सड़क सुरक्षा का सुरक्षित तंत्र कैसे बने
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- भारत में दुनिया के केवल लगभग 1% वाहन हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में भारत की हिस्सेदारी करीब 11% है। सीट बेल्ट और हेलमेट का इस्तेमाल न करना दुर्घटना में मौत का सबसे महत्वपूर्ण कारण है।
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क दुर्घटनाओं में मौतें कम करने के लिए सीट बेल्ट, हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपायों के इस्तेमाल को आदत बनाने से जुड़ी याचिका पर सड़क परिवहन मंत्रालय से विचार करने को कहा। संपादकीय के अनुसार, पुलिसिंग की कमी, ट्रैफिक पुलिस की संख्या में कमी और वाहनों में पर्याप्त सुरक्षा चेतावनी प्रणालियों का अभाव भी समस्या को बढ़ाता है।
- लेकिन केवल सीट बेल्ट और बच्चों के मामले में चाइल्ड रेस्ट्रेंट पर जोर देने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में 46.2% दोपहिया वाहन चालक/सवार और 20.6% पैदल यात्री थे। सीट बेल्ट और चाइल्ड रेस्ट्रेंट मुख्यतः कार जैसे बंद वाहनों में बैठे लोगों की सुरक्षा करते हैं। इसलिए सड़क मौतों को कम करने के लिए व्यापक रणनीति जरूरी है।
प्रमुख तर्क
- तेज रफ्तार बड़ी समस्या है –
सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े प्रमुख यातायात उल्लंघनों में तेज रफ्तार सबसे घातक रही है। इसलिए वाहनों को अत्यधिक गति सीमा तक पहुँचने के मौके कम करना प्रभावी उपाय हो सकता है।
- सुरक्षित तंत्र दृष्टिकोण की जरूरत –
सरकारों को यह मानकर सड़कें डिजाइन करनी चाहिए कि इंसान हमेशा सही व्यवहार नहीं करेगा। सड़क व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि मानवीय गलती होने पर भी दुर्घटना की संभावना और उसके गंभीर परिणाम दोनों कम हों।
- डार्क स्पॉट की पहचान और सुधार –
दुर्घटना-प्रवण स्थानों की पहचान कर वहाँ सड़क डिजाइन, संकेत, रोशनी, स्पीड नियंत्रण और अन्य भौतिक उपायों
में सुधार किया जाना चाहिए।
- बच्चों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान –
बच्चों को दोपहिया वाहनों से जुड़े जोखिमों से बचाने के साथ-साथ स्कूलों और अन्य संस्थाओं की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
- ट्रॉमा देखभाल में सुधार –
दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को जल्द चिकित्सा सहायता का मिलने की उसकी जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए आपातकालीन और ट्रॉमा केयर व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
- सुरक्षित व्यवहार की सामाजिक संस्कृति –
केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। समाज में ऐसा माहौल बनाना होगा, जहाँ सुरक्षित ड्राइविंग को प्रोत्साहन और खतरनाक व्यवहार को हतोत्साहन मिले।
सड़क सुरक्षा को केवल “ड्राइवर की गलती” का मुद्दा मानना अधूरा दृष्टिकोण है। बेहतर कानून और उनका प्रभावी पालन जरूरी है। लेकिन सुरक्षित सड़कें, गति नियंत्रण, वाहन सुरक्षा, दुर्घटना-प्रवण स्थानों में सुधार, पैदल यात्रियों और दोपहिया सवारों की सुरक्षा तथा बेहतर ट्रॉमा केयर – इन सभी को साथ लेकर चलना होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12/09/26