सुप्रीम कोर्ट में बढ़ती मुकदमों की संख्या के कारण तथा जरूरी सुधार
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वर्तमान में न्यायाधीशों के फैसलों में विरोधाभासों और विलंब से देश के लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। आज जिला अदालतों में 4.88 करोड़ मुकदमें लंबित हैं तथा हाईकोर्ट में 63.98 लाख। जबकि इन्हीं न्यायालयों में रिक्त पदों की संख्या क्रमश: 4721 व 325 है। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में 93 हजार मुकदमें लंबित हैं अब कानून संशोधन द्वारा 4 जजों की संख्या बढ़ाने की बात हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते मुकदमों का कारण –
- संविधान के अनुसार अधिकांश मामलों में सर्वोच्च न्यायालय हाईकोर्ट ही होता है। पर रसूखदार पक्षकारों के कारण न्याय अब वीआईपी जस्टिस बन गया है और रसूखदारों के मुकदमें सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने लगे हैं।
- जनहित याचिका के कारण लोगों में मुकदमेंबाजी का मर्ज बढ़ रहा है।
- लंबी-चौड़ी अकादमिक बहसें भी मुकदमे को अनावश्यक बढ़ाने का काम करती हैं।
आवश्यक सुधार जो करने चाहिए –
- हमें दो की जगह तीन न्यायाधीशों की बेंच का गठन करना चाहिए, ताकि बहुमत से निर्णय लेने में आसानी हो।
- जिला जज की रैंक के लोग रजिस्ट्रार बनते हैं, जिन्हें जिला अदालत में फांसी देने तक का अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार रजिस्ट्रार को मूल दस्तावेज, अनुदित प्रति, कोर्ट फीस मामलों में छूट की अर्जी, मुकदमों की लिस्टिंग, रुटीन अर्जियों के निपटारे के लिए न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे जूनियर जजों को पैरवी का और जजों को मुख्य मामले की सुनवाई का ज्यादा अवसर मिलेगा।
- सुप्रीम कोर्ट के 2020 में हुए नियमों में बदलाव के अनुसार जमानत, मुकदमों के ट्रांसफर जैसे मामले एक बेंच की पीठ सुन सकती है। यदि हाईकोर्ट में जजों की रिटायरमेंट की उम्र भी 65 साल कर दी जाए, तो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शायद ही सुप्रीम कोर्ट में जूनियर जज बनना चाहें।
- सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश मामलों को एक जज ही सुन सकता है। इससे जजों की संख्या बढ़ाए बिना ही अधिकांश लंबित मामले निपट सकते हैं।