03-06-2026 (Important News Clippings)

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03 Jun 2026
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Date: 03-06-26

Where Are Their Seniors?

More women in STEM is great news. But policy has to look at why most of them don’t make it to the top

TOI Editorials

That over 10,000 girls have cracked JEE Advanced exam to study in IITs, NITs or IIITs, is no ordinary milestone. It demonstrates – more than any hifalutin platitudes – the impact of policy in helping youngsters realise their potential. The policy, here, is the IITs’ supernumerary seats for girls, a scheme started from 2018. A seat allocation authority increased the proportion of women students in premier engineering colleges by 20%, as a leg-up to correct a traditional gender skew across premier engineering colleges. Seats were increased proportionately across disciplines; existing seats left as is – a gender-neutral bloc.

The outcome of the push is evident. More women have made the cut. Most importantly, women who entered via the supernumerary seats scheme, graduated with GPAs at par with men. Such performance has silenced critics, the tendency always to berate and view with animosity, policy attempts to correct gender ratios in educational and professional fields. So, it seems that India could soon have a robust pipeline of women engineers too, across fields. Women signing up for STEM fields has grown slowly, but steadily. In 2024, UGC boasted that the number of women STEM doctorates had gone up “by 107 % in the last 10 years”. Currently, 42% of STEM graduates are women.

But, alas, what after? An E&Y 2026 study showed the grim reality for women STEM grads. Almost 30% of entry-level STEM employees are women, but their number crashes to 18% at director level, which dwindles to 12%-14% at VP and C-level positions. Another study showed women STEM grads hold a mere 17% faculty positions. Why? It is brutal how societal expectations (marriage break, childbearing, elder care) and male-dominated workplace cultures (motherhood as penalty, inflexible workhours, unfair promotion practices), see highly qualified women scientists and researchers simply fall off the map, finding little support from either family or profession, to return to their STEM career, which is ever-challenging, and demands both time and commitment. So, for the 10,000 women who this year enter premier engineering and R&D set-ups, what’s the plan? Only policy can ensure this highly qualified workforce isn’t lost, simply because the workplace couldn’t accommodate women.


Date: 03-06-26

अब टेक या स्टेम सेक्टरों में महिलाओं की उपेक्षा न हो

संपादकीय

जेईई एडवांस्ड के ताजा नतीजे और पिछले रिकॉर्ड्स बताते हैं कि लड़कियों का पास परसेंटेज पिछले सात वर्षों में डेढ़ गुना बढ़कर 16.1 से 24.9 हो गया है। इससे अब तक की यह परम्परागत मान्यता कि स्टेम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स) के क्षेत्र में लड़के बेहतर प्रदर्शन करते हैं, टूट रही है। इसी काल में दुनिया की ज्ञान आधारित प्रतियोगिताओं में सबसे कठिन में शुमार होने वाले जेईई एडवांस्ड में लड़कियों के पास होने की संख्या 5356 से बढ़कर 10,107 हो गई है यानी अब लड़कियां पहले से दोगुनी संख्या में देश की प्रीमियम टेक संस्थाओं में शिक्षा लेंगी। यहां तक तो उनकी क्षमता का कमाल है लेकिन महिलाओं के प्रति जॉब्स में दुराग्रह की एक अलग कहानी है। जहां स्टेम वर्ग में दुनिया में अग्रणी भारत में 43% महिला ग्रेजुएट्स हैं, वहीं आईटी और सॉफ्टवेयर में नौकरियों में वर्कफोर्स अनुपात 1:2 का हो जाता है यानी हर दो पुरुषों पर मात्र एक स्त्री नौकरी में है। उच्च टेक पदों पर तो यह स्थिति और भी बिगड़ जाती है क्योंकि हर छह पुरुष के मुकाबले केवल एक महिला प्रमुख पदों पर है। कोर इंजीनियरिंग जैसे मैकेनिकल, सिविल या इलेक्ट्रिकल में पांच पुरुष इंजीनियर्स के मुकाबले एक महिला इंजीनियर देश में उच्च टेक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के प्रति कंपनियों का रवैया बताती है। इनमें अधिकांश बड़ी विदेशी एमएनसीज हैं। देश में टेक सेक्टर में रोजगार का विश्लेषण करने वाली संस्थाओं के आंकड़े भी महिलाओं को नौकरी और प्रमोशन देने के प्रति कंपनियों का दुराग्रह बताते हैं।


Date: 03-06-26

टूरिज्म डॉलर भी दे सकता है और जॉब्स भी

अमिताभ कांत, ( नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा )

विदेशी मुद्रा पाने और नौकरियां क्रिएट करने के सबसे तेज तरीकों में पर्यटन भी है, जबकि उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। एक ऐसे समय में, जब वैश्विक अनिश्चितता, ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक झटके चालू खाते पर दबाव डाल रहे हैं, टूरिज्म हमारी अर्थव्यवस्था के लिए स्टैबलाइजर का काम कर सकता है।

विदेशी पर्यटक सीधे हमारी अर्थव्यवस्था में डॉलर लेकर आते हैं। वे हॉस्पिटैलिटी, परिवहन, पर्यटन स्थलों, स्मृति-चिह्नों, सांस्कृतिक अनुभवों और स्थानीय व्यंजनों पर पैसा खर्च करते हैं। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र अपने आप में रोजगार सृजन का एक शक्तिशाली स्रोत है। पर्यटन में जुड़ा हर प्रत्यक्ष रोजगार 13 अप्रत्यक्ष रोजगारों को भी जन्म देता है। वेटर, शेफ, ड्राइवर, गाइड, शिल्पकार, होमस्टे संचालक, डिजिटल मार्केटर और हजारों-छोटे स्थानीय उद्यम इसके कुछ उदाहरण मात्र हैं। जहां मैन्युफैक्चरिंग-आधारित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- जिसे दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्राथमिकता दी जाती है- साकार होने में वर्षों लेता है और सार्थक स्तर पर विदेशी मुद्रा उत्पन्न करने में उससे भी अधिक समय लगाता है, वहीं पर्यटन किसी पर्यटक के निर्णयों को कुछ ही महीनों में डॉलरों में परिवर्तित कर देता है।

भारत की एविएशन कंपनियों ने 2000 से अधिक नए विमानों का ऑर्डर दिया है, जिनकी आपूर्ति आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेगी। ऊपरी तौर पर तो यह एविएशन क्षेत्र की महत्वाकांक्षा की कहानी प्रतीत होती है, किंतु यदि इसके साथ ही इन विमानों को विदेशी पर्यटकों से भरने के प्रयास नहीं किए गए, तो उलटा परिणाम भी मिल सकता है : भारतीयों के लिए विदेश यात्रा अधिक आसान और सस्ती हो जाएगी, जिससे कहीं अधिक मात्रा में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाएगी।

पिछले चार वर्षों में भारत के विदेशी पर्यटन मार्केटिंग बजट को लगभग शून्य तक घटा दिया गया है। परिणाम भी अपेक्षित हैं। वर्ष 2024 में भारत में 99 लाख अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आए- जो महामारी-पूर्व के सर्वोच्च स्तर से लगभग 10% कम हैं। जहां भारत के सभी प्रमुख प्रतिस्पर्धी देश 2019 के स्तर को पार कर चुके हैं, हम अब भी उस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। इसलिए हमारे विदेशी पर्यटन मार्केटिंग बजट में की गई तीव्र कटौती आश्चर्यजनक है।

एक विदेशी पर्यटक अपनी प्रत्येक यात्रा पर भारत के जीडीपी में 3,000 डॉलर का योगदान देता है, जबकि एक घरेलू पर्यटक का योगदान केवल 75 डॉलर होता है- यानी 40 गुना का अंतर। मार्केटिंग पर 20 करोड़ डॉलर का निवेश 10 लाख अतिरिक्त विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करेगा, जिससे 3.6 अरब डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित होगा, 40 करोड़ डॉलर की जीएसटी प्राप्ति होगी और 2.83 लाख नए रोजगार उत्पन्न होंगे। यानी मार्केटिंग पर खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर पर 18 गुना रिटर्न प्राप्त होगा। केवल 55,000 अतिरिक्त पर्यटक- जो भारत के वर्तमान टूरिस्ट-बेस का मात्र 0.5% हैं- पूरे मार्केटिंग खर्च की भरपाई कर देंगे। ये कोई अनुमान नहीं हैं। ये वही परिणाम हैं, जिन्हें इन्क्रेडिबल इंडिया अभियान ने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करके दिखाया था।

वैश्विक पर्यटन में डिजिटल टेक्नोलॉजी बड़े बदलाव ला रही है। और यही वह क्षेत्र है, जिसमें भारत की अनुपस्थिति हमारे लिए महंगी साबित हो रही है। आज पर्यटन से संबंधित कुल बिक्री का 78% ऑनलाइन होता है, 70% बुकिंग मोबाइल उपकरणों पर पूरी की जाती हैं और 45% लेन-देन ऑनलाइन ट्रैवल एजेंसियों के माध्यम से होता है। प्रतिस्पर्धा का मैदान अब यूट्यूब प्री-रोल्स, सोशल मीडिया एल्गोरिदम, प्रोग्रामेटिक डिस्प्ले और इन्फ्लुएंसर नेटवर्कों पर स्थानांतरित हो चुका है। ये ऐसे चैनल्स हैं, जहां व्यय को मापा जा सकता है, टारगेटिंग सटीक होती है और रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट का लगभग रियल-टाइम में आंकलन किया जा सकता है।

भारत के पास बुनियादी ढांचा तो है, किंतु वह उसका लाभ उठाने में विफल रहा है। इन्क्रेडिबल इंडिया के फेसबुक पर 19 लाख और इंस्टाग्राम पर 7.85 लाख ही फॉलोअर्स हैं। इतने ही फॉलोअर्स वाले सऊदी अरब ने जहां एक ही महीने में 2.7 करोड़ कंटेंट व्यू अर्जित किए, वहीं भारत केवल 3.88 लाख व्यू तक सीमित रहा। मंच मौजूद है, किंतु भारत लगभग एक दशक से वैश्विक मार्केटिंग परिदृश्य से पूरी तरह अनुपस्थित है। इसकी भारी कीमत हमारे पर्यटन क्षेत्र को चुकानी पड़ रही है।

केवल मार्केटिंग भी काफी नहीं होगी। हमें मिशन मोड में पर्यटन क्षेत्र को डी-रेगुलेट भी करना होगा। होटल, रेस्तरां, होमस्टे, परिवहन संचालक और पर्यटन सेवा प्रदाता अनेक लाइसेंसों, प्रक्रियाओं और निरीक्षणों के बोझ तले काम करते हैं। जो परियोजनाएं दूसरे एशियाई देशों में 18 महीनों में पूरी हो जाती हैं, उन्हें भारत में कहीं अधिक समय लगता है। एकीकृत लाइसेंस व्यवस्था, डिजिटलीकरण और स्वचालित नवीनीकरण को लागू किया जाना चाहिए। हमारे प्रत्येक राज्य को पर्यटन का अग्रदूत बनना होगा। प्रत्येक राज्य को 15 प्रमुख पर्यटन स्थलों की पहचान कर उन्हें ऐसे समग्र पर्यटन इको-सिस्टम में विकसित करना चाहिए, जिनमें पहुंच, आवास, अनुभव, आयोजन, सुरक्षा, स्वच्छता, स्थानीय उद्यम और मार्केटिंग- सभी का समावेश हो।

कोई डेस्टिनेशन केवल इसलिए तैयार नहीं माना जा सकता कि वहां सड़कें, होटल या संकेतक उपलब्ध हैं। वह तभी नजरों में आता है, जब कोई यात्री उसकी विशिष्टता को खोज सके, उसकी विश्वसनीयता का आकलन कर सके, बुक किए जा सकने वाले अनुभवों की पहचान कर सके, आसानी से लेन-देन कर सके और इस बात पर भरोसा कर सके कि उसे अपेक्षानुरूप अनुभव प्राप्त होगा। पर्यटन क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता अब इस पर भी निर्भर करेगी कि कोई डेस्टिनेशन कंटेंट-क्रिएटर्स के अनुकूल है या नहीं, उसे आसानी से ऑनलाइन खोजा जा सकता है या नहीं, वह लेन-देन के लिए तैयार है या नहीं और उस पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं। हमें कंटेंट-क्रिएशन अर्थव्यवस्था को भी पर्यटन की एक रणनीति के रूप में अपनाना होगा। सरकारी अभियान जागरूकता उत्पन्न कर सकते हैं, किंतु विश्वास का निर्माण कंटेंट-क्रिएटर्स करते हैं। एक उत्कृष्ट वीडियो वह प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, जो कोई ब्रोशर नहीं कर सकता।


Date: 03-06-26

शहरों की बिगड़ती सूरत

संपादकीय

देश की राजधानी में एक पांच मंजिला भवन गिरने से छह लोगों की मौत और कई के घायल होने के बाद भवन स्वामी की गिरफ्तारी करने के साथ ही नगर निगम के दो इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त मजिस्ट्रेट जांच के आदेश भी दे दे गिए। इस घटना के बाद नगर निगम यह जानने की कोशिश कर रहा है कि आखिर शिकायतों के बाद भी उक्त इमारत में अतिरिक्त मंजिल का अवैध निर्माण कैसे हो रहा था? वह अन्य ऐसी ही इमारतों की छानबीन में भी जुट गया है, लेकिन इसके आसार कम ही हैं कि आगे ऐसी घटनाएं नहीं होंगी और अवैध निर्माण का सिलसिला बंद होगा, क्योंकि यदि ऐसा होना होता तो बहुत पहले हो गया होता। आखिर दिल्ली में ऐसी कोई इमारत पहली बार नहीं गिरी, जो अवैध रूप से बनी थी या निर्मित की जा रही थी। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हो चुकी हैं और फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि नगर निकाय के अधिकारी-कर्मचारी कुछ ले-देकर अवैध निर्माण होने देते हैं। वे पैसों के लालच में भवन निर्माण संबंधी नियम-कानूनों की अनदेखी करते हैं। इस मामले में जो स्थिति दिल्ली की है, वही शेष देश की भी है।

हमारे हर छोटे-बड़े शहर में अवैध एवं बेतरतीब निर्माण हो रहा है। यह स्थानीय निकायों के संरक्षण और उनकी जानकारी में होता है। इसी कारण शहरों में अवैध तरीके से रिहायशी और व्यावसायिक इमारतों का निर्माण होता रहता है। स्थिति यह है कि जो पुराने भवन दो-तीन मंजिल के होते हैं, वे जर्जर होने के बाद भी अवैध निर्माण के सहारे चार-पांच मंजिलों में तब्दील कर लिए जाते हैं। इससे क्षेत्र विशेष में आबादी का दबाव बढ़ने के साथ नागरिक सुविधाओं का अभाव भी बढ़ता है। अपने देश में ऐसा कोई नियम ही नहीं कि किसी इलाके में कितनी आबादी रहनी चाहिए। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि हर कहीं रिहायशी इलाके व्यावसायिक इलाकों में तब्दील हो रहे हैं। देश भर में घरों में दुकानें बनाने की होड़ सी कायम है। ऐसा पुराने मोहल्लों के साथ नए मोहल्लों में भी हो रहा है। इसी कारण हमारे शहर बेतरतीब विकास का पर्याय बन गए हैं और वे नागरिक सुविधाओं के अभाव के साथ प्रदूषण एवं गंदगी से घिरते जा रहे हैं। अनियोजित शहर नगरीय जीवन को केवल कष्टकारी ही नहीं बनाते, बल्कि वे विकास में बाधक भी बनते हैं। आज के युग में शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं, लेकिन तभी, जब उनका नियोजित ढंग से विकास हो। विडंबना यह है कि जिन नगर निकायों की पहली जिम्मेदारी शहरों के नियोजित विकास को सुनिश्चित करना है, वे उसका ही निर्वाह करने में बुरी तरह नाकाम हैं। यदि शहरों की सूरत संवारनी है और उन्हें विकास का वाहक बनाना है तो स्थानीय निकायों के कामकाज के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना होगा।


Date: 03-06-26

गति पकड़ता सेमीकंडक्टर अभियान

हर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं )

वर्तमान दौर में सेमीकंडक्टर की अहमियत किसी से छिपी नहीं रही है। इस संदर्भ में अच्छी बात यह है कि भारत ने भी इसके निर्माण में तेजी से कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया नीदरलैंड दौरे पर वहां की दिग्गज कंपनी एएसएमएल और टाटा इलेक्ट्रानिक्स के बीच अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए है। एएसएमएल को आधुनिक सेमीकंडक्टर निर्माण की रीढ़ मानी जाने वाली उन्नत लिथोग्राफी प्रणालियों के मामले में विश्व के प्रमुख आपूर्तिकर्ता में से एक माना जाता है। यह अनुबंध इसका प्रतीक है कि भारत अब वैश्विक इलेक्ट्रानिक्स इकोसिस्टम में महज एक उपभोक्ता या असेंबलिंग तक ही सीमित न रहकर समूची मूल्य शृंखला में स्वयं को स्थापित करने पर ध्यान दे रहा है। यह करार गुजरात के धोलेरा में 11 अरब डालर के निवेश वाले टाटा के प्रस्तावित चिप निर्माण संयंत्र के लिए बेहद अहम है। धोलेरा को भारत के सेमीकंडक्टर हब के रूप में भी देखा जा रहा है।

सेमीकंडक्टर को लेकर भारत का दृष्टिकोण आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक निहितार्थों से प्रेरित है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो इलेक्ट्रानिक्स की खपत में तेजी के चलते देश सेमीकंडक्टर के आयात पर बड़ी हद तक निर्भर है। आज के इस दौर में जहां चिप्स आटोमोबाइल एवं दूरसंचार से लेकर रक्षा प्रणालियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे उदीयमान क्षेत्रों की रीढ़ बन चुके हैं, वहां उसकी आधारभूत सामग्री पर बाहरी निर्भरता को घटाना आत्मनिर्भरता के साथ ही आर्थिक सुरक्षा का भी एक अहम अवयव बन गया है। इसका भू-राजनीतिक संदर्भ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वैश्विक सेमीकंडक्टर उत्पादन मुख्य रूप से ताइवान, दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका में केंद्रित है। कोविड-19 महामारी से लेकर अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी मोर्चे पर तनातनी जैसे पहलुओं ने इस आपूर्ति में गतिरोध पैदा करने का काम किया है। इसने दर्शाया है कि आपूर्ति शृंखलाओं का संकेंद्रण कितना भारी पड़ सकता है। इसका ही परिणाम रहा कि प्रमुख वैश्विक विनिर्माताओं और सरकारों ने उत्पादन में विविधता को प्रोत्साहन देने के लिए चीन से इतर उत्पादन की ‘चीन प्लस वन’ वाली नीति को अपनाया। इस क्रम में अपने बड़े बाजार, जनसांख्यिकीय गहराई और बढ़ते भूराजनीतिक महत्व के चलते भारत स्वयं को एक आकर्षक वैकल्पिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो सेमीकंडक्टर निर्माण के निहितार्थ केवल वाणिज्यिक हितों तक सीमित नहीं हैं। सुरक्षित और विश्वसनीय चिप आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण का पहलू अब राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी गहराई से जुड़ा है। विशेष रूप से रक्षा इलेक्ट्रानिक्स, साइबर बुनियादी ढांचे, दूरसंचार और एआइ संचालित तकनीकों जैसे क्षेत्रों में। इसी कारण सेमीकंडक्टर परिदृश्य महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के एक नए मोर्चे के रूप में उभरा है और इस क्षेत्र में भारत का प्रवेश बदलती वैश्विक वास्तविकताओं को स्वीकारने के उसके रवैये को ही रेखांकित करता है। नई दिल्ली ने इसी को ध्यान में रखकर अपना नीतिगत ढांचा भी तैयार किया है। इसके अंतर्गत 76,000 करोड़ रुपये के आवंटन वाले इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन यानी आइएसएम, स्वीकृत चिप निर्माण परियोजनाओं के लिए 50 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता जैसी पहल की गई हैं। शायद ही विश्व में कहीं और ऐसे प्रोत्साहन दिए गए हैं। केंद्रीय बजट में भी आइएसएम 2.0 के दायरे का विस्तार करते हुए सेमीकंडक्टर उपकरण, सामग्री, बौद्धिक संपदा विकास, आपूर्ति शृंखला में लचीलेपन और शोध एवं विकास यानी आरएंडडी क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। स्पष्ट है कि भारत की रणनीति अपनी छितरी हुई क्षमताओं को एकीकृत कर उसका लाभ उठाने पर केंद्रित है।

सेमीकंडक्टर अभियान से जुड़ी कई परियोजनाएं अब धरातल पर साकार होने लगी हैं। गुजरात इन गतिविधियों का गढ़ बना हुआ है। धोलेरा में टाटा-पावरचिप फैब्रिकेशन परियोजना तो साणंद में माइक्रोन की एटीएमपी इकाई स्थापित हो रही हैं। असम को टाटा की ओसैट परियोजना हासिल करने में सफलता मिली है, जबकि उत्तर प्रदेश नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास एचसीएल-फाक्सकान संयुक्त उपक्रम के माध्यम से स्वयं को इस परिदृश्य पर मजबूती से उभारने में लगा है। उत्तर प्रदेश सेमीकंडक्टर नीति 2024 तो बाकायदा दर्शाती है कि राज्य सरकारें किस प्रकार अतिरिक्त पूंजीगत सब्सिडी, कर छूट, भूमि दरों में रियायत, बिजली रियायत और कौशल विकास पहलों के माध्यम से केंद्रीय प्रोत्साहनों की पूरक बनकर इस प्रक्रिया को रफ्तार दे रही हैं। केंद्रीय रणनीतिक दूरदर्शिता और राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धा के बीच का यह तालमेल धीरे-धीरे भौगोलिक रूप से एक व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को तैयार कर रहा है।

कई स्तरों पर प्रगति के बावजूद इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। चिप निर्माण उन उद्योगों में से एक है, जिनके लिए व्यापक स्तर पर पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। पानी की भरोसेमंद एवं सतत आपूर्ति, बिजली की निरंतर उपलब्धता, कुशल कामकाजी आबादी एवं सक्षम आपूर्ति तंत्र का सुनिश्चित होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वर्तमान विश्व में निर्यातों को लेकर जिस तरह के नियंत्रण एवं भू-राजनीतिक तनाव, खेमेबंदी और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, उसके प्रभाव से यह क्षेत्र भी अछूता नहीं। इन पहलुओं के सम्मिलित प्रभाव भी इस क्षेत्र के भविष्य की दशा-दिशा को प्रभावित करेंगे। देखा जाए तो टाटा-एसएमएल अनुबंध, माइक्रोन संयंत्र के संचालन और आइएसएम 2.0 के साथ स्पष्ट है कि भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति संकल्पना के स्तर से वास्तविकता का आकार ग्रहण करने लगी है। इससे एक दीर्घकालिक औद्योगिक क्रांति की बुनियाद रखी जा रही है। वैश्विक सेमीकंडक्टर परिदृश्य में स्वयं को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत कर रहे भारत को इससे केवल आर्थिक लाभ ही नहीं मिलेंगे, बल्कि वह रणनीतिक स्वायत्तता भी प्राप्त होगी, जहां तकनीकी क्षमताएं शक्ति संतुलन में अहम भूमिकाएं निभाने लगी हैं।