25-05-2026 (Important News Clippings)
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Energy SavingThis is a Peak Win for Himalayas
ET Editorials
Few policy choices illustrate trade-offs between development and environmental stewardship as decisions concerning hydropower projects in the ecologically sensitive Himalayan region. Last week, GoI informed the Supreme Court that no new hydroelectric projects should be permitted in the upper reaches of the Ganga in Uttarakhand, apart from the 7 commissioned or substantially completed. The decision is welcome and should mark the first step towards a more ecologically sound approach to development.
It has taken more than a decade since the 2013 Kedarnath cloudburst and numerous other disasters for the ministries of power, environment and water resources to reach a consensus on hydel projects. GoI must now ensure that projects under construction comply with safeguards aimed at mitigating life-cycle impacts while also implementing environmental and socio-economic remedial measures. The consequences of these projects, along with economic and non-economic costs incurred during years of policy indecision over the region’s hydropower potential, cannot be overlooked.
Focus must now shift to restoration. The extensive body of submissions, expert reports and depositions should provide the foundation for a framework to assess the suitability of hydel and other infra projects in fragile ecosystems. Equally important is the creation of mechanisms for compliance with statutory safeguards and continuous oversight to ensure that projects do not undermine ecological stability or ecosystem services. The decision should also encourage a more rigorous accounting of the long-term environmental costs of development. Such costs, together with mitigation and remediation measures, must become integral to the appraisal and approval of all development projects.
घुसपैठियों की वापसी
संपादकीय
यह अच्छा है कि पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार पहले दिन से ही राज्य के हालात सुधारने वाले एक के बाद एक ठोस फैसले लगातार ले रही है। ऐसा समय की मांग भी है, क्योंकि ममता बनर्जी ने अपने 15 साल के शासन में कई मोर्चों पर राज्य को एक तरह से पटरी से उतारने का काम किया था। इसे देखते हुए शुभेंदु सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह तेजी के साथ निर्णायक फैसले ले। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बंगाल कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें से कई चुनौतियां ममता सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों का परिणाम थीं। तुष्टीकरण की इन्हीं नीतियों से उपजी समस्याओं से पार पाने के लिए पिछले दिनों शुभेंदु सरकार ने एक ओर जहां मजहबी आधार पर जारी नीतियों को समाप्त करने का फैसला लिया, वहीं दूसरी ओर कानून एवं व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए भी ठोस कदम उठाए हैं। इसी सिलसिले में उसकी ओर से बंगाल में रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिह्नित करने और उन्हें निकालने के लिए जो कदम उठाने शुरू किए हैं, उनकी सराहना की जानी चाहिए। इन कदमों के तहत घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें हिरासत केंद्र में रखा जाएगा। इसके लिए सभी जिलों में हिरासत केंद्र बनाए जा रहे हैं। सभी बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिह्नित कर उन्हें वापस भेजना आसान काम नहीं, लेकिन राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर यह करना ही होगा, क्योंकि एक तो उनकी संख्या बहुत अधिक है और दूसरे उनकी पहचान करना भी कठिन हो गया है। इसका कारण यह है कि तमाम घुसपैठिए फर्जी पहचान पत्र हासिल कर बंगाल के मतदाता बन चुके हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि मतदाता बने ये बांग्लादेशी घुसपैठिए राज्य के कई चुनाव क्षेत्रों के परिणाम को प्रभावित करने में उसी तरह समर्थ हो गए थे, जैसे कि असम में हो गए थे।
बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के अभियान को सुगम बनाने के लिए भारत सरकार को बांग्लादेश सरकार से भी संपर्क-संवाद करना होगा। बांग्लादेश सरकार के सहयोग के बिना अवैध रूप से भारत आए उनके नागरिकों को वापस भेजना कठिन हो सकता है। इस कठिनाई को हल करने का काम केंद्र सरकार को अपने हाथ में लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में बांग्लादेश से कोई घुसपैठ न होने पाए। यह एक तथ्य है कि अभी तक संकीर्ण राजनीतिक कारणों और सच कहा जाए तो वोट बैंक की सस्ती राजनीति के कारण बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ की अनदेखी ही नहीं हो रही थी, बल्कि एक तरह से उसे बढ़ावा भी दिया जा रहा था। यह सिलसिला दशकों से कायम था। दुर्भाग्य से ममता बनर्जी ने भी इस सिलसिले पर विराम नहीं लगाया। उलटे वह घुसपैठियों के समर्थन में आ खड़ी हुई थीं।
Date: 25-05-26
वैश्विक थपेड़ों से जूझता रुपया
शिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले देशवासियों से ऊर्जा की किफायत करने की अपील की और फिर चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण दुनिया में आर्थिक मंदी आ सकती है। उनके वक्तव्यों के पीछे चार चिंताएं काम कर रही थीं। होर्मुज जलमार्ग बंद होने से तेल, गैस और खाद के दाम डेढ़ गुना से अधिक हो गए जिसके कारण भारत का ऊर्जा और खाद आयात बिल लगभग डेढ़ गुना हो गया है। ऊर्जा और खाद के दाम बढ़ने से देश में महंगाई बढ़ने और बजट गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो गया है। विदेशी निवेशक पिछले दो साल से भारत से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं और अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने के आसार से इसकी रफ्तार और तेज हो सकती है। ऊर्जा और खाद के आयात का बिल बढ़ने और विदेशी पूंजी के पलायन से रुपया सस्ता हो रहा है, जिसकी वजह से आयात महंगे होते जा रहे हैं।
डालर की तुलना में रुपया दशकों से गिर रहा है जिसकी रफ्तार पिछले दशक में और बढ़ी है और वह 66 से गिरकर 96 पर जा पहुंचा है। इसमें से 6.1 प्रतिशत की गिरावट ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद से हुई है। रुपया डालर की तुलना में ही नहीं, बल्कि जापानी येन को छोड़कर लगभग हर हार्ड करेंसी की तुलना में कमजोर पड़ा है। पिछले साल भर में तो वह पाकिस्तानी रुपये और बांग्लादेशी टके की तुलना में भी 10 प्रतिशत से अधिक गिरा, जिसकी वजह से भारत में मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि पाकिस्तानी रुपये का ग्राफ देखें तो उसका भाव 2016 से 2024 के बीच डालर की तुलना में भारतीय रुपये से दोगुनी रफ्तार के साथ गिरा है। 2022 से 2024 के बीच बांग्लादेशी टके की भी यही हालत हुई। 2024 के बाद पाकिस्तानी रुपये और बांग्लादेशी टके की दरों में तो थोड़ी स्थिरता आई, लेकिन भारतीय रुपये के गिरने की रफ्तार कहीं तेज रही। रुपये की तुलना में इन दोनों मुद्राओं की कीमत में थोड़ा सुधार दिखाई देने की असली वजह यही है।
हकीकत यही है कि मुद्रा की विनिमय दर किसी देश की अर्थव्यवस्था की ताकत या कमजोरी का पैमाना नहीं होती। मिसाल के तौर पर जापानी येन का भाव इस समय लगभग 60 पैसे है। तो क्या भारत की अर्थव्यवस्था जापान से डेढ़ गुना मजबूत मान ली जाए? इसी तरह यूरो आने से पहले 1998 में एक रुपया 40 इतालवी लीरा का होता था। तो क्या भारत इटली से चालीस गुना विकसित था? किसी देश की मुद्रा की कीमत उसकी जीडीपी और जारी मुद्रा की संख्या के आधार पर तय होती है और विनिमय दर मुद्रा की मांग के आधार पर चढ़ती-गिरती है। जिस देश का निर्यात आयात से अधिक होता है और जिसकी मुद्रा को लोग निवेश के लिए जमा रखना चाहते हैं, उसकी मांग बढ़ती है। परिणामस्वरूप उसकी विनिमय दर भी बढ़ती है। हालात इसके उलट होने पर मुद्रा की मांग घटती है और विनिमय दर भी गिर जाती है। इसलिए न तो मुद्रा झंडे की तरह देश की आन होती है और न ही उसकी अर्थव्यवस्था का पैमाना।
भारत में सकल एफडीआइ या विदेशी निवेश की मात्रा में कमी नहीं आ रही। वह लगातार बढ़ रही है, लेकिन भारत से वापस जाने वाले विदेशी निवेश की मात्रा भी पिछले तीन सालों से बढ़ रही है। इसके दो कारण बताए जाते हैं। एक तो विदेशी निवेशक उन बाजारों का रुख कर रहे हैं जहां एआइ, सेमीकंडक्टर और डाटा के क्षेत्रों में नए आविष्कार हो रहे हैं। इन कंपनियों के दाम डाट-काम के दिनों की तरह हफ्तों के भीतर दोगुने-तिगुने होते जा रहे हैं। हालांकि बड़े विदेशी निवेशकों के लिए अपना निवेश एक साथ बेचना आसान नहीं होता, क्योंकि बेचने की भनक पड़ते ही दाम और मुनाफा गिरने लगता है। विडंबना इस बात की है कि उनकी यह मुश्किल भारत में लोकप्रिय हुए म्यूचुअल फंडों ने आसान की है। अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज का कहना है कि म्यूचुअल फंडों के जरिये निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों की मांग की आड़ में विदेशी निवेशक अपना पैसा शेयर बाजार में गिरावट लाए बिना निकाल कर वहां लगा रहे हैं, जहां एक महीने में उतना मुनाफा मिल रहा है जो भारत में एक साल में नहीं मिलता। दूसरा कारण खाड़ी से पैदा हुआ ऊर्जा संकट है, जिससे भारत का बजट गड़बड़ाने, व्यापार घाटा और महंगाई बढ़ने और रुपया गिरने का खतरा पैदा हो गया है। रुपया गिरने से विदेशी निवेशकों के निवेश की कीमत भी गिरती है। इसीलिए वे भाग रहे हैं।
रुपया गिरने से सरकार पर राजनीतिक दबाव भी पड़ता है, जिसे कम करने के लिए रिजर्व बैंक डालर बेचकर रुपये को सहारा देने की कोशिश कर सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व उपनिदेशक गीता गोपीनाथ का कहना है कि रिजर्व बैंक को अपना लगभग 700 अरब डालर का विदेशी मुद्रा भंडार रुपया उबारने में बर्बाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि सस्ता रुपया भारत के निर्यातकों को लाभ पहुंचाएगा। वे विदेशी मंडियों में कड़ी प्रतिस्पर्धा देकर अधिक माल बेच सकेंगे, जिससे विदेशी मुद्रा की आमद बढ़ेगी। हालांकि इसका दूसरा और राजनीतिक रूप से जोखिम भरा पहलू यह है कि रुपया सस्ता होने से आयात महंगे होंगे, जिनमें तेल और खाद प्रमुख हैं। इनसे हर चीज महंगी होगी और विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। तेल कंपनियों को प्रतिदिन हो रहे 750 करोड़ रुपये के घाटे को कम करने के लिए यदि पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ाए गए तो उससे मिली राहत से रुपये की गिरावट बेअसर हो जाएगी। इसलिए नीति आयोग के पूर्व प्रमुख अमिताभ कांत का कहना है कि इस संकट को अवसर में बदलकर उन कार्यों को पूरा करना चाहिए, जो हमें जलवायु रक्षा के लिए करने चाहिए थे। तेल और खाद के बढ़े हुए दामों से लोग दोनों की किफायत करने और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने को विवश होंगे। इससे जलवायु को बेहतर बनाने के साथ-साथ एआइ, ऊर्जा और डाटा भंडारण के क्षेत्रों में नई खोजों की प्रेरणा मिलेगी। असल में रुपये को स्थायी रूप से तभी उबारा जा सकता है जब निर्यात और विदेशी निवेश बढ़ें। ये दोनों काम आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों के बिना नहीं हो सकते।
योग्यता की कसौटी
संपादकीय
खेल की दुनिया में योग्यता-अयोग्यता की कसौटियां कई बार क्षमताओं को बाधित करने या फिर नजरअंदाज करने की हद तक चली जाती हैं। जबकि यह संभव है कि किसी खिलाड़ी को मैदान से बाहर करने के लिए जिन नियमों का हवाला जाता है, उनका कोई खास मतलब नहीं होता है। बस कुछ पूर्वाग्रहों की वजह से नियमों को बहाना बना लिया जाता है और एक सक्षम खिलाड़ी से उसके अवसर छीन लिए जाते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए भारतीय कुश्ती महासंघ को फटकार लगाई और कहा कि हमारे देश में मां बनना कोई गुनाह नहीं है और कुश्ती महासंघ को बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। अदालत ने महिला कुश्ती खिलाड़ी विनेश फोगाट को एशियाई खेलों के लिए होने वाली चयन प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है। भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट मां बनने के बाद अब फिर से कुश्ती के मैदान में उतरना चाहती हैं, लेकिन भारतीय कुश्ती महासंघ ने डोपिंग-रोधी नियमों का हवाला देते हुए विनेश फोगाट को 26 जून तक घरेलू प्रतियोगिताओं में खेलने के ‘अयोग्य’ घोषित कर दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया कि जब विनेश फोगाट देश की एक स्थापित और शीर्ष स्तर की पहलवान रही हैं, तो नियमों में अचानक बदलाव करके उन्हें खेलने से दूर रखने की कोशिश क्यों की जा रही है!
गौरतलब है कि विनेश फोगाट को भारत की सबसे कामयाब महिला पहलवानों में से एक माना जाता है। 2024 के पेरिस ओलंपिक में एक तकनीकी वजह से उनके करिअर में चुनौती सामने आई थी, लेकिन उससे पार निकल कर उन्होंने आगे का रास्ता देखा। कुछ समय पहले वे मां बनीं और मातृत्व अवकाश की वजह से वे थोड़े वक्त के लिए खेल से दूर रहीं। मगर यह उनके मैदान से बाहर होने का कारण नहीं हो सकता। दुनिया भर में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिसमें महिला खिलाड़ियों ने मां बनने के बाद भी खेल के मैदान में बेहतरीन प्रदर्शन किया और उपलब्धियां हासिल कीं। यों यह समय-समय पर साबित होता रहा है कि मातृत्व खेल क्षमताओं में बाधक नहीं है। बेहतर हो कि पूर्वाग्रहों या बदले की भावना के बजाय किसी खिलाड़ी की योग्यता का आकलन खेल में उसके सक्षम होने के आधार पर हो।