शिक्षा पर होने वाला सार्वजनिक व्यय कहाँ है
To Download Click Here.

हाल ही में नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी के विरूद्ध हुए प्रदर्शन थमें नहीं हैं। देश के युवा पूरे शिक्षा तंत्र में फैली खामियों में सुधार के लिए लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। शिक्षा जगत में फैली इन कमियों के कई कारण हैं –
- भारत में शिक्षा पर व्यय लगभग जीडीपी का 4.1% है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और पहले की नीतियों में इसे लगभग 6% ले जाने का लक्ष्य रहा है।
- शिक्षा अधिनियम से सन् 2000 के प्रारंभिक समय में सार्वजनिक व्यय बढ़ा था, परंतु जल्द ही राज्यों ने इस नाम पर ली गई निधि को वेतन व अन्य मदों पर खर्च करना शुरू कर दिया।
- नतीजा यह है कि आज सरकारी स्कूलों और हॉस्टल की टूटी-फूटी इमारतों को ठीक करने के लिए जेनरेशन अल्फा को अधिकारियों का घेराव करना पड़ रहा है। कुछ ठीक आर्थिक स्थिति वाले अभिभावकों ने निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों का रास्ता अपनाया है। सरकारी स्कूलों में गिरती विद्यार्थियों की संख्या से बहुत से स्कूल बंद हो रहे हैं।
क्या किया जाना चाहिए –
शिक्षा पर खर्च को केवल सरकारी खर्च नहीं मानना चाहिए। यह मानव पूंजी में निवेश है। बेहतर शिक्षा से उत्पादकता, रोजगार क्षमता, नवाचार, और आर्थिक विकास होता है। अत: सरकार को इसमें सुधार के प्रयत्न जरूर करने चाहिए –
- शिक्षा में गुणत्ता पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। शिक्षक-प्रशिक्षण, नवाचार, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, चर्चाएं, डिजिटल ढांचे का निर्माण एवं व्यावसायिक शिक्षण आदि ऐसे माध्यम हैं, जिन पर खर्च करना आवश्यक है।
- हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए उनकी जरूरत के अनुसार शिक्षण सहयोग उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
- सभी कार्यों के लिए पर्याप्त निधि, बेहतर कार्यान्वयन और अच्छे परिणामों की सुनिश्चितता बहुत जरूरी है।
यह एक दीर्घकालिक निवेश है, जिसे बाजार तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।
(‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित – 17/08/26)