रियूजेबल रॉकेट: इसरो के लिए आवश्यकता भी, अवसर भी

Afeias
07 Aug 2026
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भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक कम लागत वाले उपग्रह प्रक्षेपण के लिए प्रसिद्ध रहा है। लेकिन वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग अब एक नए युग में प्रवेश कर चुका है, जहाँ सफलता का आधार केवल सस्ती लॉन्चिंग नहीं, बल्कि पुनः काम (Reusable) में लाए जाने योग्य रॉकेट हैं। ऐसे रॉकेट लॉन्च की लागत को नाटकीय रूप से कम करके अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल रहे हैं। ऐसे में भारत और इसरो के लिए यह तकनीक अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

रियूजेबल रॉकेट क्या है?

पारंपरिक रॉकेट एक बार उपयोग के बाद नष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत, इन रॉकेट का प्रथम चरण बूस्टर (Booster) सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आता है और उसे कई बार पुनः उपयोग किया जा सकता है।

इसके अनेक लाभ हैं –

  • लॉन्च लागत में 60–80% तक कमी आती है।
  • अधिक संख्या में प्रक्षेपण संभव हो सकते हैं।
  • अंतरिक्ष सेवाएँ सस्ती होती हैं, तथा
  • व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

वैश्विक परिदृश्य –

  • 2017: इसरो ने PSLV से 104 उपग्रह एक साथ लॉन्च कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
  • 2021: अमेरिका की स्पेसएक्स (SpaceX) ने फाल्कन 9 से 143 उपग्रह लॉन्च कर नया रिकॉर्ड बनाया।
  • स्पेसएक्स आज औसतन हर दो दिन में एक रॉकेट लॉन्च करता है।
  • चीन ने हाल ही में लॉन्ग मार्च-10 B के पुनः उपयोग का सफल परीक्षण किया।
  • जापान, यूरोप, रूस और अमेरिका भी इस तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं।

भारत पीछे क्यों रह गया ? –

भारत का नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) अभी डिज़ाइन और परीक्षण के प्रारंभिक चरण में है, जबकि अन्य देश इस तकनीक का व्यावसायिक उपयोग शुरू कर चुके हैं।

मुख्य कारण –

  • अनुसंधान एवं विकास में सीमित निवेश।
  • निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी।
  • तकनीकी विकास की धीमी गति।
  • रियूजेबल प्रौद्योगिकी पर अपेक्षाकृत देर से ध्यान देना।

भारत के लिए इसका महत्व –

  1. आर्थिक अवसर –
  • वैश्विक सैटेलाइट लॉन्च बाज़ार लगभग 18 अरब डॉलर का है।
  • इसकी वार्षिक वृद्धि लगभग 10% है।
  • 2030 तक लगभग 70,000 Low Earth Orbit (LEO) उपग्रह लॉन्च होने का अनुमान है। इनमें से 53,000 अकेले चीन के होने का अनुमान है।
  1. रणनीतिक महत्व –
  • संचार एवं इंटरनेट सेवाएँ ।
  • रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा।
  • मौसम पूर्वानुमान।
  • आपदा प्रबंधन, तथा
  • नेविगेशन एवं निगरानी।

इन सभी क्षेत्रों में इस तकनीक का अत्यधिक महत्व है।

  1. आत्मनिर्भरता

यदि भारत विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहेगा, तो भविष्य में संवेदनशील सेवाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ सकता है।

चुनौतियाँ –

  • अत्यधिक लागत और लंबा विकास समय।
  • उन्नत सामग्री एवं इंजन तकनीक की आवश्यकता।
  • निजी निवेश आकर्षित करना।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा।
  • कुशल मानव संसाधन।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में दीर्घकालिक नीति और निवेश सुनिश्चित करना।
  • वैश्विक लॉन्च बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी 2% से भी कम है। इसे बढ़ाना चाहिए।

भारत ने कम लागत वाले अंतरिक्ष मिशनों से विश्व में अपनी पहचान बनाई है। यदि इसरो समय रहते उन्नत तकनीकों को विकसित कर लेता है, तो भारत न केवल अपनी खोई हुई बाज़ार हिस्सेदारी वापस पा सकता है, बल्कि भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति भी बन सकता है। अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और तकनीकी नेतृत्व के लिए पुनः उपयोग में आने वाले रॉकेट भारत की अगली बड़ी छलांग सिद्ध हो सकते हैं।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (13/07/26)