क्या खाना पकाना भी कोई इलाज हो सकता है
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घर का बना खाना केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। जापान में हुए एक अवलोकनात्मक अध्ययन के अनुसार, बुजुर्गों में घर पर खाना पकाने की गतिविधि डिमेंशिया के जोखिम को कम करने से जुड़ी पाई गई है।
हालाँकि, खाना पकाना तब बोझ बन जाता है, जब घर के भोजन की पूरी जिम्मेदारी असमान रूप से महिलाओं पर पड़ती है। अकेले रहने वाले लोगों के लिए भी रोज खाना बनाना कठिन लग सकता है। ऐसे में डिलीवरी और सुविधा-आधारित सेवाओं ने काफी मदद की है।
लेकिन पिछले दो दशकों में खाना पकाना बहुत से लोगों के लिए शौक और थेरेपी भी बन गया है। खासकर बेकिंग में एकाग्रता, धैर्य और शांति की जरूरत होती है, जो तनाव कम करने में मदद कर सकती है।
ताजी सब्जियों, फलों, अनाज और दालों के रंगों और विविधता का आनंद लेना तथा नए व्यंजनों को आजमाना भी मानसिक संतुष्टि देता है। आधुनिक किचन गैजेट्स ने खाना पकाने को और आसान व रोचक बना दिया है।
अंततः
खाना पकाना मानव सभ्यता और सामुदायिक जीवन का हिस्सा रहा है। आग पर खाना पकाने की शुरुआत से ही भोजन ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा है। इसलिए खाना पकाना केवल घरेलू श्रम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, रचनात्मकता, आत्म-संतुष्टि और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी हो सकता है।
मुख्य संदेश
खाना पकाना अगर समान रूप से साझा जिम्मेदारी हो, तो यह बोझ नहीं बल्कि शरीर, मन और आत्मा के लिए एक तरह की “किचन थेरेपी” बन सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07/09/26