04-06-2026 (Important News Clippings)
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After Maoism, the next battle is for Adivasi trust
Constitutional guarantees hold the key to Bastar’s lasting peace
Shashank Ranjan, [ An Indian Army veteran (Colonel) with substantial experience in counter-terrorism operations, currently teaching at the O.P. Jindal Global University, Sonepat, Haryana ]
on May 19, 2026, the Union Home Minister addressed a press conference in Jagdalpur, Chhattisgarh, his first since March 31, 2026, when India was officially declared Maoist-free. The most encouraging aspect of the briefing was his assertion that “the fight against Maoism would remain incomplete until every resident of Bastar is integrated into the mainstream”.
The road to 2031
Having accomplished the March 31 objective, the Union Home Minister mentioned that 2031 would be the next milestone for ensuring the overall welfare of Bastar’s Adivasis. This is welcome, since insurgencies do not have an expiry date. According to the Home Minister, this objective is to be achieved through democratic values, cooperation and development. The government also intends to expand its outreach by delivering welfare schemes to the doorsteps of local communities through designated centres operated by the security forces.
One of the methodologies that the Home Minister emphasised for the empowerment of Adivasis was a commitment to the tiered system of governance, from the tehsil level upwards to the Centre. The constitutional vision of this system was to be based on two parallel channels. The first comprised the Panchayati Raj Institutions, with the Gram Sabha as the basic unit. The second consisted of government-appointed officials such as tehsildars, District Collectors and others. The distinction is that the former is elected by the people, while the latter is appointed by the government. These channels were not to converge or be overshadowed by the government-appointed channel, which normally has been the case on the ground. The Home Minister outlined a blueprint for the government’s future initiatives. However, sustained peace will require addressing deeper structural issues. Surprisingly, his press conference made no mention of the most crucial of these concerning grassroots governance as guaranteed by the Constitution.
Welfare schemes, the road laying, and the installation of mobile communication towers do contribute significantly to improving the ease of living. However, the larger issues relate to jal, jungle and zameen (water, forest, and land). These are the concerns that will ultimately determine the people’s trust in the government.
Implementing PESA in earnest
Now is an opportunity for the government to complete the unfinished agenda of implementing the Panchayats (Extension to Scheduled Areas) (PESA) Act, 1996. Across India’s Fifth Schedule Area States, the record of PESA implementation has been dismal. Since implementation was left to the States, each interpreted and applied the Act differently, often undermining its spirit and intent.
Grassroots governance centred on the Gram Sabha forms the basis of the PESA Act. Its effective implementation in letter and spirit has the potential to deliver justice to the Adivasi. Today, the Adivasi is with the government, largely due to the security forces’ tactical victory over the Maoists. However, as the security challenges recede, the government will be tested by the Adivasi on the parameters of justice delivery. The Adivasis are aware of the guarantees that the Constitutional Acts provide and are unlikely to scale down their aspirations.
With decentralised governance at its core, the PESA Act elevates the Gram Sabha to the cornerstone of local self-governance. Under the Act, the Gram Sabha is granted decisive powers to safeguard Adivasi identity, manage community resources and resolve local disputes in accordance with customary laws. The consent of the Gram Sabha on matters affecting lives and livelihoods has the potential to bring about the structural change necessary for positive peace – one that goes far beyond the mere absence of violence. However, State governments have often attempted to circumvent the authority of the Gram Sabha in pursuit of other objectives. A case in point was the Chhattisgarh government’s 2022 proposal to amend the Act by replacing “consent” with “consultation”. This would have diluted the Gram Sabha’s veto power and undermined the essence of the PESA Act. There have also been instances where Gram Sabha resolutions and consent records were allegedly forged or fabricated with mala fide intent.
The imperative of trust
The intent here is not to express scepticism about the sincerity of what the Home Minister said during his press briefing. However, for people to place their trust in the government, structural and historical issues must be addressed. Upholding and strengthening constitutional guarantees should be the primary concern of the government. This would help allay the lingering doubts in the minds of Adivasis, many of whom may still be ambivalent. Through genuinely participatory governance, the government should allow Adivasis to define the “mainstream” into which the Home Minister seeks to integrate them.
मनुष्य की जान को इतना सस्ता क्यों समझ लिया है?
संपादकीय

दिल्ली की एक इमारत में लगी भीषण आग से लगभग दो दर्जन लोगों की मृत्यु अपनी तरह की कोई पहली घटना नहीं है। चंद दिनों पहले घर के एसी के फटने से एक जाने-माने रिटायर्ड आईएएस अधिकारी की मौत हो गई थी, जबकि एनसीआर की तमाम सोसाइटियों में दर्जनों ऐसे घटनाएं सुनने को मिल रही हैं। रेस्तरां में गैस लीकेज हो या बिल्डिंग में शार्ट सर्किट या फ्लैट्स में एसी फटने की घटनाएं, एक बात साफ है कि सरकार की नियामक संस्थाएं ऐसे हादसों को रोकने के लिए बने एसओपी और निवारक उपकरणों की समय-समय पर जांच नहीं करतीं। सोसाइटी में आग बुझाने के उपकरण नहीं होते, एलपीजी स्टोरेज के मानक की जांच नहीं होती और एसी के कम्प्रेशर की गुणवत्ता फैक्ट्री स्तर पर ही सुनिश्चित नहीं की जाती। मानव जीवन भारत में सस्ता माना जाता है, लिहाजा तीन तरह की घटनाएं अक्सर सुनने में आती हैं। पहली, घटिया निर्माण के कारण पुल या निर्माणाधीन भवन का गिरना; दूसरी, आग या ऐसी आपदा से सार्वजनिक ही नहीं निजी धन-जन की भी क्षति; और तीसरी, प्राकृतिक आपदा । प्राकृतिक आपदा पर तो किसी का वश नहीं है, लेकिन अन्य दो किस्म की घटनाएं मानवीय दोष के कारण होती हैं। एक्स्ट्रा लोड और वायरिंग की गुणवत्ता की चेकिंग होती रहे तो शॉर्ट-सर्किट की घटनाओं से बचा जा सकता है और सरकारी एजेंसियां निर्माणाधीन भवन या पुल में सामग्री की जांच सही तरह से करें तो वे अचानक धराशायी न हों। लापरवाही स्वीकार्य नहीं है।
Date: 04-06-26
डेमोग्राफी की अच्छी समझ के बिना हम समस्याएं नहीं सुलझा सकते
डॉ. अर्चना मुठ्ये, ( इंडियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पापुलेशन की कार्यकारी परिषद सदस्य )

भारत जनसंख्या वृद्धि की चुनौती का ही सामना नहीं कर रहा, तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय संतुलन की जटिल परिस्थितियों से भी गुजर रहा है। देश के सामने केवल यह प्रश्न नहीं है कि आबादी कितनी बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि आबादी की संरचना, वितरण, आयु-प्रोफाइल, प्रवासन-प्रवृत्तियां और संसाधनों पर उसका प्रभाव किस दिशा में जा रहा है।
यही कारण है कि जस्टिस नावलेकर की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय समिति को दूरदर्शी व समयानुकूल पहल माना जा रहा है। नि:संदेह समिति में प्रशासन, न्याय और नीति-निर्माण के क्षेत्र से जुड़े अनुभवी एवं विद्वान सदस्य सम्मिलित हैं। किंतु यदि इसमें प्रत्यक्ष रूप से डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाता, तो यह पहल और व्यापक तथा अकादमिक रूप से समृद्ध बन सकती है।
जनसंख्या संतुलन जैसे विषय केवल प्रशासनिक या राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे प्रजनन-संक्रमण, जनसंख्या-परिवर्तन, आयु-संरचना, प्रवासन-पैटर्न, निर्भरता-अनुपात, शहरीकरण प्रवृत्तियों तथा जनसंख्या-पूर्वानुमान जैसे जटिल जनसांख्यिकीय आयामों से जुड़े होते हैं। इन परिवर्तनों को समझने के लिए गणितीय-मॉडलिंग, दीर्घकालिक डेटा-विश्लेषण और सांख्यिकीय प्रक्षेपण की विशेषज्ञता आवश्यक होती है।
यदि रोजगार-सृजन, शहरी-नियोजन और संसाधनों के प्रबंधन में संतुलन नहीं बना, तो हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड बोझ में भी परिवर्तित हो सकता है। इसी संदर्भ में अवैध प्रवासन का प्रश्न महत्वपूर्ण है। यह केवल आंतरिक या सीमा सुरक्षा का विषय नहीं है, बल्कि विकास, प्रशासन और संसाधन-प्रबंधन से भी सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। सरकारें अपनी योजनाएं जनगणना, सर्वेक्षणों और पंजीकृत आबादी के आधार पर बनाती हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, खाद्य-सुरक्षा, पेयजल, रोजगार और सामाजिक-कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा ढांचा इसी अनुमानित जनसंख्या पर आधारित होता है। किंतु जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में अवैध आबादी जुड़ जाती है, तो वास्तविक मांग और सरकारी योजना में अंतर पैदा हो जाता है। संसाधनों का अनियोजित बंटवारा होने से अनेक योजनाएं अपने मूल उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पातीं।
जब समिति का मूल विषय ही देश में जनसंख्या बदलाव से जुड़ी चुनौतियों का अध्ययन करके स्थायी समाधान और नीतिगत उपायों का सुझाव देना है तो उसमें जनसांख्यिकी विशेषज्ञों की प्रत्यक्ष भागीदारी क्यों नहीं है? भारत में इस क्षेत्र की विशेषज्ञता का अभाव नहीं है। कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान विश्वस्तरीय रिसर्च और जनसंख्या विश्लेषण के लिए जाना जाता है।
इसी प्रकार मुंबई के देवनार स्थित अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान जनसंख्या-अध्ययन, प्रजनन-स्वास्थ्य, प्रवासन, जनसांख्यिकीय-अनुसंधान और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे महत्वपूर्ण अध्ययनों का प्रमुख संस्थान है। इन संस्थानों में ऐसे अनेक विशेषज्ञ मौजूद हैं, जो जनसंख्या-परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों के वैज्ञानिक आकलन में सक्षम हैं।
वे यह समझने में भी सहायता करते हैं कि प्रवासन की वर्तमान प्रवृत्तियां भविष्य में किन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को जन्म दे सकती हैं। यही कारण है कि अनेक देशों में जनसंख्या संबंधी आयोगों और नीति समितियों में सांख्यिकीविदों, जनसांख्यिकी विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और प्रवासन विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। क्योंकि वे भी वैध-अवैध माइग्रेशन से जुड़ी हुई समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत की जनसांख्यिकीय विविधता भी व्यापक है।
विभिन्न राज्यों में प्रजनन-दर, जनसंख्या-घनत्व, आयु-वितरण और प्रवासन-पैटर्न में अंतर दिखता है। ऐसे में एक समान दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं हो सकता। क्षेत्रीय वास्तविकताओं को समझने के लिए डेटा-आधारित और वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता होती है। समिति का गठन करना गृह मंत्रालय की महत्वपूर्ण पहल है, किंतु जनसंख्या का प्रश्न केवल वर्तमान का नहीं, भविष्य का भी है और भविष्य की योजना तथ्यों, विज्ञान और दूरदृष्टि के आधार पर ही बनाई जा सकती है।
समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र ग्रेट निकोबार
डीके जोशी, ( लेखक अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल और द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष तथा पूर्व नौसेना प्रमुख हैं )
सदियों पहले कौटिल्य ने कहा था कि ‘जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।’ कौटिल्य की यह सीख आज कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इससे हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है। इस क्षेत्र को दशकों से उसके हाल पर छोड़कर उपेक्षित बना दिया गया था। स्वतंत्रता के पश्चात भी लंबे समय तक भारत का सामरिक सोच मुख्य रूप से स्थल-आधारित रहा। जबकि इस दौरान दुनिया बहुत बदल भी गई है।
ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। इसके प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह मात्र एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्न नहीं है। वास्तव में यह भारत के लिए एक परीक्षा है कि क्या भारत इस विलक्षण भौगोलिक बढ़त को सामरिक शक्ति में रूपांतरित करने के लिए तैयार है या नहीं। ग्रेट निकोबार अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किमी है, जो समूचे द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग दो प्रतिशत है।
इसमें से 130.75 वर्ग किमी वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है। यह हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्ट्रेट और लोंबोक स्ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। सामरिक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र को भारत की पूर्वी समुद्री चौकी की संज्ञा दी जा सकती है। इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। जिस तरह से हिंद महासागर क्षेत्र अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है, उसे देखते हुए भविष्य की रणनीति के लिहाज से इस क्षेत्र की महत्ता और बढ़ गई है।
हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किमी लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी। एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुंफोन में। इसके अलावा हाई स्पीड रेल, मल्टी लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक हिंद-प्रशांत व्यापार मार्गों को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।
मलक्का स्ट्रेट की बात करें तो यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोक पाइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों की आवाजाही तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किमी दूर है, जो मलक्का स्ट्रेट को अफ्रीका, पश्चिम एशिया और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं। मलक्का, सुंडा और लोंबोक जैसे सामरिक चोक पाइंट्स के निकट होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती, वह भौगोलिक परिस्थितियों का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है। ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित एवं विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ साकार करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है। विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है। साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुंच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत की उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है, जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इस परियोजना से आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर सृजित होंगे और भारत को अपनी सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण एवं निश्चितता प्राप्त होगी।
नि:संदेह ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिकीय सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और हरसंभव उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता, लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। इस संदर्भ में वास्तविक चुनौती राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ने की दिशा में संतुलन साधने की है।
Date: 04-06-26
बढ़ेगी अनिश्चितता
संपादकीय
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (गुएसटीआर) ने भारत से आयात पर 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम के सेक्शन 301 के तहत अतिरिक्त 12.5 फीसदी शुल्क लगाने का जो प्रस्ताव रखा है वह आयात पर कुल प्रतिबंधों को बढ़ाने का प्रवास ही है। यह प्रस्ताव उस जांच के बाद आया जिसमें देखा गया कि क्या भारत सहित 60 अर्थव्यवस्थाओं में बंधुआ मजदूरी से उत्पादित सामग्री के आयात के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं। यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि सभी 60 अर्थव्यवस्थाएं इस मामले में कमतर हैं। कनाडा, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर अतिरिक्त 10 फीसदी शुल्क लगाया जा सकता है जबकि भारत और कई अन्य देशों पर 12.5 फीसदी। निष्कर्षों का इस कदर व्यापक होना इस कवायद के उद्देश्य पर ही सवाल उठाता है। बंधुआ मजदूरी एक जायज चिंता है लेकिन ऐसी जांच जो अमेरिका के कुल आयात के लगभग 99 फीसदी हिस्से को कवर करती है और हर एक में कमी पाती है वह लक्षित प्रवर्तन कम और नए शुल्कों के लिए कानूनी औचित्य खोजने जैसी अधिक नजर आती है।
भारत के लिए इसके निहितार्थ केवल समग्र शुल्क दर तक सीमित नहीं है यूएसटीआर की रिपोर्ट ने एल्युमीनियम, कपास, इलेक्ट्रॉनिक्स, लीथियम ऑयन बैटरियों और चावल जैसे क्षेत्रों में जोखिम की पहचान की है। साथ ही कपास, मछली, पाम ऑयल, कॉफी, कोको और निकल आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े उत्पादों के नियत को भी चिह्नित किया है। स्पष्ट है कि यूएसटीआर की सिफारिश को पिछले वर्ष अमेरिकी व्यापार नीतियों के विकास से अलग नहीं किया जा सकता। जब अदालतों ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए जवाबी शुल्क को खारिज कर दिया तब अमेरिका ने वैकल्पिक कानूनी रास्तों की ओर रुख किया। व्यापार अधिनियम के सेक्शन 122 के तहत अस्थायी शुल्क लगाए गए जो जल्द ही समाप्त होने वाले हैं।
शुल्क ट्रंप के आर्थिक एजेंडे का केंद्रीय हिस्सा हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि दुनिया अमेरिका के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नाहीं कर रही है जो व्यापार घाटे में नजर आ रहा है। यह भी विश्वास है कि शुल्क आयात को कम करेंगे और घरेलू उत्पादन बढ़ाएंगे। इससे रोजगार तैयार होगा। इसी कारण मार्च में यूएसटीआर ने सेक्शन 301 के तहत दो बड़ी जांच शुरू की। एक बंधुआ मजदूरी पर थीं और दूसरी उस पर जिसे यूएसटीआर ‘संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता’ कहता है और जो भारत सहित 16 अर्थव्यवस्थाओं के विनिर्माण क्षेत्रों में फैली हुई है। जांच में सौर मॉड्यूल, वस्त्र, स्वास्थ्य उद्योग, ऑटोमोबाइल वस्तुओं, पेट्रोकेमिकल्स, इस्पात और निर्माण सामग्री जैसे उद्योगों को शामिल किया गया। हालांकि ऐसी चिंताएं अक्सर चीन के राज्य-प्रेरित औद्योगिक मॉडल से जुड़ी होती हैं लेकिन भारत को भी इसके दायरे में लाया गया है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
बुधवार को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि भारत, अमेरिका के साथ सेक्शन 301 के तहत चल रही परामर्श प्रक्रिया में संलग्न रहेगा। इसके साथ ही इस वर्ष की शुरुआत घोषित प्रारूप व्यापार समझौते को भी आगे बढ़ाएगा। यूएसटीआर का प्रस्ताव स्पष्ट रूप से चल रही व्यापार बातांओं को और कठिन बना रहा है। रिपोर्टों में कहा गया कि यदि दोनों पक्ष समझौते पर पहुंच जाते हैं तो भारत पर सेक्शन 301 के तहत शुल्क नहीं लगाया जाएगा। यह भी बताया गया कि समझौता 99 फीसदी तक पूरा हो चुका था। नाई अनिश्चितता को देखते हुए, सरकार को अमेरिकी वार्ताकारों के सामने अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखना होगा। हालांकि अमेरिका की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था की समस्या यह है कि किसी भी बात को निश्चित नहीं माना जा सकता। अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि अमेरिका किसी समझौते के बाद भी नई शर्तें लगा सकता है। इस प्रकार, परिस्थितियां कुछ समय तक अनिश्चित बनी रहने की आशंका है और यह अनिश्चितता केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिकी प्रशासन अपने सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को निशाना बना रहा है। इससे वैश्विक अनिश्चितता और बढ़ सकती है तथा आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं।
Date: 04-06-26
एक और अग्निकांड
संपादकीय
दिल्ली में एक बार फिर आगजनी की घटना ने नगर व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। आंशिक रूप से अवैध एक होटल में बुधवार सुबह लगी आग के चलते दोपहर ढलने तक 20 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए। बताया जा रहा है, इस होटल को केवल छह कमरे की इजाजत थी, लेकिन वहां 25 कमरे बन गए थे। आग के कारणों का अभी स्पष्ट पता नहीं चला है, लेकिन जांच में दूध का दूध और पानी का पानी होना जरूरी है। दिल्ली पुलिस ने होटल में लगी आग की त्रासदी के लिए गैर इरादतन हत्या के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। यहां एक बार जरूर सोचना चाहिए कि जब नियम तोड़कर होटल चलाया जा रहा था, तब इस हादसे को इरादतन हत्या क्यों न माना जाए ? जो लोग सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं, बल्कि खिलवाड़ करते हैं, उन्हें अच्छे से पता होता है कि खतरा कितना बड़ा है। कम जगह में ज्यादा कमाई के लोभ में इंसानी जिंदगी से समझौता क्या गैर इरादतन हत्या है? जरा सोचिए, उनके बारे में, जिनकी जान चली गई। पूछिए शोक संतप्त परिजनों से कि जांच और न्याय की दिशा क्या होनी चाहिए?
मालवीय नगर के इस होटल में परत-दर-परत कोताहियां खुल रही हैं? अब इतने लोगों की जान जाने के बाद यह केवल कोताही नहीं, जघन्य अपराध है। क्या होटल में केवल एक ही प्रवेश निकास द्वार था ? ऐसे सवाल बहुत गंभीर हो गए हैं। पांच मंजिला इमारत में विदेशी भी मारे गए हैं। इस घटना ने पूरी राजधानी को झकझोर दिया है और यहां भवन सुरक्षा पर फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा के बुनियादी मानकों की अनदेखी अक्सर भारी पड़ती है, लेकिन वास्तव में पूरी कड़ाई से कार्रवाई और सुधार न करने की वजह से आगजनी की घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। गर्मी के दिनों में वैसे भी आगजनी होती है और दमकल को कुछ मशक्कत के बाद आग पर काबू करने में कामयाबी भी मिल जाती है, लेकिन इस आगजनी में पीड़ित जन भाग नहीं पाए। अगर होटल से निकलना आसान रहता, तो इतनी मौतें न होतीं । अनेक होटलों में यह देखा जाता है कि मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों से तमाम मुमकिन समझौते किए जाते हैं। किसी भी भवन में एक से अधिक निकलने के मार्ग होने ही चाहिए। खासकर होटलों या विश्रामगृहों में तो दो से अधिक निकासी मार्ग जरूरी हैं। दिल्ली के इस होटल में अगर बाहर निकलने के एकाधिक मार्ग होते, तो मेहमानों की जान यूं न जाती ।
यह अक्सर देखा जाता है कि होटलों को ऐसे किले में तब्दील कर दिया जाता है कि किसी हादसे की स्थिति में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। तपते जून में ही साल 1997 में उपहार सिनेमा अग्निकांड को दिल्ली और देश ने अभी भुलाया नहीं है। बेशर्म लापरवाहियों के चलते तब 59 लोगों की जान गई थी और 103 लोगों की जिंदगी मुश्किल से बची थी। उपहार हादसे के समय भी सिनेमा देख रहे लोग जान बचाने के लिए भाग नहीं पाए थे। बिजली कटने से अंधेरा हो गया था और भागने के रास्तों पर भी लगा दी गई कुर्सियां मौत का जाल बन गई थीं। क्या हमने उपहार अग्निकांड से कुछ सीखा है? क्या तब सरकार व गैर-सरकारी दोषियों को पर्याप्त सजा हुई थी ? कोई दोराय नहीं कि आग, जलभराव और भगदड़ से बचने के लिए दिल्ली में बुद्ध स्तर पर इंतजाम होने चाहिए। सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ थमना चाहिए। दिल्ली को एक मिसाल बनकर देश के सामने आना चाहिए। हर शहर को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि वह कितना सुरक्षित है?
Date: 04-06-26
डिजिटल दुनिया में भारत कितना आत्मनिर्भर
नितिन पई, निदेशक, ( तक्षशिला इंस्टीटूशन )
विभिन्न संगठनों व देशों द्वारा बनाए जाने वाले सूचकांकों में किसे, कहां और कैसा स्थान मिलेगा, यह बहुत कुछ राजनीतिक गुणा-गणित पर आधारित होता है। इसलिए, जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सूचकांक में 71वें स्थान पर रखता है और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी इसे शीर्ष के पांच देशों में शामिल करता है, तो इसे सिर्फ मानक या तकनीक की वजह से आया अंतर नहीं कहा जा सकता। बात कुछ और है। भारत ने दशकों तक ऐसे मानकों से अपना मूल्यांकन करवाया, जिन्हें कहीं और डिजाइन किया गया। उसमें ऐसे सवाल पूछे जाते थे, जिनके जवाब डिजाइन करने वालों के मुफीद बैठते थे।
‘इंडियन कौंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस’ की सालाना ‘स्टेट ऑफ इंडियाज डिजिटल इकोनॉमी (साइड)’ रिपोर्ट में इस कमी को दूर करने की कोशिश की गई है। ‘साइड’ का यह चौथा संस्करण है और इसका दायरा 71 देशों तक बढ़ाया गया है। भारत ने इसके लिए अब अपना ढांचा बनाया है। यह स्वदेशी ढांचा तीन कारणों से अहम है। पहला है निवेश, दूसरा राष्ट्रीय ब्रांडिंग और तीसरा कारण रणनीतिक है, जिस पर खास ध्यान देना चाहिए। सूचना युग में तकनीक भू-राजनीतिक सत्ता का जरूरी तत्व है। राजनीतिक जगत में तकनीक जिस तरह से काम करती है, इसकी सटीक समझ विदेश, रक्षा व आर्थिक रणनीतिकारों के लिए बहुत जरूरी है। ‘साइड’ की रिपोर्ट में उसकी पिछले 30 सालों में हासिल उपलब्धियों का बखान है। यह भारत को दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा डिजिटल देश बताता है। एआई क्षेत्र में इसे चौथे स्थान पर रखता है।
अमेरिका के बाद भारत में एआई प्रतिभाओं व डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (डीपीआई) का दूसरा सबसे बड़ा समूह मौजूद है। हमने डिजिटल माध्यम से 328 अरब डॉलर की सेवाओं का निर्यात किया है, पर ये उपलब्धियां वैश्वीकरण के सुनहरे दौर में हासिल हुई थीं। अब हम ऐसे दौर में हैं, जहां ताकतवर देश पूरी आपूर्ति शृंखला पर वर्चस्व चाहते हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत का डिजिटल कारोबार केवल सतही सेवाओं तक है, यानी यह सिर्फ इसके एप्लिकेशन व सेवाएं उपलब्ध कराता है, जबकि हमारी डिजिटल दुनिया कहीं और बने चिप्स, कंप्यूटर पावर, क्लाउड व मॉडलों पर निर्भर है।
इसे विस्तार से समझने के लिए एक ऐसे समुदाय की कल्पना कीजिए, जो खेती में पारंगत है और मुक्त व्यापार वाली दुनिया का हिस्सा है। वह शानदार फसलें उगाता है, पर कृषि कार्य के लिए ट्रैक्टर, पंपिंग सेट, बीज और सूखा-रोधी सिंचाई तंत्र विदेश से आयात करता है। जब तक दुनिया में मुक्त व्यापार चलता है, तब तक तो सब ठीक रहता है, पर जिस दिन ट्रैक्टर उत्पादक देश इसे देने से मना कर दे या बुवाई के ठीक समय पर उपकरण व बीज आदि की कीमतें बढ़ा दे, उस दिन उस समुदाय को पता चलता है कि उसकी समृद्धि हमेशा किसी और की सद्भावना पर टिकी थी। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था इसी तरह की है। देश के युवा टेक्नोलॉजी और वेंचर कैपिटल पेशेवर प्रणव हरि के अनुसार, हमारे प्रमुख आईटी सेवा उद्योग अब पेशेवरों को प्रतिघंटा भुगतान से हटकर एआई टोकन पर आधारित हो रहे हैं। तीन दशकों से अधिक समय से मानव श्रम पर आधारित मॉडल कुशल और सस्ता था। अब वेतन के बजाय टोकन से भुगतान होने पर 250 अरब डॉलर के निर्यात उद्योग में हो रहा लाभ खतरे में पड़ जाएगा।सवाल है, भारत क्या करे? इसका उत्तर है कि एक साथ तीन व्यापक कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, हमें जल्द से जल्द उन्नत चिप्स, कंप्यूटिंग क्षमता और मूलभूत मॉडल जैसे उपकरणों का संग्रह करना चाहिए, जिनका हम उत्पादन नहीं कर सकते। चुनौतियों के बावजूद अमेरिका-यूरोप के साथ संबंध बेहतर करें। दूसरा, मध्यम अवधि की नीति के तहत घरेलू सेमी-कंडक्टर, कंप्यूटिंग क्षमता और अच्छी तरह से वित्त-पोषित अनुसंधान आधार को बेहतर बनाएं। तीसरा और सबसे बड़ी चुनौती, अपने बाजार की व्यापकता का रणनीतिक रूप से उपयोग करें। हमें वैश्विक मानकों और नियमों को आकार देने और अपने डीपीआई मॉडल का निर्यात करने के तरीके भी खोजने होंगे। हमें उन जटिल उपकरणों के उपयोग सीखने होंगे, जिनका इस्तेमाल बड़े बाजार करते हैं।