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बाघों के साम्राज्य को अनछुआ रखें

Afeias
25 Sep 2019
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बाघों के साम्राज्य को अनछुआ रखें

Date:25-09-19

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‘वन्य’ शब्द से हमारा क्या अभिप्राय है?

हम इसे कैसे परिभाषित करते हैं?

वन्य-स्थलों का संरक्षण कैसे करते हैं?

कितने बाघों एवं अन्य वन्य-पशुओं को वन्य-जीवन प्राप्त हो पा रहा है?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका सटीक उत्तर देना कठिन है। परन्तु अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए हमें संसार के एक भाग को पूर्ण रूप से वन्य रखना हमारी आवश्यकता है।

जुलाई, 2019 को प्रधानमंत्री ने भारत में बढ़ी हुई बाघों की संख्या पर हर्ष जताते हुए इसे उत्साहजनक बताया था। 2006 में शिकार और एक चीनी दवाई इनके विनाश का कारण बन रही थी। तब से लेकर अब तक बाघों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। भारतीय वन्य पशु संस्थान द्वारा किया गया वर्तमान सर्वेक्षण यथार्थ के काफी करीब लगता है।

बाघों की गणना पर एक बहस लगातार जारी है, और बाघों के विश्व प्रसिद्ध विशेषज्ञ के.कारंत का कहना है कि 50 वर्ष पहले से बाघों के संरक्षण के लिए मुहिम चलाई जा रही है। तब 2000 बाघ थे। इतने वर्षों के प्रयास और खर्च के बाद हम केवल 3000 बाघों से प्रसन्न कैसे हो सकते हैं। यह प्रबंधन की बड़ी भारी समस्या की ओर इंगित करता है। कारंत का शोध बताता है कि भारतीय वनों में दस से पन्द्रह हजार तक बाघों को धारण करने की क्षमता है।

जंगलों में बाघों का साम्राज्य बढ़ाने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम उन्हें अधिक से अधिक वन्य रहने दें। वन्य पर्यावरण का वास्तविक स्वरूप वही है, जिसे मानव के दखल या देखरेख की आवश्यकता ही न पड़े। बढ़ती जनसंख्या के दबाव में ऐसा होना संभव नहीं रह गया है। वन्य जीवन संरक्षण के लिए निर्धारित भूमि पर से मानवीय दखल को बिल्कुल समाप्त किया जाना चाहिए। भारत के अधिकांश पर्यावरणविद्; जो संरक्षण विशेषज्ञ भी हैं, का मानना है कि वनों में रहने वाले समुदाय इस प्रकार की जिम्मेदारी उठा सकते हैं। वनों के मिश्रित उपयोग के लिए निर्धारित क्षेत्रों के जरिए भी इस उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।

पारिस्थितीकीय से जुड़े एक प्रोफेसर का कहना है कि वन्य क्षेत्र जटिल और एक-दूसरे पर आश्रित होता है। इसमें बाघों का अस्तित्व पत्तों पर जीवित रहने वाले कीड़ों को खाने वाली छोटी-छोटी चिड़ियों से लेकर शिकारी पशुओं तक पर निर्भर करता है।अतः वन, वन्य पशु गणना से कहीं अधिक कुछ की मांग रखते हैं।

जिस प्रकार से चरवाहों और लकड़हारों को बाघ संरक्षण प्रांतों से दूर रखा जा रहा है, उसी प्रकार से वन्य अभ्यारण्यों में चलने वाली जीप सफारियों को भी दूर रखा जाना चाहिए।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित स्टीफन ऑल्टर के लेख पर आधारित। 30 अगस्त, 2019

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