27-06-2026 (Important News Clippings)

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27 Jun 2026
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Date: 27-06-26

The Loneliness Inside A Full Life

Sivakumar.Sundaram

Picture a Sunday evening in a crowded flat. The cooker is on its third whistle, a cousin is shouting cricket scores from the hall, exam timetables are stuck to the fridge, and the family WhatsApp group has pinged 40 times since lunch. In the middle of all that noise, a woman stands at the kitchen counter and feels something she would never say aloud- that it has been a long while since anyone truly saw her.

She is not abandoned. She is surrounded. And still, somewhere under the ribs, there is a quiet ache. We have a clumsy modern word for it now: Loneliness. But the ache is older than the word. It may be the oldest hunger we carry.

For six Saturdays now, over the last one year, this column has studied love mostly where it goes wrong- closeness that suffocates in The Filter Coffee of Love, expectations that harden into cages, ties that must finally be cut in The Falling Dagger, bonds that allow no exit, the mind’s quiet turning after a love we did not choose to lose, boundaries as oxygen lines on a Mumbai balcony.

A reader’s letter last week pulled me back to the question hiding underneath all the others. If love is this much trouble – this jealous, this fragile, this hard to hold – why do we keep reaching for it at all? Why does everyone, in the end, need a lover?

Because “lover” is a far larger word than we allow it to be. For some, the lover is the Divine itself. This is the love of Meera and Andal. For some, the lover is a guru-a voice, a pair of hands that point us gently back towards our own depths. And for most of us, the lover is a partner-a husband, wife, companion, man or woman according to one’s own nature, a bond built quietly out say without flinching, wears on the body somewhat as of trust, respect, desire, the willingness to be known.The form changes, the need does not.

We have shrunk the word yog to mats and 6am alarms, but at its root it means something simpler and far older. Yuj-to yoke, to join, to make two into one. The body and the mind carry a constant, low longing to find their other half. This is why love, in any of its forms, never feels like one more item added to a life. It feels like a homecoming.

A lover is simply whoever quiets the restless gap between the stillness they bring. The true lover is the one in what we are and what we keep reaching for.

This is not poetry alone. The longest study of human life ever attempted-Harvard’s, now in its eighth decade, having followed hundreds of lives from youth into old age-set out to learn what makes us flourish. Not wealth, not fame, not even cholesterol turned out to be the great predictor of a long and contented life. It was the warmth of our close relationships. Loneliness, researchers now say without flinching, wears on the body somewhat as smoking does. The heart that lives outside of union does not merely grieve, it ages faster.

But there is a peculiar cruelty in our moment. Ours is not the loneliness of the deserted island. It is loneliness inside a full life-the crowded household, packed calendar, phone that buzzes all day with everyone, except the one person who might truly see us. We are the most connected generation in history and, by many counts, among the loneliest. Surveys of urban India keep finding the ache rising fastest among the young and the most digitally fluent. We have mistaken contact for communion. A hundred likes are not love, and being copied on the group is not the same as being known.

What of the sanyasi and monks who live long, serene lives with no partner at all? The renunciates have not killed the need for love, only redirected it, their lover is the Divine. And the same grace is open to those whom life has left unpartnered, for whatever reason or circumstance. There is someone waiting. Seek them, and take whatever form life allows, for no one is disqualified from union. We only arrive by different doors.

So how do we recognise the true lover when they arrive? Not by the heat of the desire they stir, but by the stillness they bring. The true lover is the one in whose presence the war inside us finally goes quiet. A lover is how the human being completes itself. We were not built to be self-sufficient, but to be in union.

So, choose love in whatever shape your life offers it -divine, devotional, or shared between two people – and then guard it like the oxygen line it is. Because a life in union is not a life with one more thing added to it. It is a life that has, at last, come home.


Date: 27-06-26

राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी नैतिक पतन की पराकाष्ठा है

संपादकीय

रामचरितमानस के उत्तरकांड के काकभुशुंडि-गरुड़ संवाद में भगवान कहते हैं- निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट, छल, छिद्र न भावा । मर्यादा पुरुषोत्तम चोरी या छल-कपट से नहीं पाए जा सकते। लेकिन राम मंदिर के व्यवस्था प्रबंधन के लिए क्या चंद लोग भी ऐसे नहीं मिले, जो निर्मल मन के हों और जो चढ़ावे के पवित्र धन को चौर्य-वृत्ति से दूर रखें ? इस घटना से मंदिर में चढ़ावा आना अचानक कम हो गया है। इसका सीधा मतलब है भक्तों की आस्था मंदिर के रखवालों पर कम हुई है। इसके दो बड़े नुकसान हैं। सर्वव्यापी ईश्वर की पूजा-अर्चना तो कहीं भी की जा सकती है। लेकिन किसी मंदिर – विशेष में जाने का उद्देश्य होता है भगवान् की मूर्ति या मूर्तियों, उस स्थल और परिसर का महात्म्य और वहां पहुंचकर उससे अपने को जोड़ना चढ़ावे का भी आशय होता है। भक्त का उस महात्म्य के बाहरी आवरण को बनाए रखने में अपना योगदान यह मानते हुए देना कि जो उसके पास है वह सब ईश्वर का दिया है। उसे हड़पना अपराध की निकृष्टतम श्रेणी में तो आता ही है, नैतिक पतन की भी पराकाष्ठा है। साथ ही मंदिर निर्माण व विस्तार के लिए जमीन खरीद में भी घपले की ख़बरें आई हैं। आश्चर्य यह है कि सिस्टम वर्षों तक सोता रहा और व्यवस्था में लगे लोग खुलेआम यह सब कुछ करते रहे। यह सबके लिए आत्मावलोकन का क्षण है।


Date: 27-06-26

एआई के खिलाफ अमेरिका में गुस्सा भड़क रहा, दस लाख करोड़ रु. के प्रोजेक्ट रद्द

संपादकीय

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में हो रही तेज प्रगति को लेकर तकनीकी विशेषज्ञ शुरू से चिंतित रहे हैं, लेकिन अब आम लोग भी इसे लेकर असहज महसूस करने लगे हैं। पश्चिमी देशों में एआई की लोकप्रियता घट रही है और यह तेजी से राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी विरोध बढ़ रहा है। दक्षिण कोरिया में चिप निर्माता कंपनियों के मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी के बाद सैमसंग के कर्मचारियों ने विशेष बोनस की मांग करते हुए हड़ताल की चेतावनी दे दी है।

अब तक सबसे तीखी बहस अमेरिका में देखने को मिली है। वहां एआई के विरोध में डेटा सेंटरों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के कारण करीब 10 लाख करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट अटक गए हैं। वहीं, करीब 40% अमेरिकी मतदाता चाहते हैं कि अधिकांश उद्योगों में एआई के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। एआई के विरोध का एक कारण यह भी है कि एआई कंपनियों के प्रमुख लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि एआई करोड़ों नौकरियां खत्म कर सकता है या फिर एआई द्वारा तैयार किया गया कोई सुपर- वायरस मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है।

अमेरिका में एआई निवेश केवल तकनीकी केंद्रों तक सीमित नहीं है। अमेजन, गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और ओरेकल जैसी कंपनियां मिशिगन, विस्कॉन्सिन, ओहायो, लुइसियाना, मिसीसिपी और टेक्सास समेत कई राज्यों में भविष्य के डेटा सेंटरों पर 70.85 लाख करोड़ रुपए निवेश कर रही हैं। अनुमान है कि 2026 से 2030 के बीच दुनिया में एआई डेटा सेंटरों पर 283 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके चलते एआई की कंप्यूटिंग क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। अमेरिका में डेटा सेंटरों की बिजली खपत मौजूदा 12 गीगावॉट से दशक के अंत तक लगभग पांच गुना तक हो सकती है। इसी बढ़ती ऊर्जा जरूरत और पर्यावरणीय असर को लेकर विरोध तेज हो रहा है। कई सर्वेक्षण बताते हैं कि भविष्य में कई अमेरिकी इलाकों में परमाणु संयंत्रों की तुलना में डेटा सेंटर अधिक दिखाई देंगे। यही वजह है कि नवंबर में होने वाले चुनावों में मतदाता गवर्नर पद के उम्मीदवारों से इस मुद्दे पर उनका रुख पूछ रहे है, लेकिन डेटा सेंटरों को लेकर बढ़ती बहस बताती है कि आने वाले वर्षों में यह बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन सकता है। कई अमेरिकी अपने इलाके में डेटा सेंटर के बजाय परमाणु रिएक्टर स्थापित किए जाने को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि अत्यधिक विरोध तकनीकी प्रगति को नुकसान पहुंचा सकता है। एआई में दुनिया को उसी तरह बदलने की क्षमता है, जैसी कभी बिजली या भाप के इंजन ने दुनिया बदल दी थी। एआई से उत्पादकता बढ़ाने, नई दवाएं और इलाज विकसित करने, शिक्षा तथा ग्रीन टेक्नोलॉजी में सुधार की बड़ी संभावनाएं जुड़ी हैं। यदि पश्चिमी देश जनविरोध के दबाव में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को सीमित करते हैं, तो इससे तकनीकी नेतृत्व, साइबर सुरक्षा और रणनीतिक बढ़त कमजोर पड़ सकती है, जिसका लाभ चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को मिल सकता है।

एआई प्रोजेक्ट्स पर जनविरोध का असर पड़ा है। 2026 के पहले तीन महीनों में 35 गीगावॉट बिजली का संभावित उपयोग करने वाले 3.96 लाख करोड़ रु. के बीस डेटा सेंटर प्रोजेक्ट रद्द कर दिए गए हैं। पिछले तीन वर्षों में अमेजन, मेटा के प्रस्तावित छोटे सेंटरों सहित 8 लाख करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट रद्द किए जा चुके हैं। सेडार रैपिड्स, आयोवा के निवासी वहां गूगल के प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। मिशिगन में कई शहरों ने डेटा सेंटरों का विरोध किया है।


Date: 27-06-26

मादक पदार्थों की तस्करी

संपादकीय

नशीले पदार्थों के तस्करों की गतिविधियों को देखते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस यानी एनडीपीएस एक्ट में संशोधन करने की जो जरूरत जताई, उसकी पूर्ति यथाशीघ्र की जानी चाहिए। उचित यह होगा कि राज्य सरकारें इस कानून में वांछित संशोधन के लिए सुझाव देने का काम तत्परता से करें, क्योंकि नशे के तस्करों से निपटने में उनका योगदान बहुत अहम है। वे इससे भी परिचित हैं कि नशे के तस्कर एनडीपीएस एक्ट की किन खामियों का लाभ उठाते हैं। निःसंदेह नशा तस्करों के खिलाफ सख्ती बरती जा रही है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि उनके हौसले पस्त नहीं हो पा रहे हैं और इसका पता इससे चलता है कि नारकोटिक्स ब्यूरो एवं अन्य एजेंसियों की तमाम सक्रियता के बाद भी देश में बड़े पैमाने पर चोरी-छिपे मादक पदार्थ लाए जा रहे हैं। देश के कुछ राज्यों और विशेष रूप से सीमावर्ती राज्यों में नशे के तस्करों की गतिविधियां कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही हैं। इनमें पंजाब के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के राज्य प्रमुख हैं। भारत में विशेष रूप से पाकिस्तान, म्यांमार, ईरान आदि से बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थ आ रहे हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि पिछले कुछ समय से देश में भी नशीले पदार्थों का चोरी-छिपे निर्माण किया जा रहा है। निःसंदेह यह भी एक चुनौती है।

देश में किस तरह नशीले पदार्थों की आवक बढ़ रही है, इसका पता इससे चलता है कि जहां वर्ष 2004 से 2014 के बीच 26 लाख किलो सिंथेटिक मादक पदार्थ जब्त किए गए, वहीं 2014 से 2026 के बीच 1.18 करोड़ किलो सिंथेटिक मादक पदार्थ जब्त किए गए। इससे एक ओर जहां यह पता चलता है कि मादक पदार्थों की तस्करी रोकने में संबंधित एजेंसियों को लगातार सफलता मिल रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी रेखांकित होता है कि मादक पदार्थों के तस्करों का दुस्साहस बढ़ रहा है। मादक पदार्थों के तस्करों पर सख्ती बरतने की आवश्यकता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि नशा केवल युवा पीढ़ी के भविष्य को ही बर्बाद नहीं करता, बल्कि उसके कारोबारी देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी पैदा करते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि नशीले पदार्थों की तस्करी से हासिल किए जाने वाले पैसे से अपराधी आधुनिक हथियार खरीदते हैं। अपराधियों के कई गिरोह ऐसे हैं, जो अपने अपराध तंत्र को खड़ा करने के लिए नशीले पदार्थों का कारोबार करते हैं। इसी तरह कई आतंकी संगठन भी नशीले पदार्थों की तस्करी करते हैं। यह सही है कि मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाने की बात की जा रही है, लेकिन जब तक नशे के कारोबारी दबाव में नहीं आते, तब तक इस नीति के वांछित नतीजे हासिल नहीं हो सकते।


Date: 27-06-26

एआई संप्रभुता की ओर बढ़े भारत

विकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एव वरिष्ठ स्तंभकार हैं )

ट्रंप प्रशासन द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर एंथ्रोपिक के सबसे शक्तिशाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स फेबल 5 और मिथौस 5 के विदेशी उपयोग पर प्रतिबंध ने सभी को सकते में डाल दिया है। आदेश के अनुसार विदेश में कार्यरत अमेरिकी भी एंथ्रोपिक के इन टूल्स का उपयोग नहीं कर पाएंगे। एंथ्रोपिक के अनुसार जो प्रमाण दिखाए गए हैं, वे इतने व्यापक प्रतिबंध को उचित नहीं ठहराते, पर उसके पास सरकारी निर्देश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जानकारों का मानना है कि एंथ्रोपिक को ट्रंप प्रशासन के उस पूर्वाग्रह की कीमत चुकानी पड़ रही हैं, जो एंथ्रोपिक के मुकाबले औपन एआइ को लाभान्वित करना चाहती है। इस स्थिति ने भारत समेत विश्व भर के उन एआइ डेवलपर्स के लिए कठिनाई खड़ी कर दी है, जो इन टूल्स पर निर्भर थे। इस कदम ने ऐसे भय को जन्म दिया है, जो भविष्य में भारत की तकनीकी और एआइ संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस स्तर पर कृषि से उत्पादन क्षेत्र में परिवर्तित होना चाहिए था, उसमें अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली, परंतु आइटी क्षेत्र में हुए विस्तार ने न केवल इस नुकसान की भरपाई की, बल्कि अर्थव्यवस्था को बल भी दिया। तार्किक रूप से आइटी का विकास न केवल एआई के विस्तार की और जाएगा, बल्कि कोडिंग, डाटा एंट्री, मैन्युअल टेस्टिंग और पासवर्ड रीसेट सरीखे लेवल 1 और 2 आइटी सपोर्ट जैसे कार्यों को हटाकर उनका स्थान भी ले लेगा। एआइ प्रतिस्पर्धा में कौन देश कितनी बढ़त बनाएगा, यह वहां की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के साथ यह भी तय करेगा कि उसका सरकारी एवं गैर सरकारी तंत्र कितना स्वतंत्र या परतंत्र रहेगा। एआइ क्षेत्र या डाटा पर विदेशी निर्भरता अर्थतंत्र, राजनीति, शासन-प्रशासन राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता जैसे राष्ट्र जीवन के तमाम पहलुओं को प्रभावित कर सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि भारत एआइ और डाटा क्षेत्र में यथाशीघ्र संप्रभुता प्राप्त करे ।

भारत ने अब तक ऐसे संदेश दिए हैं, जिसमें वह छोटे परंतु विशिष्ट एआइ माडल्स या एप्लिकेशंस बनाने को प्राथमिकता देगा। संप्रभु एआइ किसी देश की वह क्षमता है, जिसके तहत वह घरेलू आधारभूत ढांचे, स्थानीय डाटा, मानवीय प्रतिभा और कानूनी ढांचे का प्रयोग कर एआई सिस्टम्स को विकसित, लागू और नियंत्रित कर सकता है। इसमें सेमीकंडक्टर, सेमीकंडक्टर चिप का जटिल प्रारूप यानी जीपीयू, बहुकार्मिक क्षमता वाले विशालकाय प्रोग्राम यानी फाउंडेशनल माडल भाषाओं के बहुत बड़े डाटा पर अभ्यास कराए गए लार्ज लँग्वेज माडल (एलएलएम), महाकाय डाटा सेंटर आदि की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा नहीं है कि इन क्षेत्रों में काम नहीं हुआ है। देश में सर्वम, कृत्रिम और भारतजेन नामक पूर्णतः स्वदेशी एलएलएम विकसित हुए हैं। साथ ही सी टैंक ने एआइ स्टैक के रूप में ऐरावत नामक सुपर कंप्यूटर भी तैयार किया है। शोधकर्ताओं और डेवलपर्स और डेवलपर्स को आवश्यक गैर-व्यक्तिगत डाटासेट और माडल रियायती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए एआइ कोश भी बनाया गया है। ये कदम सराहनीय हैं, पर अमेरिकी और चीनी कंपनियों के मुकाबले काफी छोटे हैं। भारत को एक-दो नहीं, बल्कि कई एलएलएम खड़े करने होंगे। आपसी प्रतिस्पर्धा इन माडल्स को धार और विस्तार देगी। भारतीय परिदृश्य में दूसरे स्तर पर एप्लिकेशंस और माइल्स को ट्रेन करने के लिए डाटा की उपलब्धि एक बड़ी चुनौती है। संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित न करने वाला डाटा इन स्टार्टअप्स के साथ साझा करना सरल बनाना होगा। एआइ या डाटा संप्रभुता को बड़े निवेश की दरकार है। उदाहरण के लिए एंथ्रोपिक ने पिछले दो वर्षों में प्रतिवर्ष छह से सात अरब डालर खर्च किया है। ऐसे निवेश के लिए निजी एवं सरकारी सहयोग से धन जुटाना होगा। निवेश के अलावा संप्रभु एआइ के लिए ऊर्जा भी एक बड़ी चुनौती बनेगी, जिसका प्रबंध सरकार को करना पड़ेगा।

नौकरशाही हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए विषय विशेषज्ञों की निगरानी में समय-समय पर सरकारी और बड़े निजी संस्थानों में एआइ अंगीकरण और अनुवर्त्ती क्षमता विकास को मैप किया जाए। बहुत संभव है कि शुरुआती माडल अन्य बड़े माडलों के मुकाबले उतने परिपक्व न हों। चैटजीपीटी जैसे माडल भी प्रारंभिक अवस्था में इतने दक्ष नहीं थे। ऐसे में विचलित हुए बिना एआइ संप्रभुता की और कदम बढ़ाने होंगे। संप्रभु एआइ के लिए डाटा की संप्रभुता भी अनिवार्य है।

लगभग 135 देश डाटा रेजिडेंसी नामक अवधारणा के तहत अपने महत्वपूर्ण डाटा को देश में रखे सर्वरों पर ही रखना अनिवार्य करते हैं। भारत को भी ऐसा करना चाहिए। एआइ समिट में भारत सरकार द्वारा गूगल के साथ किए गए करार में ऐसी सुरक्षा शर्त रखनी चाहिए थी। गूगल द्वारा 15 अरब डालर का यह निवेश आर्थिक रूप से अवश्य लाभकारी है, पर इस सेंटर पर अभ्यास कराया गया भारतीय डाटा गूगल के ही स्वामित्व में रहेगा। गूगल एक अमेरिकी कंपनी है, इसलिए आयात-निर्यात के जिन नियमों की वजह से एंथ्रोपिक को अपने दो माडल हटाने पड़े, वह नियम जैमिनी पर भी लागू हो सकते हैं।

भारत कुछ ऐसा नया भी सच सकता है, जिसमें विश्व में सबसे रचनात्मक और रोचक एआइ इनोवेशन हब का निर्माण हो पाए और जिसमें विश्व के एआइ उद्यमी निवेश करने में रुचि दिखाएं। चूंकि एआइ एक नया पाठ्यक्रम है, इसलिए प्रयास होने चाहिए कि विश्व के सबसे अच्छे शिक्षकों से भारतीय विद्यार्थियों को शिक्षण प्राप्त हो सके। भारत को अपने आप को ऐसे गंतव्य के रूप में स्थापित करना चाहिए, जो इस क्षेत्र के सर्वोत्तम मानव संसाधन को आकर्षित कर सके। ऐसे कई प्रसंग हैं। जब प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर लगी रोक के बाद भारत ने अपनी क्षमताओं को साबित किया। क्रायोजेनिक इंजन, परम सुपर कंप्यूटर और परमाणु कार्यक्रम की सफलता ऐसे तीन बड़े उदाहरण हैं। अमेरिकी सरकार द्वारा एंथ्रोपिक टूल्स पर प्रतिबंध को भी ऐसी ही एक चुनौती मानकर हमें संप्रभु एआइ के लिए मिशन मोड में काम करना चाहिए।


Date: 27-06-26

बहुत फायदेमंद है देश में जोर पकड़ती मक्का क्रांति

रमेश चंद, ( लेखक इक्रियर के विशिष्ट प्रोफेसर हैं और नीति आयोग के सदस्य रह चुके हैं )

पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र की सूरत बहुत तेजी से बदली है। कृषि क्षेत्र में सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की औसत वार्षिक वृद्धि दर बढ़कर 4.68 प्रतिशत हो गई है। ऐसा आंकड़ा पहले कभी नहीं देखा गया था। इस दरम्यान किसानों की आय विनिर्माण और दूसरे गैर-कृषि क्षेत्रों के उत्पादकों की आय के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ गई है। किंतु कृषि से जुड़े सभी क्षेत्रों में वृद्धि की कहानी एक जैसी नहीं रही है और इस बात पर गंभीर चिंता जताई जा रही है कि यह वृद्धि तकनीकी प्रगति के बजाय केवल कीमतों में बढ़ोतरी से तो नहीं हो रही है।

वृद्धि में तेजी मुख्य रूप से बागवानी, डेरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे अधिक मूल्य वाले (हाई वैल्यू) क्षेत्रों के दम पर रही है। इनके उलट अनाज, दलहन, तिलहन, कपास, गन्ना और रेशों जैसी खेतों में होने वाली फसलों में वृद्धि की गति धीमी रही है। इस पर ध्यान देना जरूरी है क्योंकि देश में फसल के कुल रकबे में से 85 प्रतिशत पर ये फसलें ही बोई जाती हैं। साथ ही कृषि और किसान आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा भी इन्हीं से जुड़ा है।

पिछले कुछ वर्षों में फसलों में वृद्धि धीमी रहने का एक बड़ा कारण ऐसी किसी बड़ी तकनीकी उपलब्धि का अभाव रहा है, जिसके कारण उत्पादन क्षमता में तेजी से इजाफा हो सके। सोयाबीन और कपास जैसी कुछ महत्त्वपूर्ण फसलों में तो उपज ठहर गई है बल्कि आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कम भी हुई है। ऐसी स्थिति में मक्का अपवाद बनकर उभरा है, जिसकी पैदावार तेजी से बढ़ी है और जो भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली फसल बन गया है।

भारत में 2015-16 में 2.25 करोड़ टन मक्का हुआ था और 2025-26 में इस फसल का कुल उत्पादन बढ़कर 5.50 करोड़ टन तक पहुंच गया। इस दौरान इसका उत्पादन 9.3 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ा। यह इजाफा फसल की पैदावार बढ़ने से हुआ, जिसकी वजह से इसका रकबा भी पहले से बढ़ता गया मक्के की वृद्धि दर अनाज, दलहन और धान की वृद्धि दर से दोगुनी रही है और गेहूं के मुकाबले तो इसमें तीन गुना ज्यादा वृद्धि हुई है।

हरित क्रांति से भी पहले दुनिया भर में मक्के की पैदावार में क्रांति शुरू हो गई थी । मगर भारत में मक्के का कायाकल्प कुछ देर से हुआ। इसमें अहम् मोड़ 2007-08 में आया, जब मक्के की पैदावार एक वर्ष के भीतर ही करीब 22 प्रतिशत बढ़ गई तथा उत्पादन में 25 प्रतिशत से ज्यादा इजाफा दर्ज किया गया । इसके साथ ही मक्का पहले के मुकाबले एकदम अलग वृद्धि की राह पर बढ़ गया और उसे बेहतर भविष्य वाली बदलती फसल मान लिया गया। लगभग 4 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार के साथ भारत अब वैश्विक स्तर के करीब पहुंच रहा है।

मक्के में वृद्धि की खास बात है कि यह मूल्य के जरिये मदद देने वाली उस व्यवस्था के बगैर हुई है, जो गेहूं और धान को अरसे से मिलती रही है। उन फसलों जैसे नीतिगत प्रोत्साहन नहीं मिलने के बाद भी मक्के ने वृद्धि के मामले में दोनों को पछाड़ दिया है। यह सफलता मक्के की आधुनिक संकर किस्मों के कारण है, जिनका पलड़ा ज्यादा इलाकों में और ज्यादा मौसमों में उग सकने के कारण भारी रहता है। ज्यादातर फसलों के उलट मक्के की खेती देश के सभी कृषि क्षेत्रों में और खरीफ, रबी तथा गर्मी के मौसमों में की जा सकती है।

पिछले दो दशकों में मक्के की पैदावार दोगुनी हो चुकी है और इसका उत्पादन तीन गुने से भी ज्यादा हो गया है मगर भारत और दुनिया के अग्रणी मक्का उत्पादक देशों के बीच पैदावार का बड़ा अंतर बना हुआ है। भविष्य की बात करते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में पहले से मौजूद उन्नत किस्में अपनाकर राष्ट्रीय स्तर पर मक्के की औसत पैदावार आसानी से 8 टन प्रति हेक्टेयर तक की जा सकती है।

राज्यवार आंकड़े भी ऐसा ही कहते हैं। पश्चिम बंगाल में औसतन प्रति हेक्टेयर लगभग 7 टन मक्का होता है। उसके बाद आंध्र प्रदेश में इसकी पैदावार लगभग 6.5 टन और बिहार में 6.1 टन प्रति हेक्टेयर है। तेलंगाना और तमिलनाडु भी इसी स्तर के करीब पहुंच रहे हैं। इन राज्यों में देश में मक्के का केवल 22 प्रतिशत रकबा है मगर कुल उत्पादन में इनका योगदान 38 प्रतिशत है। इसके उलट मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मक्के का रकबा बहुत ज्यादा है मगर पैदावार अब भी 3 टन प्रति हेक्टेयर के इर्द-गिर्द अटकी है। उत्तर प्रदेश में मक्के का 70 प्रतिशत रकबा सिंचित है मगर पैदावार इतने ही या इससे कम सिंचित क्षेत्र वाले राज्यों से कम है। कम पैदावार से उबरने के लिए एकल संकर बीजों का व्यापक उपयोग आवश्यक है।

मक्के में तेज वृद्धि की संभावना तो है ही, पर्यावरण को भी इससे कई फायदे हैं। देश में और विशेष रूप से कम बारिश वाले तथा उत्तर पश्चिम क्षेत्र में धान की ज्यादा खेती ने भूजल का स्तर और भी कम कर दिया है, मिट्टी की गुणवत्ता खराब की है और पर्यावरण पर भी बोझ डाला है। खरीफ के मक्के को बहुत कम पानी की ज़रूरत पड़ती है और फसल कम वक्त में तैयार हो जाती है। साथ ही इसकी जड़ें धान की तुलना में मिट्टी की स्थिति को बेहतर बनाए रखती हैं। इसलिए उत्तर पश्चिम भारत में धान की जगह मक्के की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो धान-गेहूं से जुड़ी कई पर्यावरण एवं सतत विकास की चुनौतियां दूर की जा सकती हैं। लेकिन इसके लिए नीतिगत प्राथमिकताएं बदलनी होंगी।

भारत में अभी देश की जरूरत से करीब 30 प्रतिशत ज्यादा धान उगाया जाता है । इस अधिक धान का बड़ा हिस्सा सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की अपनी बाध्यता पूरी करने के लिए खरीद लेती है। मगर यह मात्रा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और बफर स्टॉक की जरूरतों से भी ज्यादा है, जिस कारण सरकारी एजेंसियों के पास चावल का बड़ा भंडार जमा हो जाता है।

इस अतिरिक्त चावल को आम बाजार के जरिये कारगर तरीके से बेचा नहीं जा सकता। इसलिए भारी मात्रा में चावल बायो- एथनॉल के उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है। इससे सरकारी खजाने को बड़ा घाटा होता है। धान के कुछ रकबे में धीरे-धीरे मक्का उगाना शुरू कर दिया जाए तो खजाने का घाटा कम हो सकता है क्योंकि मक्का भी धान की तरह ही मुनाफा दे सकता है।

ऐसे बदलाव के लिए मक्के से बनने वाली जैव ऊर्जा बढ़ावा देने वाला तंत्र तैयार करना होगा। इसके लिए ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो मक्का उत्पादकों को लाभकारी और स्थिर मूल्य दिलाएं। मक्के का उत्पादन इस तरह बढ़ाने पर अन्न तथा चारे के बीच ज्यादा होड़ शुरू नहीं होगी। बल्कि इससे कृषि की वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, ग्रामीण रोजगार उत्पन्न होगा, मूल्य श्रृंखला मजबूत होंगी, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटेगा और पर्यावरण को लंबे समय तक स्थिरता मिलेगी।

जोर पकड़ती मक्का क्रांति भारतीय कृषि को अहम सबक भी देती है। यह बताती है कि टिकाऊ वृद्धि केवल खाद, पानी और दूसरे साधनों का इस्तेमाल बढ़ाने से नहीं आएगी बल्कि प्रौद्योगिकी और विविध फसलों के जरिये पैदावार बढ़ाने से ही आएगी।


Date: 27-06-26

मंदिर और दान की चिंता

संपादकीय

राम मंदिर, अयोध्या में चढ़ावा चोरी मामले में प्रथम सूचना रिपोर्टका दर्ज होना और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी सराहनीय है। मंदिर में चोरी से आहत करोड़ों श्रद्धालुओं को कार्रवाई का इंतजार था। आरोपियों के विरुद्ध विश्वासघात, धोखाधड़ी, चोरी और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं। वैसे, यह जरूर कहना चाहिए कि जांच एजेंसियां बहुत सावधानी से चल रही हैं। इसी वजह से प्रथम सूचना रिपोर्ट काफी समय लेकर दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के एक नेता की शिकायत के बाद जब यह मामला गरमाया, तब राज्य सरकार ने 13 जून को विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया । एसआईटी ने मंदिर ट्रस्ट की समग्र भूमिका को परखा है और यह मानकर चलना चाहिए कि प्रथम सूचना रिपोर्ट इतनी पुख्ता होगी कि उसके आधार पर दोषी दंडित होंगे। हाल के वर्षों में हम यह देख रहे हैं कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में दर्ज एक छोटी खामी भी पूरे मामले पर भारी पड़ जाती है। अतः कुछ देर से ही सही, अब जब रिपोर्ट दर्ज हो गई है, तो जांच में जुटी टीम को अदालत में आरोप साबित करके दिखाना चाहिए।

मंदिर में चोरी का यह संगीन मामला लोगों के बीच बहुत चर्चा में है । इस पर राजनीति भी खूब हो रही है। सत्तारूढ़ भाजपा के अंदर भी दुख और रोष के स्वर हैं। ऐसे में, उन विपक्षी नेताओं को स्वाभाविक ही मौका मिल गया है, जिनकी आस्था मंदिर से ज्यादा इससे जुड़ी राजनीति में रही है। शायद ऐसे ही लोगों को ही संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा है कि इस मुद्दे का इस्तेमाल अयोध्या या भगवान राम के भक्तों को निशाना बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि अगर किसी के पास कोई सुबूत है, तो उसे एसआईटी के सामने पेश करें। मुख्यमंत्री श्रद्धालुओं में फैले रोष को जानते हैं और इसीलिए उन्होंने आश्वस्त किया है कि सरकार किसी को भी जन आस्था का दुरुपयोग नहीं करने देगी। वाकई, दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाना चाहिए। कोई दोराय नहीं कि मंदिर के दान या धन के दुरुपयोग की दुष्प्रवृत्ति पुरानी है। अनेक लोग मंदिरों को अपनी कमाई का साधन मानते हैं। ऐसे लोग ईश्वर की सेवा तो दूर की बात, मंदिर की सेवा लायक भी नहीं है। चोरी करने वालों को शायद पता नहीं था कि मंदिर में आने वाला कोई भी धन-दान ईश्वर की संपत्ति है। ईश्वर के घर में चोरी सामान्य बात नहीं है । ईश्वर की प्रतिमा या धार्मिक महत्व की किसी विशेष चीज की चोरी के लिए कड़े दंड हैं, पर दानपेटी में सेंधमारी के लिए अतिरिक्त दंड का कोई प्रावधान नहीं है। मंदिर द्वार से जूते-चप्पल चुराना और दानपेटी में सेंधमारी, दोनों की गंभीरता में अंतर करने का समय आ गया है।

खैर, राम मंदिर में चोरी के लिए कुछ लोग गिरफ्तार हो चुके हैं और ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने भी इस्तीफा दे दिया है। यह इस्तीफा शायद पहले ही हो जाना चाहिए था। मंदिर ट्रस्ट का यथोचित स्वरूप में पुनर्गठन होना चाहिए और ट्रस्ट की तमाम गतिविधियां सीसीटीवी कैमरे या लगातार निगरानी के दायरे में रहनी चाहिए। भगवान राम के मंदिर में हर विचार-व्यवहार राम भाव से ओत-प्रोत होना चाहिए। रामजी की सेना या सेवा में चोरों का क्या काम ? यहां समर्पित भाव वाले संतों- सेवकों की ही जरूरत है, वणिक भाव या लेन-देन करने वाले हल्के लोगों को मंदिर से दूर ही रखना चाहिए। सदियों तक चली तपस्या का फल यह भव्य राम मंदिर जन-मन के विश्वास का प्रतीक है और इस विश्वास को पुष्ट करने के लिए हरसंभव उपाय होने चाहिए ।