08-05-2026 (Important News Clippings)

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08 May 2026
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Date: 08-05-26

सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर जीवंत

नरेंद्र मोदी, ( प्रधानमंत्री )

जय सोमनाथ! 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है। इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं, जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।

यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था। समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है।

1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, ‘इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी।’

दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है। उनके विजन को के.एम. मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। पं. नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बनाया।

मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर को, सरदार पटेल की जयंती पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री अटल जी और गृहमंत्री आडवाणी जी की मौजूदगी ने इसे और गरिमापूर्ण बना दिया।

मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें। जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब उसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे। वहां आपको केवल भक्ति का ही अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं, जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई। वहां आप भारत की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा।


Date: 08-05-26

निरर्थक प्रयास

संपादकीय

अपनी पराजय में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की उस हिंसक प्रकृति को उजागर किया है जहां उन्होंने 15 वर्षों तक शासन किया। हाल ही में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों में अपनी पार्टी की पराजय के बाद उन्होंने चुनावी लोकतंत्र के परंपरागत शिष्टाचार का पालन करने और राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंपने से इनकार कर दिया। ऐसा करके वह तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा ) के बीच सड़क पर चल रही विषाक्त राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और अधिक भड़का रही हैं। भाजपा नेता शुभेदु अधिकारी के सहयोगी की हत्या कोई आश्वस्त करने वाला संकेत नहीं है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि उसका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है परंतु यह घटना दिखाती है कि किस कदर अशांति व्याप्त है।

चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी ने असंतुष्ट और शायद अज्ञानी पराजित नेता के रूप में अपनी छवि को ही अधिक उजागर किया है। उनके पास मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है क्योंकि उनका कार्यकाल विधान सभा से जुड़ा हुआ है। उनके इस्तीफा देने वा नहीं देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अनुच्छेद 172 के मुताबिक एक विधान सभा अपनी पहली बैठक से पांच साल तक चलेगी, उससे अधिक नहीं। वह अवधि 7 मई को समाप्त हो गई। दूसरे शब्दों में कहें तो अब एक नई विधान सभा गठित होगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि ममता बनर्जी संवैधानिक रूप से वैध तरीकों से इस प्रक्रिया को कैसे बाधित कर सकती हैं। वह अपनी राजनीतिक विद्रोही की छवि पर भरोसा करके चल रही हैं ताकि परंपराओं को चुनौती दे सकें। आखिर वाम मोर्चे के विपक्ष में रहते हुए उन्होंने ऐसा ही तो किया था।

उन्होंने खुद को एक बार फिर से ‘सड़क की राजनीति’ करने वाले के रूप में पेश करने का विकल्प चुना है। एक समय था जब इस तरह की राजनीति ने उन्हें 34 वर्षों के वाम शासन से थके हुए मतदाताओं के बीच लाभ पहुंचाया था, लेकिन अब वह उस नेता को शोभा नहीं देता जिसे लंबे कार्यकाल के दौरान संयम का गंभीरता से पालन करना चाहिए था। लोकतंत्र को बनाए रखने वाले नियमों का पालन न करके, वे उन्हीं उल्लंघनों का शिकार हो रही हैं जिनका आरोप वे अपने विरोधियों पर लगा रही हैं।

ममता बनर्जी का तर्क है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए और केंद्रीय बलों का दुरुपयोग कर बूथों पर कब्जा किया गया तथा परिणाम को प्रभावित किया गया। उनकी पार्टी ने विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद 27 लाख मतदाताओं को सूची से हटा दिया गया था। हकीकत यह है कि तृणमूल कांग्रेस को 80 और भाजपा को 207 सीटें मिली हैं। हार का यह बड़ा अंतर सत्ता विरोधी लहर को दर्शाता है। लेकिन चुनाव बाद के विश्लेषण से उनके आरोप में कुछ दम नजर आता है। निर्वाचन आयोग द्वारा प्रकाशित परिणामों की जांच की जाए तो पता चलता है कि कई सीटों पर जहां तृणमूल कांग्रेस, भाजपा से हारी वहां भाजपा उससे कम मतों से जीती जितने नाम मतदान के पहले सूची से हटाए गए थे। ऐसी सीटों में ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट भी शामिल है जहां वे 15,505 मत से हारीं जबकि एसआईआर के तहत लगभग 51,000 नाम हटाए गए थे।

बेशक वह मान लेना उचित नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता तृणमूल कांग्रेस को ही वोट देते, लेकिन यह पैटर्न निश्चित रूप से और गहन जांच का विषय होना चाहिए। ममता बनर्जी को अधिकार है कि वे परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दाखिल करें या प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर करें। उनके लिए बेहतर होगा कि वे इन संवैधानिक रास्तों का अनुसरण करें, बजाय उस तीखी सड़क की राजनीति का सहारा लेने के जिसे बंगाल वहन नहीं कर सकता।