महिलाओं में शिक्षा से रोजगार तक का सफर
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भारत में महिलाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी ऐतिहासिक रूप से बढ़ी है। लेकिन शिक्षा से रोजगार तक की यात्रा अभी भी बाधित है। यदि शिक्षित महिलाएँ अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं प्राप्त कर पातीं, तो उच्च शिक्षा में हुई प्रगति का पूरा लाभ देश को नहीं मिलेगा।
मुख्य तथ्य –
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023–24
- कुल उच्च शिक्षा नामांकन: 4.5 करोड़
- महिला नामांकन: 2.24 करोड़
- पुरुष नामांकन: 2.26 करोड़
- पिछले 10 वर्षों में महिला नामांकन में 42% वृद्धि हुई है, तथा
- पुरुष नामांकन में 22.16% वृद्धि हुई है।
लैंगिक समानता सूचकांक –
- प्रत्येक 100 पुरुष छात्रों पर 108 महिला छात्राएँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।
सामाजिक न्याय –
- अनुसूचित जाति (SC) महिला नामांकन में 51.4% वृद्धि हुई है, तथा
- अनुसूचित जनजाति (ST) महिला नामांकन में 75.7% वृद्धि हुई है।
प्रमुख चुनौतियाँ –
- शिक्षा में सफलता, रोजगार में असफलता –
यद्यपि उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन डिग्री मिलने के बाद अच्छी नौकरियाँ, समान वेतन और करियर में निरंतरता अभी भी महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसलिए केवल शिक्षा में प्रवेश ही नहीं, बल्कि रोजगार के समान अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
- STEM में असमानता –
- महिलाओं की STEM (Science, Technology, Engineering & Mathematics) में कुल भागीदारी लगभग 44% है।
- लेकिन यह भागीदारी मुख्यतः बायोलॉजी, केमिस्ट्री और बेसिक साइंस में केंद्रित है, तथा
- इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, एआई और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में केवल 31.1% महिलाएँ हैं।
इसका अर्थ है कि भविष्य की सबसे अधिक वेतन वाली नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है।
- उच्च शिक्षा संस्थानों में नेतृत्व की कमी –
- कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की संख्या लगभग बराबर है।
- लेकिन महिला शिक्षकों की संख्या कम है, तथा
- शीर्ष प्रशासनिक और नेतृत्व पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व और भी कम है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया पुरुष-प्रधान बनी रहती है।
- निजी कॉलेजों की गुणवत्ता –
उच्च शिक्षा का विस्तार मुख्यतः निजी संस्थानों के माध्यम से हुआ है, लेकिन अनेक निजी कॉलेजों में —
- फैकल्टी की कमी
- शोध एवं अनुसंधान का अभाव
- कमजोर बुनियादी ढाँचा, तथा
- उद्योग–शिक्षा (Industry Linkage) का अभाव जैसी समस्याएँ हैं, जिससे रोजगार क्षमता प्रभावित होती है।
- महिला श्रम भागीदारी की स्थिति –
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के अनुसार नियमित वेतनभोगी पुरुष: 26.5%, तथा नियमित वेतनभोगी महिलाएँ: 18.2% है।
औसत मासिक आय पुरुषों की ₹24,217, तथा महिलाओं की ₹18,353 रुपये है।
महिलाओं का बड़ा हिस्सा अभी भी स्वरोजगार या बिना वेतन वाले पारिवारिक एवं कृषि कार्यों में लगा हुआ है।
महिलाओं के रोजगार में प्रमुख बाधाएँ –
सामाजिक –
- विवाह का दबाव
- घरेलू जिम्मेदारियाँ
- बच्चों की देखभाल, तथा
- लैंगिक रूढ़ियाँ।
आर्थिक –
- वेतन असमानता
- सीमित औपचारिक रोजगार, तथा
- करियर ब्रेक।
संस्थागत –
- सुरक्षित परिवहन की कमी
- कार्यस्थल पर सुरक्षा का अभाव
- मातृत्व सुविधाओं का अभाव, तथा
- नेतृत्व में महिलाओं की कम भागीदारी।
सकारात्मक पहलें –
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना
- स्किल इंडिया मिशन
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना
- महिला ई-हाट
- स्टैंड-अप इंडिया, तथा
- स्टार्टअप इंडिया के तहत महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन।
आगे की राह –
- इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए।
- उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच बेहतर साझेदारी विकसित की जाए।
- समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित किया जाए।
- सुरक्षित कार्यस्थल, क्रेच और लचीले कार्य (Flexible Work) की व्यवस्था हो।
- करियर ब्रेक के बाद महिलाओं के लिए पुनः रोजगार (Returnship) कार्यक्रम शुरू किए जाएँ।
- महिला फैकल्टी और नेतृत्व पदों पर प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए, तथा
- गुणवत्तापूर्ण सरकारी एवं निजी उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार किया जाए।
भारत की उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि है। किंतु यदि यह शिक्षा सम्मानजनक, सुरक्षित और कौशलानुकूल रोजगार में परिवर्तित नहीं होती, तो देश अपनी आधी प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं कर पाएगा।
शिक्षा से रोजगार का मजबूत सेतु बनाना ही वास्तविक महिला सशक्तिकरण और विकसित भारत 2047 की दिशा में सबसे बड़ा कदम होगा।
‘द हिन्दू‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (11/07/26)