ऑस्ट्रेलिया से समझौता: भारत जैसी मध्यम शक्ति का नया रणनीतिक ईंधन

Afeias
05 Aug 2026
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नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारत को यूरेनियम बेचने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए गए। यह यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है। यह समझौता केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति, जलवायु प्रतिबद्धताओं और मध्यम शक्तियों के बढ़ते महत्व का भी प्रतीक है।

2008 के भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौते ने भारत को वैश्विक परमाणु व्यवस्था में “अलग-थलग” की स्थिति से बाहर निकाला था। अब ऑस्ट्रेलिया के साथ यह समझौता भारत को एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और परिपक्व परमाणु साझेदार के रूप में और अधिक मान्यता देता है।

कुछ महत्वपूर्ण बिंदु –

  1. ऑस्ट्रेलिया–भारत यूरेनियम समझौते का महत्व –

भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। ऊर्जा सुरक्षा और नेट-जीरो के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमाणु ऊर्जा की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

इस समझौते से —

  • भारत को यूरेनियम की स्थिर आपूर्ति मिलेगी।
  • परमाणु बिजली उत्पादन में तेजी आएगी।
  • कोयले पर निर्भरता कम होगी।
  • ऊर्जा आयात में विविधता आएगी, तथा
  • भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य को समर्थन मिलेगा।
  1. मध्यम शक्तियाँ (Middle Powers) क्यों महत्वपूर्ण हो रही हैं? –

मध्यम शक्तियाँ वे देश हैं; जो महाशक्ति नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय एवं वैश्विक राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।

उदाहरण—

  • भारत
  • ऑस्ट्रेलिया
  • जापान
  • दक्षिण कोरिया
  • इंडोनेशिया
  • तुर्किये, तथा
  • कनाडा आदि।

ये देश अब वैश्विक व्यवस्था को केवल अमेरिका या चीन पर निर्भर रखने के बजाय आपसी सहयोग से मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं।

  1. अमेरिका की बदलती नीति का प्रभाव –

अमेरिका की हालिया विदेश नीति ने कई देशों को अपनी स्वतंत्र रणनीतिक साझेदारियाँ विकसित करने के लिए प्रेरित किया है, क्योंकि —

  • पारंपरिक गठबंधनों में अनिश्चितता आ गई है।
  • इंडो-पैसिफिक को अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता दी जा रही है।
  • चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता व्याप्त है।
  • नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दबाव है, तथा
  • ऐसी परिस्थितियों में भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश नए रणनीतिक गठबंधन बना रहे हैं।
  1. जलवायु परिवर्तन और परमाणु ऊर्जा –

विश्व तेजी से डीकार्बोनाइजेशन की ओर बढ़ रहा है। इसलिए परमाणु ऊर्जा को अधिक महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि यह—

  • कम कार्बन उत्सर्जन करती है।
  • 24×7 बेसलोड बिजली उपलब्ध कराती है।
  • सौर एवं पवन ऊर्जा की सीमाओं को संतुलित करती है, तथा
  • भारत ने 2032 तक लगभग 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यूरेनियम आपूर्ति इस लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण होगी।

भारत के लिए रणनीतिक लाभ –

  • ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी।
  • विश्वसनीय ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण होगा।
  • जलवायु लक्ष्य और नेट-जीरो 2070 लक्ष्य की दिशा में प्रगति होगी।
  • कम कार्बन उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था बनने में सहायता मिलेगी।
  • रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से क्वाड (QUAD) सहयोग मजबूत होने की संभावना है, तथा
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बढ़ेगा।

आर्थिक लाभ –

  • उद्योगों को स्थिर बिजली मिल सकेगी, तथा
  • स्वच्छ ऊर्जा निवेश में वृद्धि होगी।

चुनौतियाँ –

  • परमाणु संयंत्रों की ऊँची लागत।
  • सुरक्षा एवं रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन।
  • स्थानीय स्तर पर भूमि अधिग्रहण और जनस्वीकृति।
  • परमाणु परियोजनाओं में देरी, तथा
  • आयातित यूरेनियम पर आंशिक निर्भरता।

भारत–ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता केवल ईंधन आपूर्ति का करार नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन से निपटने, हिंद-प्रशांत में रणनीतिक संतुलन और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (11/07/26)