विश्व मानचित्र को समानता की ओर ले जाने की जरूरत

Afeias
28 Sep 2026
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यह लेख मर्केटर मैप और उसमें देशों के आकार के असमान चित्रण पर है। 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने दुनिया का ऐसा नक्शा बनाया था, जो समुद्री यात्राओं और नेविगेशन के लिए बहुत उपयोगी था। लेकिन 3D पृथ्वी को 2D नक्शे में बदलने के कारण भूमध्य रेखा से दूर के क्षेत्रों का आकार वास्तविक आकार से बहुत बड़ा दिखाई देता है।

इसमें परिवर्तन की जरूरत पर कुछ बिंदु –

मर्केटर प्रोजेक्शन में यूरोप, रूस और ग्रीनलैंड वास्तविक आकार से बहुत बड़े दिखते हैं।

उदाहरण के लिए, ग्रीनलैंड भारत के लगभग दो-तिहाई आकार का है, लेकिन नक्शे पर वह अफ्रीका के बराबर दिखाई देता है।

अफ्रीकी देशों के संदर्भ में यह समस्या इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि नक्शे पर बड़ा आकार अक्सर शक्ति और महत्व का प्रतीक माना जाता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रूस की विशालता और दूरियों का अनुमान लगाने में भी इस नक्शे की सीमाएँ सामने आईं।

इसके बावजूद मर्केटर नक्शा पूरी तरह बेकार नहीं है। नेविगेशन और गूगल मैप्स जैसे उपयोगों में इसकी विशेष उपयोगिता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने समान क्षेत्रफल वाले नक्शे, जैसे इक्वल एरिया प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाया है। इन नक्शों में देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल का तुलनात्मक चित्रण अधिक वास्तविक होता है।

अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि भारत ने इसका स्वागत किया और कहा कि भारतीय मानचित्र में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के क्षेत्र को आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुरूप दिखाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि नक्शे बदलने से केवल भौगोलिक समझ ही नहीं, बल्कि देशों के आकार को महत्व और शक्ति से जोड़ने की हमारी मानसिकता पर भी पुनर्विचार होना चाहिए।

व्यापक संदेश –

“मानचित्र केवल भूगोल नहीं दिखाते, वे हमारी सोच को भी प्रभावित करते हैं।”

इसलिए ऐसा विश्व मानचित्र अधिक उचित है, जो किसी देश को उसके वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में अनावश्यक रूप से बड़ा या छोटा न दिखाए।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07/09/26