिंतित किया है। नीट पेपर लीक कांड ने बताया कि किस तरह पैसा, बढ़ते लालच और अयोग्य होकर भी योग्य छात्रों की सीट छीनने की चाहत के त्रिकोण ने ऐसी घटनाओं को जन्म दिया है। इसी त्रिकोण ने मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ-साथ लिपिक पद की परीक्षाओं तक के लिए भी देश भर में कोचिंग का जाल खड़ा कर दिया है। देश में अनेक कोचिंग हब बन गए हैं। आनलाइन-आफलाइन के कोचिंग तंत्र विकसित हो गए हैं और कोचिंग व्यवसाय एक इंडस्ट्री का रूप ले चुका है। यह इंडस्ट्री अब अत्यंत समर्थ और शक्तिवान हो गई है। इसका टर्नओवर छह मिलियन डालर का हो गया है। आने वाले वर्षों में इसके 17 मिलियन डालर हो जाने की संभावना है। इस इंडस्ट्री में प्रतिवर्ष लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है। जिस व्यवसाय में इतना अपार धन निहित हो, वह किसी भी फूलप्रूफ सिस्टम में छेद कर पेपर लीक करा सकता है। नीट पेपर लीक कांड में गिरफ्तार कुछ लोग कोचिंग व्यवसाय से भी जुड़े हैं।

वास्तव में हर सिस्टम में ऐसे लोग होते हैं, जिनमें लालच अपना फन छुपाए प्रवेश कर जाता है। इसीलिए हाल में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक को एक सामाजिक बुराई कहा। ऐसी सामाजिक बुराई के खिलाफ सरकार और समाज, दोनों को साथ आकर काम करना होगा। सरकार अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करने में तो लगी ही है, लोगों को भी खुद एक नैतिक समाज में तब्दील होना होगा। मेडिकल कालेजों की सीट में हेराफेरी में अनेक स्तरों पर कमीशनखोर एजेंट्स, कंसलटेंट नुमा दलालों और पेपर लीक करने वालों का जाल फैला हुआ है। यह बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक फैल गया है। 1980 के दशक में जब हम स्कूली छात्र थे तो कोचिंग संस्थानों का जाल इतना नहीं फैला था। तब सरकारी स्कूल बेहतर स्थिति में थे और कमजोर छात्रों के लिए ही कोचिंग आवश्यक मानी जाती थी।

1990 के दशक के बाद सरकारी स्कूल व्यवस्था कई जगह पर कमजोर हुई। इसका लाभ शिक्षा को व्यवसाय मानने वालों ने उठाया। यह वही दौर था जब भारत में मध्य वर्ग का कई गुना विस्तार हुआ। नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के आने के बाद जब बाजार आक्रामक हुआ तो उसने शिक्षा और परीक्षा को भी अपनी चपेट में ले लिया। इसी समस्या को देखते हुए मोदी सरकार ने जो नई शिक्षा नीति बनाई, उसमें शिक्षा मंत्रालय का सबसे ज्यादा जोर शिक्षा के माध्यम से ऐसा नैतिक मानस सृजित करना है, जो परंपरा से जुड़ा हुआ आधुनिक नवाचारी नागरिक हो।

शिक्षा मंत्रालय ने इस बार जैसे ही नीट पेपर लीक की खबर आई, त्वरित निर्णय लेते हुए उसे निरस्त किया और जांच सीबीआइ को सौंप दी। इसके साथ ही परेशान छात्रों के लिए आर्थिक एवं व्यवस्थागत सहयोग की कई घोषणाएं कीं। शिक्षा मंत्रालय का यह कदम योग्य छात्रों के हक पर अयोग्य एवं अनैतिक शक्तियों के कब्जा करने की रणनीति के खिलाफ एक सख्त पहल के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

पिछली बार जब ऐसी घटना हुई थी तो शिक्षा मंत्रालय ने कई सुधारात्मक कदम उठाए थे। पेपर लीक में लिप्त पाए गए लोगों को कठोर सजा देने के लिए सरकार ने पब्लिक एग्जामिनेशन प्रिवेंशन आफ अनफेयर मीन्स एक्ट बनाया और ऐसे मामलों से निजात पाने के लिए राधाकृष्णन कमेटी का गठन किया। एनटीए ने इस कमेटी की कुछ सिफारिशों को लागू भी किया है। इस कमेटी के सुझावों के अनुसार शिक्षा मंत्री ने अगले साल से नीट-यूजी, पीजी परीक्षा सीबीटी यानी कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट के रूप में कराने की घोषणा की है। इससे एक लाभ यह होगा कि परीक्षा की पूरी प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम होगा। संपूर्ण व्यवस्था एवं प्रक्रिया काफी कुछ डिजिटल मोड में आ जाएगी। यह ठीक है कि इस मोड में परीक्षा कई दिन और कई सेट प्रश्नपत्रों के साथ करानी होगी और परीक्षा के मूल्यांकन हेतु संतुलित नार्मलाइजेशन की प्रक्रिया भी अपनानी होगी।

एक तरफ एनटीए अपनी व्यवस्था चाक चौबंद बनाने में लगा है, दूसरी तरफ छात्र पुनः परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं। इस बीच विरोधी दलों ने सरकार पर आक्रमण तेज कर दिया है, लेकिन पेपर लीक जैसे मुद्दे कभी भी राजनीतिक नहीं होते। ये बड़े अर्थों में सामाजिक मुद्दे भी होते है। पेपर लीक से निजात पाने के लिए हम सबको अपने अंदर झांककर खुद को सुधारते रहने होगा। आखिर पैसा देकर पेपर लीक कराने और लीक पेपर खरीदने वाले इसी समाज के लोग ही हैं। यह समय आरोप-प्रत्यारोप करने का नहीं। विकास के बड़े लक्ष्य पाने एवं देश के नव उत्थान का है। यह ठीक है कि नीट निरस्त होने से छात्रों और अभिभावकों के तनाव का क्षण लंबा हो गया, पर पुनः परीक्षा अयोग्य एवं भ्रष्ट शक्तियों के कब्जे की साजिश को रोकने की कोशिश है। यह वह प्रक्रिया है, जिससे गुजरकर ही नीट के प्रतिभागी छात्र एक नई सुबह तक पहुंच पाएंगे।


Date: 22-05-26

नॉर्डिक तक पहुंच

संपादकीय

हाल ही में ओस्लो में संपन्न भारत- नॉर्डिक शिखर सम्मेलन यूरोप के नॉर्डिक क्षेत्र के साथ भारत के रिश्तों को व्यापक बनाने के मामले में अहम रहा है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की। नॉर्डिक में उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉवें और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं और अब भारत इनके साथ पारंपरिक कूटनीतिक रिश्तों के बजाय कहीं अधिक गहन रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रहा है। इसमें पर्यावरण के अनुकूल तकनीक, नवाचार, रक्षा विनिर्माण और दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह आदि शामिल हैं। शिखर सम्मेलन में कई अहम परिणाम सामने आए। इनमें हरित तकनीक और नवाचार रणनीतिक साझेदारी, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सहयोग में इजाफा, आर्कटिक और पोलर शोध, समुद्री अर्थव्यवस्था तथा विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं की आवाजाही शामिल है। नॉर्डिक देशों ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। बदले में भारत ने इन देशों की रक्षा कंपनियों को रक्षा उद्योग गलियारे में 100 फीसदी विदेशी निवेश पहुंच प्रदान करने का वादा किया है।

यह भारत की विदेश नीति में व्यापक बदलाव को दर्शाता है जो भूआर्थिक और प्रौद्योगिकी आधारित साझेदारियों की ओर अग्रसर है। इस संदर्भ में नॉर्डिक देश वे क्षमताएं प्रदान करते हैं जिनकी भारत को तत्काल आवश्यकता है। भारत और नॉर्डिक क्षेत्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है जबकि 700 से अधिक नॉर्डिक कंपनियां पहले से ही भारत में काम कर रही हैं। ऑफशोर विंड, कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तथा सॉवरिन वेल्थ कैपिटल में नॉर्वे की ताकत भारत की कार्बन घटाने की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करती हैं। डेनमार्क की नवीकरणीय ऊर्जा, बंदरगाह लॉजिस्टिक्स और साइबर सुरक्षा में विशेषज्ञता, स्वीडन का उन्नत विनिर्माण और रक्षा तकनीकें, तथा फिनलैंड की दूरसंचार और डिजिटल अधोसंरचना क्षमताएं भारत की औद्योगिक और तकनीकी प्राथमिकताओं से काफी मेल खाती हैं। यह शिखर सम्मेलन भारत के इस प्रयास को भी रेखांकित करता है कि यह बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बीच अपनी रणनीतिक साझेदारियों को विविध बनाना चाहता है। आपूर्ति श्रृंखलाएं अब भी चीन और पूर्वी एशिया में अत्यधिक केंद्रित हैं। इसलिए, भारत की वह पहल इस क्षेत्र की उन्नत और नवाचार संचालित अर्थव्यवस्थाओं के साथ भरोसेमंद तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र और सुदृढ़ आर्थिक नेटवर्क के निर्माण पर केंद्रित है।

इस साझेदारी का स्वच्छ ऊर्जा संबंधी पहलू सबसे अहम है। भारत के उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी, अधोसंरचना, वित्तपोषण और विशेषज्ञता की जरूरत होगी। नॉर्डिक देश ऑफशोर विंड, हरित हाइड्रोजन, टिकाऊ नौवहन, चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल और जलवायु प्रतिरोधी अधोसंरचना में दुनिया में अग्रणी हैं। नॉर्वे का 2.1 लाख करोड़ डॉलर का सॉवरिन वेल्थ फंड, जो दुनिया का सबसे बड़ा है, पहले से ही कई भारतीय कंपनियों में 34 अरब डॉलर से अधिक का निवेश रखता है और भारत की अधोसंरचना तथा ऊर्जा बदलाव परियोजनाओं के वित्तपोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस प्रकार, भारत की नॉर्डिक क्षेत्र के साथ सहभागिता तेजी से आर्कटिक भू-राजनीति, जलवायु विज्ञान और समुद्री रणनीति से जुड़ रही है। नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग भारत को ध्रुवीय अनुसंधान विशेषज्ञता, समुद्री प्रौद्योगिकियों और आर्कटिक क्षेत्र से संबंधित उभरती शासन चर्चाओं तक पहुंच प्रदान करता है। प्रधानमंत्री की यात्रा का इटली वाला हिस्सा भी इसी रणनीतिक दिशा को मजबूत करता है । भारत और इटली ने संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक आगे बढ़ाया और अहम खनिज, समुद्री अधोसंरचना, वैज्ञानिक अनुसंधान और कौशल आवाजाही पर समझौते किए, जो यूरोप में प्रौद्योगिकी साझेदारियों और आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन पर भारत के बढ़ते जोर को दर्शाते हैं। फिर भी चुनौतियां बरकरार हैं। उदाहरण के लिए, नॉर्डिक निवेशक सख्त पर्यावरणीय, शासन और पारदर्शिता मानकों के तहत काम करते है जैसा कि कुछ भारतीय कंपनियों में निवेश से जुड़ी विवादों में देखा गया है। इसलिए भारत को दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित करने के लिए नियामक पूर्वानुमान, संस्थागत विश्वसनीयता और शासन मानकों को मजबूत करना होगा।