14-05-2026 (Important News Clippings)
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Date: 14-05-26
Sell Some Acres
Land assets of GOI and its agencies run into lakhs of acres. Selling some can ease fiscal pressure now
TOI Editorial

If ministers have decided to travel in smaller convoys, and bureaucrats are conducting business without logging air miles, we can’t complain. For, frugality is always a virtue – not just in a crisis. As George Eliot said of a wealthy family: “They never suffered a pinch of salt to be wasted.” The belief that “money saved is money earned” is also universal. So, let these habits stick even when Hormuz crisis ends, and good times return. Because every barrel of oil, every ingot of gold, and every bag of fertiliser we don’t import, makes rupee stronger, boosting its purchasing power.
But thrift is good only till it eliminates waste. Putting essentials on the chopping block is silly. Should govt cut back on infra works now, to shore up finances? No, for that would hurt employment, income, and demand, slowing down the economy even more. It would also delay the process of making India an attractive investment destination for businesses. Likewise, we have argued against burgeoning cash transfers before, but stopping them now could increase hardship for poor families, especially when agri prices are likely to shoot up due to a fertiliser crunch.
When it comes to regulating consumption, rather waste, price signals are more effective than moral positions. So, Centre’s decision to hike import duty on gold and silver, from 6% to 15%, is a good idea. It will not only curb demand, and conserve forex, but also leave more money in govt’s hands for public works. Watch out for increased smuggling, though.
And public works could be key to sustaining growth this year, and maybe a part of next year as well. So, govt will need more revenue. Hiking taxes is the easy way, with one big risk – reduced private consumption demand. Instead, govt should dust some of the ideas Niti Aayog has floated over the past few years, such as National Monetisation Pipeline that can bring in many lakhs of crore rupees. For instance, govt has monetised ₹5.3L cr worth of core assets, such as coal blocks, over the past four years. But monetisation of non-core assets, especially spare land, has moved slowly, despite the formation of National Land Monetisation Corporation in 2022. GOI, including major ministries like Railways and Defence, owns roughly 15,500 sqkm, or roughly 38L acres. There was a proposal last year to encash 81,000 acres of spare cantonment land, worth some ₹8L cr. Set it rolling now.
Testing troubles
Leaks and breaches have destroyed the National Testing Agency’s credibility
Editorial

Once bitten, twice shy: this saying surely does not apply to the National Testing Agency (NTA). Given the number of times that the Agency has run into trouble in the conduct of common entrance exams, it would have been logical to expect those at the helm to have learnt their lessons. However, this week’s cancellation of the National Eligibility-cum-Entrance Test (NEET)-UG affecting over 22 lakh stu- dents is a serious blow to the agency’s reputation. The NTA, on May 12, 2026, announced the cancellation of the exam held on May 3, amid allega- tions of paper leak, as the government tasked the CBI with carrying out a comprehensive inquiry. The decision followed investigations revealing that a ‘guess paper’ – a collection of predicted, high-importance questions created to help stu dents prepare-matched numerous questions in chemistry and biology. Media reports said that this material had reached coaching hubs in Rajas than nearly a month ahead, and had been sold to aspirants for huge sums. This led to investigations by the Rajasthan Police Special Operations Group and 15 people were arrested. In the face of such obvious fraud, the NTA maintained the line that the decision to cancel the exam was taken “in the interest of students and in recognition of the trust on which the national examination system rests”. The question though, is: does the NTA still enjoy that trust? NEET has been dogged by controversy right from the start, with several States opposing the format. But even after it was rolled out across the country, the NTA, as the agency conducting the exam, has suffered several dents to its credi- bility, with various charges and controversies coming up with depressing regularity. This in- cludes the 2019 impersonation scam in Tamil Na du where students used proxies to write the ex- am; the 2022 controversy of frisking girl examinees in Kerala, and the 2024 paper leak and grace marks controversy.
The K. Radhakrishnan committee, which was constituted to recommend reforms in the examination process, recommended a restructuring of the NTA, and creating strong institutional linkag es with State and district authorities in order to produce a secure test administration apparatus. Among others, it also made recommendations for multi-stage testing, hybrid use of papers and computers, and a series of measures to prevent breaches and malpractices. It would be a crime to allow the NTA to continue with its inept con- duct of common entrance exams, impacting the future of several lakhs of students. NEET was introduced as a measure to bring into play a single, standardised, and transparent entrance exam for medical admissions. But the transparency that it has so far shown is of an entirely different kind: leaks and breaches of confidentiality.
पेपर लीक के बाद सिस्टम पर भरोसे का संकट है
संपादकीय
सवाल राष्ट्रीय मेडिकल परीक्षा के पेपर लीक, 23 लाख परीक्षार्थियों के मानसिक कष्टों या दुबारा परीक्षा देने के आर्थिक बोझ का ही नहीं है । सवाल सिस्टम से लगातार भरोसा उठने का भी है। परीक्षा लेने वाली संस्था एनटीए या शिक्षा विभाग इस बात से खुश हो सकते हैं कि इस बार उन्होंने तत्काल गलती मानी और परीक्षा रद्द की। परम्परागत निदान के रूप में फिर एक हाई-पॉवर्ड समिति गठित होगी, फिर एक रिपोर्ट आएगी, फिर वह सरकारी फाइलों में दफन हो जाएगी, लेकिन क्या इस बात का आश्वासन दिया जा सकेगा कि फिर ऐसा ही लीक नहीं होगा? वर्ष 2024 की पेपर लीक की घटना पर इसरो चेयरमैन की अध्यक्षता में गठित समिति की उसी साल के अक्टूबर में आई रिपोर्ट का क्या हुआ ? समिति ने कहा था कि इस एग्जाम को पीपीटी (पेन-एंड-पेपर टेस्टिंग) की जगह सीबीटी (कंप्यूटर – बेस्ड टेस्टिंग ) किया जाए ताकि कम से कम मैन्युअल हस्तक्षेप रहे। समिति ने इसे जेईई पैटर्न पर आयोजित करने की सलाह दी थी। एनटीए का कहना है कि इसका फैसला स्वास्थ्य मंत्रालय को करना है। चूंकि ताकतवर कोचिंग सेंटर्स, धनवान अभिभावक और भ्रष्ट मल्टी-लेयर्ड सिस्टम इसमें लाखों-करोड़ों का वारा-न्यारा करने की ललक रखते हैं, लिहाजा इस पर नियंत्रण केवल एक या दो स्तरीय मानव संलग्नता और बहुचरणीय टेस्टिंग प्रणाली से ही संभव है। चूंकि इसमें करीब 25 लाख परीक्षार्थी शामिल होते हैं, लिहाजा इसे मल्टी- शिफ्ट में पेपर नॉर्मलाइजेशन प्रोसेस के तहत किया जाना भी समीचीन होगा।
Date: 14-05-26
एक ओर लम्बित मुकदमे हैं तो दूसरी तरफ गैरजरूरी जिरहें
विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील )
जजों के फैसलों में विरोधाभासों और विलम्ब से देश के लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। आज लगभग 4.88 करोड़ मुकदमे जिला अदालतों में लम्बित हैं, फिर भी वहां जजों के 4721 खाली पदों पर भर्ती नहीं हो रही। सभी हाईकोर्ट में भी 63.98 लाख मुकदमे लम्बित हैं, वहां भी जजों के 325 पद खाली हैं।
सुप्रीम कोर्ट की बात करें तो वहां साल 2015 से 2019 तक लगभग 60 हजार मामले लम्बित थे। उसके बाद जल्द मामले निपटाने का शोर बढ़ने के साथ ही लम्बित मामलों की संख्या भी बढ़कर अब 93 हजार से ज्यादा हो गई है। अब जिला और हाईकोर्ट में जजों के खाली पदों पर भर्ती करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट में 4 जजों को बढ़ाने के लिए कानून में संशोधन हो रहा है। क्या सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ने से लोगों को जल्द न्याय मिलेगा? इससे जुड़े 4 पहलुओं को समझने की जरूरत है।
1. संविधान के अनुसार अधिकांश मामलों में आखिरी फैसले के लिए हाईकोर्ट ही सर्वोच्च अदालत है। लेकिन रसूखदार पक्षकारों और बड़े वकीलों के मामलों में धीरे-धीरे सुप्रीम कोर्ट से ही फैसले होने लगे। इससे वीआईपी जस्टिस और मुकदमेबाजी का मर्ज बढ़ने के साथ विरोधाभासी फैसलों की बाढ़ आ गई। सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि 2006 में दायर याचिका को उसी समय कचरे के डब्बे में डाल दिया जाता तो न्यायिक विवाद नहीं बढ़ता। जजों के अनुसार धार्मिक मामलों पर न्यायपालिका को लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। सीमित बिंदुओं पर मामले को जल्द निपटाने के बजाय लम्बी-चौड़ी अकादमिक बहसें चल रही हैं। इससे हजारों अन्य मामलों की सुनवाई टल रही है और मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
2. संविधान लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के सभी आठ जन एक साथ बैठकर चुनिंदा मुकदमों में संवैधानिक मुद्दों का निर्धारण करते थे। मुकदमों की संख्या बढ़ने के साथ डिवीजन बेंच के गठन की शुरुआत हुई। रघुवीर सिंह मामले में 1989 के फैसले के अनुसार दो या तीन जजों की बेंच सहूलियत के अनुसार बनाई जा सकती है। अदालती कार्रवाई के सीधे प्रसारण में लोग देख रहे हैं कि अधिकांश मामलों में परस्पर परामर्श के बगैर ही सीनियर जज आदेश लिखवा देते हैं। इससे कई सवाल खड़े होते हैं।
मसलन, क्या जजों ने पहले से ही निर्णय पर सहमति बना ली थी? यदि ऐसा है तो फिर वकीलों की बहस का क्या मतलब है? यदि जूनियर जज के साथ परामर्श नहीं हुआ तो पीठ में उनके साथ बैठने की क्या आवश्यकता है? अगर दो जजों की पीठ में दूसरे जज सहमत नहीं हुए तो मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा जाएगा। इसलिए दो के बजाय तीन जजों की बेंच के गठन से जजों की योग्यता और अनुभव के बेहतर लाभ लेने की जरूरत है।
3. पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट मामले में जिला अदालतों के जजों ने एक महीने में लाखों विवादों का निपटारा कर दिया था। जिला जज की रैंक के लोग रजिस्ट्रार बनते हैं, जिन्हें जिला अदालत में फांसी देने तक का अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट नियमों के अनुसार रजिस्ट्रार को मूल दस्तावेज, अनूदित प्रति कोर्ट फीस मामलों में छूट की अर्जी मुकदमों की लिस्टिंग और रूटीन अर्जियों के निपटारे के लिए न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे जूनियर वकीलों को पैरवी का अवसर मिलने के साथ ही जजों को भी मुख्य मामले की सुनवाई के लिए ज्यादा समय मिलेगा।
4. सुप्रीम कोर्ट के नियमों में 2020 में हुए बदलाव के अनुसार जमानत, मुकदमों के ट्रांसफर जैसे मामलों को एक जज की बेंच सुन सकती है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के पहले अधिकांश जज हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर सर्वशक्तिशाली होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर अगर हाईकोर्ट में जजों की रिटायरमेंट उम्र 65 साल हो जाए तो शायद ही कोई चीफ जस्टिस सुप्रीम कोर्ट में जूनियर जज के तौर पर प्रमोट होना पसंद करेंगे।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार अधिकांश मुकदमों की सुनवाई एक जज द्वारा की जा सकती है। इससे जजों की संख्या बढ़ाए बगैर ही लम्बित मुकदमों का बोझ कम हो सकता है।
फिजूलखर्ची की संस्कृति
संपादकीय
यह अच्छा है कि प्रधानमंत्री ने अपनी कारों के काफिले में कटौती कर इसका उदाहरण पेश किया कि वे जो कुछ औरों को करने के लिए कह रहे हैं, उस पर स्वयं अमल कर रहे हैं। उनकी ओर से अपनी कारों के काफिले को छोटा किए जाने के बाद कुछ केंद्रीय मंत्रियों ने भी ऐसा ही किया है। आशा है कि भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री एवं मंत्री भी इसका अनुसरण करेंगे, लेकिन ऐसा ही गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी दिखना चाहिए।
इसी के साथ ही सांसदों, विधायकों, अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ नौकरशाहों को भी ऐसा ही करना चाहिए। किफायत का परिचय देना किसी सरकार या दल विशेष का विषय नहीं। यह एक राष्ट्रीय आवश्यकता है और केवल वर्तमान की ही नहीं।
चूंकि हम एक विकासशील देश हैं, इसलिए मितव्ययिता का परिचय तो सदैव ही दिया जाना चाहिए और सबसे अधिक नेताओं और नौकरशाहों की ओर से दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनके बीच किफायत की जगह फिजूलखर्ची की संस्कृति ने जड़ें जमा ली हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि जो जितने लंबे काफिले से चलता है, वह उतना ही धमक-हनक वाला माना जाता है। दिखावे वाली इस मानसिकता से मुक्ति पाने की सख्त जरूरत है।
आज यदि ऊर्जा संकट के चलते मंत्रीगण दो-तीन कारों के साथ चलने को उपयुक्त समझने लगे हैं, तो इसके पहले वे इसकी जरूरत क्यों नहीं समझ रहे थे? आखिर ऐसा तो है नहीं कि ऊर्जा संकट के पहले पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन देश में ही हो रहा था या फिर उनका आयात बहुत सस्ता था। सरकारी तंत्र को तो इससे कहीं अच्छे से अवगत होना चाहिए कि विदेशी मुद्रा की सबसे अधिक खपत पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में ही होती है।
सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों की खपत में कमी लाने के साथ विदेशी मुद्रा बचाने वाले अन्य दीर्घकालिक उपायों पर भी ध्यान देना होगा। विदेशी मुद्रा की एक बड़ी खपत पर्यटन के लिए विदेश यात्राओं के चलते होती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि देश में वैसे पर्यटन स्थल और पर्यटकों के अनुकूल माहौल विकसित नहीं हो पाया है, जैसा मालदीव, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देशों ने विकसित कर लिया है। यह तब है, जब भारत पर्यटन स्थलों की दृष्टि से कहीं अधिक समृद्ध है।
इसके बाद भी स्थिति यह है कि अब लोग शादियां, पार्टियां आदि करने के लिए भी विदेश जाने लगे हैं। विदेशी मुद्रा की एक बड़ी खपत विदेश पढ़ने वाले जाने वाले छात्रों के कारण भी होती है। हमारे छात्र बड़ी संख्या में विदेश पढ़ने इसलिए जाते हैं, क्योंकि देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के केंद्र विकसित नहीं हो पा रहे हैं। अच्छा हो कि सामान्य दिनों में भी फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने एवं विदेशी मुद्रा बचाने की संस्कृति विकसित की जाए।
Date: 14-05-26
असंभव नहीं पेपर लीक होने से रोकना
संजीव जायसवाल ‘संजय’, ( लेखक रिसर्च डिजाइंस एंड स्टैंडर्ड्स आर्गेनाइजेशन के पूर्व निदेशक और साहित्यकार हैं )
देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक नीट के प्रश्नपत्र लीक होने के कारण पूरी परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। इस पेपर लीक कांड ने लाखों युवाओं के सपनों और उनके अभिभावकों के भरोसे को तोड़कर रख दिया। नीट निरस्त होने से 22 लाख से अधिक छात्रों को यह परीक्षा फिर से देनी होगी। इन छात्रों और अभिभावकों के कष्टों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। यह खेद की बात है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए एक बार फिर फेल हो गई। ध्यान रहे कि 2024 में भी नीट में गड़बड़ी के चलते कुछ केंद्रों की परीक्षा रद करके दोबारा करानी पड़ी थी।
यह केवल एक परीक्षा का पर्चा बाहर आना नहीं है, बल्कि देश की मेधा और भविष्य के साथ किया जाने वाला क्रूर मजाक है। क्या वास्तव में एक पारदर्शी परीक्षा प्रणाली विकसित करना असंभव है? पेपर लीक कांड के माफिया भली-भांति जानते हैं कि कुछ दिनों तक शोर मचेगा, जांच की घोषणाएं होंगी, धरना-प्रदर्शन होंगे और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। इसी का फायदा उठाकर ऐसे अपराधी बेखौफ होकर अगली परीक्षा में सेंधमारी की तैयारियों में जुट जाते हैं। हमें ‘कैट’ जैसी परीक्षाओं की ओर भी देखना चाहिए, जिसमें भी लाखों छात्र बैठते हैं, परंतु वहां पेपर लीक की घटनाएं लगभग शून्य हैं।
असल समस्या प्रबंधन की नहीं, बल्कि उस ‘पूंजी’ की है जो मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। मेडिकल कालेजों विशेषकर निजी संस्थानों की सीटों में करोड़ों-अरबों का खेल चलता है। जब दांव पर इतना धन होता है, तो शक्तिशाली लोग और रसूखदार तंत्र सक्रिय हो जाते हैं। शायद यही कारण है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पेपर लीक को रोकने के लिए वह संजीदगी नहीं दिखाई जाती, जो दिखाई जानी चाहिए। प्रश्नपत्र तैयार करने, प्रिंट करने, फिर जिला स्तर के ट्रेजरी तक और वहां से परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने की वर्तमान व्यवस्था में इतनी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं शामिल हैं कि उसे फूलप्रूफ बना पाना बहुत मुश्किल है। धनबल या बाहुबल के माध्यम से इसमें से किसी भी कमजोर कड़ी को कभी भी तोड़ा जा सकता है।
यदि हम पेपर लीक की समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं, तो वर्तमान कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे। इसके लिए बजट निर्माण की प्रक्रिया एक आदर्श उदाहरण हो सकती है। जिस तरह केंद्रीय बजट पेश होने से एक सप्ताह पहले वित्त मंत्रालय के संबंधित अधिकारियों को बाहरी दुनिया से काटकर क्वारंटाइन कर दिया जाता है, वैसा ही माडल यहां भी अपनाया जाना चाहिए। परीक्षा से तीन-चार दिन पहले 10-12 विशेषज्ञों को एक गोपनीय और सुरक्षित स्थान पर एकत्र किया जाए। इनसे कम से कम 20 अलग-अलग प्रश्नपत्रों के सेट तैयार कराए जाएं, जिनमें सभी प्रश्नों के अंक एकसमान हों। मान लीजिए किसी परीक्षा में सौ प्रश्न पूछे जाने हैं तो 20 प्रश्नपत्रों के सेट के आधार पर 2,000 प्रश्नों का एक विशाल ‘क्वेश्चन बैंक’ तैयार किया जाए।
परीक्षा शुरू होने से मात्र दो-तीन घंटे पहले कंप्यूटर द्वारा रैंडम आधार पर इन 2,000 प्रश्नों में से सौ प्रश्नों का चयन किया जाए। इसकी पीडीएफ फाइल तुरंत तैयार कर पासवर्ड और डिजिटल सुरक्षा के साथ सभी केंद्रों को ईमेल कर दी जाए। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि परीक्षा शुरू होने के कुछ समय पहले तक किसी को भी, यहां तक कि परीक्षा कराने वाली संस्था के प्रमुख को भी नहीं पता होगा कि कौनसे प्रश्न आने वाले हैं। जब जानकारी ही नहीं होगी, तो लीक होने की आशंका स्वतः शून्य हो जाएगी। यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि कुछ परीक्षा केंद्रों पर प्रिंटर खराब होने या बिजली चले जाने के कारण प्रश्नपत्रों की प्रिंटिंग में समस्या आ सकती है। इसका समाधान यह है कि हर परीक्षा केंद्र पर प्रिंटर और जेनरेटर का डबल नहीं, ट्रिपल बैकअप तैयार रखा जाए, ताकि एक के खराब होने पर दूसरे और दूसरे के खराब होने पर तीसरे से प्रश्नपत्र को तत्काल प्रिंट किया जा सके।
चूंकि कई मामलों में परीक्षा केंद्रों के व्यवस्थापक ही धांधली में शामिल पाए गए हैं, इसलिए कानून में सख्त प्रविधान की आवश्यकता है। यदि किसी केंद्र पर ट्रिपल बैकअप के बावजूद प्रश्नपत्र प्रिंट नहीं हो पाते, तो इसे केंद्र की साजिश माना जाना चाहिए। ऐसे विद्यालय के प्रबंधकों, प्रधानाध्यापकों और संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई, भारी आर्थिक दंड और अनिवार्य जेल का प्रविधान होना चाहिए। जब जिम्मेदारी तय होगी, तभी व्यवस्था सुधरेगी। आलोचक कह सकते हैं कि देश के हजारों केंद्रों पर डबल-ट्रिपल बैकअप की व्यवस्था खर्चीली होगी, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में प्रश्नपत्रों की केंद्रीकृत छपाई, उनके देशव्यापी परिवहन और सुरक्षा के लिए तैनात हजारों पुलिसकर्मियों तथा प्रशासनिक अमले पर जो भारी-भरकम खर्च होता है, उसकी तुलना में डिजिटल वितरण और बैकअप की लागत काफी कम होगी। असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की है। सरकार को समझना होगा कि पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक प्रकार की राष्ट्रीय आपदा है, जो युवा प्रतिभाओं के आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाट रही है।
वैकल्पिक उपाय
संपादकीय
पश्चिम एशिया में संघर्ष से उपजे संकट का फिलहाल कोई स्थायी हल नजर नहीं आने के महेनजर भारत में इसके प्रभाव को कम करने के लिए वैकल्पिकों पर अमल शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री की ओर से हाल में जनता से किए गए आग्रह के बाद सोने-चांदी पर आयात शुल्क छह फीसद से बढ़ाकर पंद्रह फीसद कर देने की घोषणा से की गई। इसके बाद इन कीमती धातुओं के दाम में बुधवार को भारी उछाल आया सरकार का कहना है कि संकट के समय गैर-ज़रूरी वस्तुओं के आयात से विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ रहे दबाव को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। दरअसल, भारत बहुमूल्य धातुओं का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, कच्चे तेल के बाद सोने का देश के आयात में दूसरा बड़ा हिस्सा है। इसकी बढ़ती मांग और आयात से विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल भी बड़ा है, जिससे रुपया रिकार्ड निचले स्तर तक पहुंच गया है।
हालांकि, आभूषण कारोबारी सरकार के इस कदम से निराश हैं, लेकिन यह भी सच है कि समय रहते समुचित उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले दिनों में जो जटिल परिस्थितियां पैदा होंगी, उनका सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर ही पड़ेगा।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट के मद्देनजर देश की जनता से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग, भोजन पकाने के तेल के इस्तेमाल में कमी लाने और सोने की खरीद एवं विदेश यात्रा को स्थागित करने जैसे उपाय अपनाने का आह्वान किया था संदेश स्पष्ट था कि देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, जिसे कम करने के लिए वैकल्पिक उपायों की ओर बढ़ना होगा। इसमें दोराय नहीं है कि किसी भी बड़े संकट से निपटने के लिए आम नागरिकों की भी अहम भूमिका होती है जन भागीदारी के बिना न तो कोई योजना सफल हो पाती है और न ही संकट के दौरान आवश्यक उपायों का व्यापक स्तर पर सार्थक परिणाम सामने आता है। सोने-चांदी की खरीद नागरिकों की मूलभूत जरूरतों से परे है और इसे कुछ समय के लिए सीमित कर देने से अगर विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कुछ कम हो जाए, तो यह एक सार्थक पहल साबित हो सकती है।
सरकार के इस कदम का एक पहलू यह भी है कि इससे सोने-चांदी की कालाबाजारी और तस्करी बढ़ने की आशंका है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर निगरानी और सतर्कता बढ़ाने की जरूरत है जमीनी और तटीय घुसपैठ मार्गो संगठित तंत्र और वितरण केंद्रों के रूप में काम करने वाले कारोबारियों पर नियमित नजर रखनी होगी। इससे संकट के समय गैर-जरूरी आयात में संतुलित कमी के जरिए समग्र आर्थिक स्थिरता और बाह्य क्षेत्र के विवेकपूर्ण प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण मदद मिल सकती है। इसके अलावा भारत के विदेशी मुद्रा संसाधनों के तहत तेल, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल और रक्षा जरूरतों जैसे आवश्यक आयात को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रधानमंत्री ने लोगों से ईंधन के गैर जरूरी इस्तेमाल को कम करने का आग्रह भी किया था और बुधवार को उन्होंने खुद अपने काफिले में शामिल वाहनों की संख्या कम कर दी। इसके बाद कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इसी तरह का कदम उठाया है। मगर इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि सरकारी स्तर पर यह मुहिम सिर्फ घोषणाओं तक सीमित न रहे। जनता भी तभी इन उपायों को व्यापक रूप से आत्मसात करेगी, जब जनप्रतिनिधि भी इसका हिस्सा बनेंगे।