08-06-2026 (Important News Clippings)

Afeias
08 Jun 2026
A+ A-

To Download Click Here.


Date: 08-06-26

कई फायदों वाली प्लास्टिक मुद्रा

डॉ. सुरजीत सिंह, ( लेखक अर्थशास्त्री हैं )

यूपीआई और डिजिटल पेमेंट की क्रांति ने नि:संदेह भारत के वित्तीय परिदृश्य को नया रूप दिया है। आज देश भर में हर महीने लगभग 20 अरब से अधिक लोग यूपीआई का प्रयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसा भारत भी है, जहां किसान, मजदूर, स्थानीय बाजार, छोटे दुकानदार से लेकर ग्रामीण समुदाय आदि लेनदेन नकद में ही करते हैं। इससे नकद मुद्रा की मांग कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। आरबीआई के अनुसार 11.5 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी के साथ मुद्रा की मांग 42.86 ट्रिलियन (लाख करोड़) रुपये के स्तर पर पहुंच गई है। वर्ष 2024-25 में नोटों की छपाई पर 6372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। वर्ष 2024-25 में 23.8 अरब खराब नोट नष्ट किए गए, जो पिछले साल के 21.24 अरब नोटों के मुकाबले 12.3 प्रतिशत ज्यादा थे। हर साल हजारों करोड़ रुपये नोट छापने और नष्ट करने में खर्च होते रहेंगे, जब तक की कोई ठोस विकल्प नहीं अपनाया जाता। प्लास्टिक नोट इसका ठोस विकल्प देते हैं।

प्लास्टिक नोट पालीप्रोपाइलीन नामक एक विशेष सिंथेटिक प्लास्टिक से बनते हैं। ये साधारण नोट जैसे ही लगते हैं, लेकिन इनकी उम्र पांच से सात गुना अधिक होती है। प्लास्टिक नोट पानी, गंदगी और फटने के प्रति काफी ज्यादा प्रतिरोधी होते हैं। लंबे समय तक अपनी बनावट बनाए रखते हैं। नमी वाले तटीय इलाकों से लेकर धूल भरे इलाकों तक में ये टिकाऊ होते हैं। इसका एक और बड़ा फायदा सुरक्षा के मामले में है। आज के समय में नकली करेंसी दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। प्लास्टिक के नोट सुरक्षा बढ़ाने के सबसे असरदार तरीकों में से एक बनकर उभरे हैं, क्योंकि इन नोटों में माइक्रो-आप्टिक विशेषताएं, होलोग्राफिक तत्व और खास तरह की स्याही इन्हें विशिष्टता प्रदान करती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना न सिर्फ मुश्किल होता है, बल्कि आम लोगों के लिए इन्हें पहचानना भी आसान होता है। प्लास्टिक के नोटों की चिकनी सतह पर सूक्ष्मजीव उतनी आसानी से नहीं टिक पाते हैं। आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, रोमानिया सहित लगभग 60 देशों में प्लास्टिक मुद्रा चलन में है। भारत प्लास्टिक मुद्रा पर 2009 से विचार कर रहा है। 2012 में कोच्चि, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में दस रुपये के प्लास्टिक नोट के परीक्षण की बात हुई थी, परंतु तब योजना शुरू होने से पहले ही अधर में लटक गई थी, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं।

आज का भारत पूरी तरह से प्लास्टिक नोटों के लिए तैयार है, परंतु आरबीआई को क्रमबद्ध और दृढ़ता से परिपूर्ण कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, घरेलू छपाई क्षमता विकसित करनी होगी। भारतीय मुद्रणालयों-नासिक, देवास, मैसुरु और सालबोनी को प्लास्टिक कागज पर मुद्रण के लिए तकनीकी रूप से तैयार करना होगा। चाहे किसी भी देश से तकनीकी सहयोग लिया जाए, परंतु छपाई में स्वनिर्भरता अनिवार्य है। दूसरे कदम के रूप में चरणबद्ध तरीके से दस और बीस रुपये के नोटों से ही पायलट परीक्षण की शुरुआत करनी चाहिए, क्योंकि ये सर्वाधिक प्रचलित और सबसे जल्दी खराब होने वाले नोट हैं। अलग-अलग जलवायु वाले शहरों में इनका परीक्षण हो, जहां नमी भी हो, मैदानी गर्मी भी और पहाड़ी ठंड भी। तीसरा और व्यावहारिक कदम होगा एटीएम अवसंरचना के आधुनिकीकरण एवं मशीनों को अपग्रेड करने की तैयारी। बैंकों और एटीएम निर्माताओं के साथ मिलकर एक टाइमलाइन बनाई जाए। चौथी जरूरत है जन-जागरूकता की।प्लास्टिक के नोट कैसे दिखते हैं, कैसे पहचाने जाते हैं, इनकी असली-नकली की जांच कैसे होती है, यह जानकारी आम जनता तक आसान भाषा में, और जरूरी हो तो क्षेत्रीय भाषाओं में पहुंचाई जाए। पांचवें कदम के रूप में प्लास्टिक के पुराने नोटों के निपटान की पर्यावरण-सम्मत योजना बनाई जानी चाहिए, जिससे प्लास्टिक नोटों को पुनर्चक्रित किया जा सके।

कुछ लोगों का तर्क हैं कि जब यूपीआई इतना व्यापक हो चुका है तो प्लास्टिक नोटों पर इतना ध्यान क्यों दिया जाए। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन जमीनी सच्चाई से कटा हुआ है। भारत के सात लाख से अधिक गांवों में से एक बड़ी संख्या में अभी भी निर्बाध इंटरनेट उपलब्ध नहीं है। वृद्धजन, दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों लोगों के लिए नकद मुद्रा ही जीवन का आधार है। और जब बिजली जाती है, सर्वर डाउन होते हैं या मोबाइल चार्ज नहीं होता, तब भी नोट काम करता है। यूपीआई और नकद परस्पर-विरोधी नहीं हैं। ये दोनों ही भारत की अर्थव्यवस्था को आधार प्रदान करते हैं। भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की चुनौतियों को भी ध्यान में रखकर निर्णय लेने होंगे। प्लास्टिक मुद्रा केवल कागजी नोटों की सामग्री बदलने का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग, नकली मुद्रा पर नियंत्रण, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें प्रारंभिक निवेश निश्चित रूप से अधिक होगा, किंतु आने वाले वर्षों में यह निवेश हजारों करोड़ रुपये की बचत, बेहतर सुरक्षा और अधिक सक्षम मुद्रा व्यवस्था के रूप में देश को प्रतिफल देगा।


Date: 08-06-26

‘ब्रांड इंडिया’ के कौन हैं सबसे बड़े शत्रु ?

शेखर गुप्ता

एक सवाल मेरे मन में महीनों से पक रहा है: भारत को ब्रांड के रूप में सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाली बात कौन सी है। आर्थिक सुधारों की शुरुआत के तीन दशक बाद और भारत के विकसित देशों का चहेता बनने बाद हालात बदल क्यों गए?

निवेशक अपना पैसा निकाल कर भारत से बाहर जा रहे हैं जबकि विदेशी पर्यटकों आगमन भी 2019 कम है। मैं इसके पक्ष में एक उचित तर्क की तलाश में था। यह तब तक नहीं मिला जब तक कि नई दिल्ली के मालवीय नगर में एक अनधिकृत बेड ऐड ब्रेकफास्ट (बीएडबी) होटल में आग नहीं लगी जिसमें इस आलेख को लिखे जाने तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में कई व्यक्तिगत कारक ब्रांड को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। इनमें सबसे गंभीर तीन हैं कचरा, वायु की गुणवत्ता और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा । फिलहाल ये सब मिलकर एक बड़े संकट का रूप ले चुके हैं प्राकृतिक तत्वों से बचने की जद्दोजहद को इसमें जोड़ दीजिए। सच कहें तो इसे शहरी कुप्रशासन का घोटाला कहना चाहिए।

आप दूरदराज के गांवों या जर्जर छोटे कस्बों से भारत के सबसे लाड़-प्यार वाले शहर में आते हैं जहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश और निश्चित रूप से सबसे प्रमुख पत्रकार और आंदोलनकारी रहते हैं जिन्हें नागरिक समाज का विवेकपूर्ण संरक्षक माना जाता है। फिर भी जब आप सोने जाते हैं तो यह निश्चित नहीं होता कि रातोरात आग या इमारत गिरने से आपकी जान न चली जाए।

सिर्फ एक सप्ताह पहले यानी 30 मई को दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छह सबसे प्रतिभाशाली युवा भारतीयों की मौत हो गई। वे साकेत मेट्रो स्टेशन के पास एक अन्य अनधिकृत बहुमंजिला इमारत के पास रह रहे थे। जो अब आग से प्रभावित बीऐंडबी से कुछ ही किलोमीटर दूर है। इसमें जोड़ दीजिए लगातार हो रहे पेपर लीक और परीक्षाओं के रद्द होने की घटनाएं और फिर यह पूछने की जरूरत नहीं रह जाती कि भारत के युवा इतने आक्रोशित क्यों हैं।

वास्तव में हमारे शहरों की स्थिति ही भारत की सबसे बड़ी ब्रांड विध्वंसक है। खराब हवा, पानी, ट्रैफिक, पुलिसिंग, महिलाओं का उत्पीड़न आदि यहां सब मौजूद है और दुर्भाग्य से हम लोग इसे सामान्य मान चुके हैं। बस जब वैश्विक रैंकिंग लगातार हमारे शहरों को सबसे कम रहने योग्य सूचीबद्ध करती है तो हमारी पतली राष्ट्रवादी चमड़ी पर चकत्ते उभर आते हैं। व्यक्तिगत सुरक्षा, हालांकि, इन सब से ऊपर है। खासकर उन लोगों के लिए जिनका घर भारतीय शहरों के अलावा कहीं नहीं है। आइए राजधानी के अग्नि सुरक्षा रिकॉर्ड पर नजर डालें। वर्ष 2019 में करोल बाग के एक छह मंजिला होटल में आग लगी और 17 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष अनाज मंडी की आग ने 45 लोगों की जान ले ली जिनमें नौ नाबालिग भी शामिल थे। अभी हम केवल बड़ी आग की घटनाओं की गिनती कर रहे हैं। 2022 में मुंडका में एक चार मंजिला वाणिज्यिक इमारत में आग लगी और 27 लोग दम घुटने से मारे गए। दो साल बाद पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार में एक नवजात शिशु देखभाल इकाई में आग लग गई जिसमें आठ नवजात शिशुओं की मौत हो गई।

ये तो सिर्फ प्रमुख घटनाओं की सूची है जो एक-दो दिन के लिए सुर्खियां बनीं। यदि आप दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़े देखें तो चौक जाएंगे। या शायद नहीं क्योंकि हम इस खतरनाक अराजकता में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। वर्ष 2019-20 में दिल्ली में आग से 308 लोगों की मौत हुई, अगले वर्ष कोविड लॉकडाउन के बावजूद 346 मौतें हुई। फिर 2021-22 में यह बढ़कर 591 हो गई। 2022-23 में लगभग दोगुनी होकर 1,029 और 2023-24 में बढ़कर 1,303 तक पहुंच गई। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है। दिल्ली में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है। कई क्षेत्रों का विकास हुआ है और कनेक्टिविटी सुधरी है। लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि अधिकांश आपदाएं उन इमारतों और क्षेत्रों में हुई हैं जिन्हें अलग- अलग तरह से अनधिकृत, अवैध या अनियमित कहा जा सकता है। यहां क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली के मूल गांव नक्शे पर लाल धागे से घिरे हुए हैं। इसीलिए इन्हें लाल डोरा कहा जाता है और वहां अधिकांश शहरी कानून या नियम लागू नहीं होते। भला होंगे भी कैसे क्योंकि ये तो गांव हैं?

मालवीय नगर की आग और साकेत की इमारत गिरने जैसी सभी प्रमुख घटनाएं इन्हीं इलाकों में हुई हैं। मालवीय नगर का बीऐंडबी हौज रानी में था जबकि साकेत की इमारत महरौली के सईद उल अजैब में थी। दोनों शहरी गांव हैं। यहां होटल या बीऐंडबी चलाने के लिए कुछ लाइसेंस ने लेने पड़ सकते हैं। लेकिन शहरी गांव या जिसे आमतौर पर लाल डोरा क्षेत्र कहते हैं, वहां आप जैसा चाहें वैसा निर्माण कर सकते हैं क्योंकि आखिर वह हैं तो गांव ही। यदि आप मालवीय नगर और साकेत सहित राजधानी की नियमित कॉलोनियों में रहते हैं तो वहां निर्माण की ऊंचाई और मात्रा पर कई तरह की सीमाएं होती हैं। लेकिन लाल डोरा इलाके में आप अपने स्तर पर गगनचुंबी इमारतें बना सकते हैं। अक्सर इन्हें बिना कॉलम के एकल ईंट संरचना के रूप में बनाया जाता है। अगर खुदा न खास्ता रिक्टर स्केल पर 6 की तीव्रता का भूकंप आ गया तो ये तुरंत मलबे में बदल जाएंगी।

हमारे शहरी शासन का सबसे बड़ा अभिशाप यह नहीं है कि अधिक मतदाता इन झुग्गीनुमा गांवों या अनधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं बल्कि यह है कि राजनीतिक वर्ग उनका जीवन स्तर सुधारने के बजाय उन्हें खुश करने में लगा रहता है। राजधानी में हर चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की एक प्राथमिकता होती है अवैध कॉलोनियों को नियमित करना। कोई भी राजनीतिक दल नवीनीकरण का वादा करने में फायदा नहीं देखता है। यहां तक कि अब तक स्थापित झुग्गी पुनबांस कार्यक्रम की तर्ज पर भी नहीं। लोगों को उनके अवैध निवास से अस्थायी आवास में स्थानांतरित करना, वहां पुनर्विकास करना और उन्हें वहीं आधुनिक, सुरक्षित आवास स्वामित्व अधिकारों के साथ देना। यह बहुत बड़ा काम है और जो एक चुनावी चक्र में पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में इस तरह के कामों में नेताओं की भी रुचि नहीं होती है। इस प्रक्रिया में हमारे शहर गेट वाली कॉलोनी तथा अन्य लोगों में बंट गए हैं। अन्य लोग अधिकतर अवैध रूप से रहते हैं। उनके पास मतदान की शक्ति है लेकिन उन्हें मुफ्त उपहारों के जरिये या उनकी अवैध बसाहट को नियमित करने का वादा करके खरीदा जा सकता है। इस विशाल शहरी बहुमत को न्यूनतम अपेक्षाओं पर जीने के लिए मूर्ख बनाया गया है। मुंबई एक दिलचस्प उदाहरण है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार के तहत वहां बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी में भारी सुधार हुआ है। इनमें शानदार नया कोस्टल रोड भी शामिल है। लेकिन इसके चालू होने के बाद मुंबई की कई यात्राओं में मैंने उस पर एक भी सवारी बस नहीं देखी। और हमें लगा कि अलग बस लेनऔर कामकाजी वर्ग के यात्रियों की सुविधा इसके वादों में शामिल थी। नई मेट्रो बेहतरीन है लेकिन गरीब कामकाजी वर्ग के लिए महंगी है। सबसे सस्ता सफर अब भी लोकल ट्रेन या बस ही है।

मैंने कई बार लिखा है कि हमारे राजनेता शहरों के साथ इतना बुरा व्यवहार इसलिए करते हैं क्योंकि उनके मतदाता गांवों में रहते हैं। वे गांवों के वोट से सत्ता हासिल करते हैं और फिर शहरों में आकर धन लूटते हैं। बाबासाहेब आंबेडकर ने ग्राम स्वराज पर आधारित गांधीवादी संविधान के विचार का विरोध किया था। उन्होंने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में पूछा था, ‘गांव क्या है, स्थानीयता का कीचड़ भरा हौदा है, अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का अड्डा है।’ वे उस तर्क में आंशिक रूप से ही जीत पाए। हमारी राजनीति योजनाबद्ध शहरीकरण से कतराती रही है, जबकि विश्व बैंक के अनुसार अब भारत की 35 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है और आर्थिक समीक्षा का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह 40 फीसदी से अधिक हो जाएगा। किसी भी महत्त्वाकांक्षी विकासशील देश की तरह भारत का उद्देश्य है अधिक लोगों को खेती से उद्योग और सेवाओं में लाया जाए, यानी गांवों से शहरों में इसके लिए हमारे शहरों की नए सिरे से कल्पना करनी होगी और नए शहर बनाने होंगे, जहां नए आने वालों के लिए रहने और आने-जाने की जगह हो । समय के साथ वे मूल्य श्रृंखला में ऊपर बढ़ेंगे। यह चुनौतीपूर्ण है लेकिन अब तक चला आ रहा ढर्रा अब कारगर नहीं होगा। यह ब्रांड इंडिया को नुकसान पहुंचाने वाला बड़ा कारण बना रहेगा।


Date: 08-06-26

उम्मीदों के समांतर

संपादकीय

आभासी दुनिया में एक तंज और मजाक के साथ शुरू हुआ अभियान तथा काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के गठन को बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। मगर इसकी शुरुआत करने वाले कुछ युवाओं ने सीजेपी के बैनर के साथ शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जिस तरह के विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया और उसमें युवाओं की जैसी भागीदारी देखी गई, उसे एक नई बयार के तौर पर देखा जा रहा है। इस प्रदर्शन में खासी संख्या में युवाओं ने हिस्सा लिया और नीट-यूजी 2026 में प्रश्नपत्र लीक होने के संदर्भ के साथ सरकार पर कई सवाल उठाए। खासतौर पर इन आरोपों के साथ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई कि देश में शिक्षा व्यवस्था आज बर्बाद हो चुकी है, प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं, बच्चे परेशान हैं और उनमें से कई ने आत्महत्या कर ली। गौरतलब है कि नीट-यूजी के प्रश्नपत्र लीक होने और इस मामले के तूल पकड़ने के बाद परीक्षा रद्द किए जाने से लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के सामने उपजी परेशानी पिछले कुछ दिनों से राजनीति की मुख्यधारा के बीच भी अहम मुद्दा बनी हुई है और सरकार इस मसले पर बचाव की मुद्रा में है।

ऐसे में हाल ही में उभरी सीजेपी ने जिस तरह इस मुद्दे को आवाज दी है, उससे विद्यार्थियों और युवाओं के बीच एक नई उम्मीद पैदा हुई है। हालांकि काकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू अभियान को आभासी दुनिया के एक तात्कालिक गुबार के तौर पर ही देखा गया था। मगर सड़क पर प्रदर्शन और उसमें लोगों की भागीदारी के बाद अब सीजेपी ने खुद को एक विकल्प के तौर पर पेश किया है। हालांकि पार्टी का नाम शायद एक व्यंग्य का रूपक है, लेकिन इसने जो मुद्दे उठाए हैं, उसने युवाओं का ध्यान आकर्षित किया है। अब यह देखने की बात होगी कि देश में राजनीति का फलक जितना विस्तृत, जटिल और चुनौतियों से भरा है, उसमें सीजेपी अपना कितना विस्तार कर पाएगी। इससे पहले कुछ लोकप्रिय मुद्दों के साथ आम आदमी पार्टी के उभार ने भी भारतीय राजनीति में एक उम्मीद पैदा की थी। यही वजह है कि आभासी दुनिया से जमीन पर उतरी सीजेपी को लेकर भी लोगों के भीतर कई तरह की आशंकाएं हैं और इसे सावधानी के साथ देखा जा रहा है।


Date: 08-06-26

बढ़ती रहे भारत की आर्थिक ताकत

आलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )

पिछले कुछ दिनों से भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी तबकों में चर्चा और विमर्श के केंद्र में आ गई है। ईरान युद्ध और कच्चे तेल के दामों का असर आस-पास दिख ही रहा है, साथ में शेयर बाजार की भारी उठापटक भी रोज लोगों के दिल दहलाती आ रही है। आम आदमी को पेट्रोल-डीजल के दाम चुभने लगे हैं और चाहे-अनचाहे उसे महंगाई का डर भी सताने लगा है।

कुछ अर्थशास्त्री भी डरावने हालात की तरफ इशारा कर रहे हैं। खासकर उन अर्थशास्त्रियों की चर्चा ज्यादा हो रही है, जो पिछले कई साल से इस सरकार के बड़े समर्थक रहे हैं, लेकिन अब किसी न किसी कारण से आर्थिक नीतियों या सरकार के फैसलों पर उंगली उठाने लगे हैं। इस बीच दो ऐसी खबरें आ गईं, जिनसे चर्चा और गर्म हो गई। पहली थी, भारत के शेयर बाजार में सारे शेयरों की कुल कीमत (मार्केट कैपिटलाइजेशन) दुनिया में पांचवें नंबर से खिसककर पहले छठे और फिर सातवें नंबर पर पहुंच गई है और दूसरी खबर थी, एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी का यह दावा कि मई के अंत में भारत ने करीब 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया है। दोनों ही खबरें चटपट सुर्खियां बन गईं।

आखिर भारत का शेयर बाजार अचानक दुनिया की रेस में पिछड़ता क्यों दिख रहा है, जबकि देश की अर्थव्यवस्था ने पूरे साल उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है? यह चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि मात्र डेढ़-दो साल पहले भारत दुनिया के शेयर बाजारों में मार्केट कैप के पैमाने पर पांचवें पायदान पर पहुंच गया था। अठारह महीने पहले के आंकड़े देखें, तो भारत का शेयर बाजार दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार से साढ़े तीन गुना और ताइवान से दोगुने से ज्यादा था, पर आज कोरिया भी भारत से आगे निकल चुका है। ताइवान तो उससे एक महीने पहले ही भारत को पीछे छोड़ चुका था।

हालांकि, भारत का बाजार कुछ खास नहीं गिरा है। अब भी यह 4.8 ट्रिलियन डॉलर के करीब या दुनिया के बड़े बाजारों में से एक है, लेकिन पहले ताइवान और फिर दक्षिण कोरिया पांच ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कैप पार करके भारत से आगे निकल गए हैं। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि विदेशी निवेशक भारत के बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। सिर्फ 2026 में अब तक वे भारत से करीब 26 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। जबकि, दूसरी तरफ ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजार इसी दौरान तूफानी रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

उनकी बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह है, कृत्रिम मेधा या एआई का धूम-धड़ाका। जिस अंदाज में एआई हमारे जीवन के हर पहलू को जकड़ता जा रहा है, उससे दुनिया भर के बड़े-छोटे निवेशक सम्मोहित हो चुके हैं। इसीलिए एआई और सेमीकंडक्टर वाली कंपनियों में पैसा लगाने की होड़ लगी है। सेमीकंडक्टर या चिप बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है- ताइवान सेमीकंडक्टर कॉरपोरेशन (टीएसएमसी)। दक्षिण कोरिया में सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसी कंपनियां भी इस कारोबार का एक अहम हिस्सा हैं। एआई से सम्मोहित निवेशक अब इन कंपनियों के शेयरों में जमकर पैसा लगा रहे हैं। क्या आलम है, इसे यूं समझिए कि ताइवान के स्टॉक मार्केट इंडेक्स में करीब 42 फीसदी की हिस्सेदारी टीएसएमसी की है। इस साल इसका शेयर डेढ़ गुना हो चुका है। दुनिया भर के निवेशक तो इसके पीछे भाग ही रहे हैं, सरकार भी उनका रास्ता आसान कर रही है। ताइवान के म्यूचुअल फंड किसी एक कंपनी में अपनी कुल रकम का कितना हिस्सा लगा सकते हैं, इस नियम में ढील दे दी गई है। अंतरराष्ट्रीय निवेश संस्थानों का अनुमान है कि सिर्फ इसी वजह से ताइवान में लगभग छह अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश आ सकता है।

भारत के लिए परेशानी की बात यह है कि यहां लिस्टेड कंपनियों में कोई भी ऐसी बड़ी कंपनी नहीं है, जो एआई या सेमीकंडक्टर कारोबार में दुनिया की दिग्गज कंपनियों के सामने खड़ी हो। तो क्या इसका मतलब है कि भारत की अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है? इसका जवाब देने से पहले दूसरी खबर का भी हिसाब लगा लेना बेहतर होगा। क्या रिजर्व बैंक ने वाकई 12 अरब डॉलर का सोना बेच दिया? इतिहास में पहली बार? बहुत खस्ता आर्थिक स्थिति में भी बस एक उदाहरण है, जब भारत ने अपना सोना गिरवी रखा था, इसीलिए सोना बेचने की चर्चा होते ही इस पर बवाल मच गया। यह खबर समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग के हवाले से आई थी, जिसमें कहा गया था कि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव से मुकाबले के लिए आरबीआई ने मई के अंत में करीब 12 अरब डॉलर का सोना बेचा हो सकता है। रिजर्व बैंक ने बाकायदा बयान जारी कर इस खबर को गलत बताया और गुरुवार की रात ब्लूमबर्ग ने भी इस खबर को गलत बताते हुए वापस ले लिया, मगर हंगामा तो बरपा हो ही चुका था।

फिर भी, क्या भारत की अर्थव्यवस्था खतरे में है? एक बड़ा संकट तो सामने खड़ा है, जो ईरान-अमेरिका के बीच स्थायी शांति-समझौता होने तक खड़ा रहेगा। मगर भारत की घरेलू मांग, नौजवान आबादी, बुनियादी ढांचे पर खर्च, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की नीति और मजबूत बैंकिंग प्रणाली ऐसी चीजें हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती दिखाती हैं। शेयर बाजार में भी घरेलू संस्थानों या छोटे निवेशकों की एसआईपी से आने वाले पैसे का प्रवाह मजबूत बना हुआ है।

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अगर ईरान की लड़ाई से उपजी महंगाई की आशंका को किनारे रख दें, तब भी तेज आर्थिक वृद्धि के बरअक्स अच्छे रोजगार के मौके जरूरत के मुताबिक नहीं पैदा हो रहे। दूसरा, निर्यात के मोर्चे पर भारत को तमाम एशियाई देशों से ही पार पाना मुश्किल हो रहा है। आयातित तेल पर निर्भर होने के अपने दर्द हैं, पर इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती प्रौद्योगिकी की है। एआई और आधुनिकतम तकनीक की दुनिया में भारत काफी कमजोर स्थिति में दिखता है। यहां उपभोक्ता बनकर गुजारा नहीं होने वाला है। नई तकनीक के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर, दोनों ही पक्षों में भारत की मौजूदगी बहुत कम है।

शेयर बाजार के छठे या सातवें नंबर पर पहुंचने का कोई खास अर्थ नहीं है, लेकिन अगर नई तकनीक के मोर्चे पर भारत पिछड़ता रहा, तो आने वाले कुछ सालों या दशकों में विश्व से कदम मिलाकर चलना भी मुश्किल होगा। चुनौती यही है कि क्या अब भारत एक निर्णायक छलांग लगाकर दिखाएगा, जो उसे सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक व उद्योग के मोर्चे पर एक महाशक्ति भी बना सके?