केवल विदेशी कैंपस लाने से उच्च शिक्षा नहीं सुधरेगी

Afeias
09 Sep 2026
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हाल ही में केन्‍द्र सरकार ने देश में विदेशी विश्‍वविद्यालयों के कैंपस खोलने की अनुमति दे दी है। इनसे जुड़ा मुख्‍य मुद्दा यह है कि क्‍या विदेशी विश्‍वविद्यालय भारतीय उच्‍च शिक्षा की संरचनात्‍मक समस्‍याओं को दूर कर सकते हैं, या वे केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मंहगे विकल्‍प बढ़ाएंगे? कुछ तथ्‍य –

  • राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विदेशी विश्‍वविद्यालयों के लिए रास्‍ता खोला, और यूजीसी के 2023 के नियमन ने इनके कैंपस के लिए औपचारिक ढांचा तैयार किया।
  • इस दिशानिर्देश में विश्‍व के 500 विश्‍वविद्यालयों को कैंपस खोलने की अनुमति दी गई है।
  • इस नीति का मुख्‍य उद्देश्‍य भारतीय छात्रों को देश में ही विश्‍वस्‍तरीय शिक्षा उपलब्‍ध कराना है।
  • इससे विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन कम किया जा सकता है।
  • अंतरराष्‍ट्रीय शोध और अकादमिक सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
  • भारतीय विश्‍वविद्यालयों पर प्रतिस्‍पर्धात्‍मक दबाव बढ़ने की संभावना है।
  • भारत को वैश्विक शिक्षा केन्‍द्र के रूप में बढ़ावा मिल सकता है।

सार्वजनिक विश्‍वविद्यालयों से जुड़े कुछ तथ्‍य – 

  • वित्तीय संसाधनों की बहुत कमी है।
  • शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।
  • हमारा पाठ्यक्रम बहुत पुराना है।
  • शोध के लिए सीमित प्रोत्‍साहन दिया जाता है।
  • राजनीतिक/प्रशासनिक हस्‍तक्षेप बहुत अधिक है।

विदेशी कैंपस मुख्‍यत: उच्‍च श्रेणी वाले शिक्षा प्रदाता बन सकते हैं। लेकिन इनकी मनमानी फीस और केवल बड़े नगरों तक इनके फैलाव से छोटे शहरों के मेधावी छात्रों तथा निम्‍न मध्‍यम वर्ग व गरीब छात्रों को कोई लाभ नहीं मिल सकता है।

चीन से सबक – 

  • चीन ने विदेशी कैंपस टीयर-2 नगरों में खोले।
  • इससे विदेशी शिक्षा को क्षेत्रीय विकास का साधन बनाया जा सका है।
  • सार्वजनिक विश्‍वविद्यालयों को इन विदेशी कैंपस में शोध का सहयोगी बनाया गया है।

अत: विदेशी कैंपस उच्‍च शिक्षा की समस्‍या के समाधान का एक हिस्‍सा भर हैं। इन्‍हें भारत के शिक्षा-वंचित क्षेत्रों में खोला जाना चाहिए। इससे क्षेत्र का विकास और शिक्षा का प्रसार होगा।

(‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित स्‍वणदीप होमरॉय के लेख पर आधारित – 03/08/26)