हिमालय में हिमनद झीलों से बढ़ता खतरा
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नेपाल में आई बाढ़ से हुई तबाही सिर्फ जानमाल के तत्कालिक व्यापक नुकसान की तस्वीर ही पेश नहीं करती, बल्कि यह भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी की ओर भी इशारा करती है।
अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण ने इस आपदा का कारण तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्र में हिमनद और चट्टानों के खिसकने से बनी झील के टूटने को बताया। इससे पहले गोसाई कुंड में 4.4 तीव्रता के भूकंप को इसका कारण माना जा रहा था।
- वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण हिमनद पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही हैं तथा पुरानी झीलों का आकार बढ़ रह है। इससे निचले क्षेत्रों की आबादी पर खतरा बढ़ जाता है।
- जिस हिमनद के टूटने से नेपाल में आपदा आई, वह 17 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित था। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और नेपाल के विज्ञानियों द्वारा किए गए आकलन से पता चलता है कि इस क्षेत्र में 47 हिमनद झीलें ऐसी हैं, जिनके फटने से बाढ़ आ सकती है। ये झीलें अपने उदगम से नेपाल की ओर जाती हैं।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बताया कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 7500 से अधिक हिमनद झीलें हैं। इनमें से 189 रेड जोन में रेखांकित की गई हैं। अर्थात ये कभी भी फट सकती हैं।
- सिंधु, गंगा और ब्रम्हपुत्र नदी पर हजारों झीलें हैं, जो अत्यंत तेज गति से प्राकृतिक रूप से आकार ले रही हैं। 2431 हिमालयी हिमनद झीलें ऐसी है, जो जलवायु परिवर्तन के कारण 10 हेक्टेयर में फैल गई हैं। ये जोखिम वाली झीलें हैं। कुछ झीलों का आकार सिकुड़ भी रहा है।
- उपग्रहों से ली गई तस्वीरों से पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश की गेफांग घाटी का आकार सर्वाधिक 178% बढ़कर 101.3 हेक्टेयर हो गया है।
- हिमालयी क्षेत्र में 10 लाख लोग हिमनद झीलों के 20-30 किमी के दायरे में रहते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। इसके अनुसार दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बाढ़ की घटनाओं में तेजी आ सकती है
- पिछली दो शताब्दियों में 525 अरब टन कचरा महासागरों में विलय हुआ है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक दक्षिण महासागर कार्बन डाइ आक्साइड से पूरी तरह भर गया है। इस कारण अब समुद्र इसे अवशोषित करने के बजाय वायुमंडल में ही उगलने लगा है। यदि इसे जल्दी ही नियंत्रित नहीं किया गया, तो वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा।
- वाडिया भू-विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार हिमखंड़ों में काले कार्बन की मात्रा सामान्य से ढाई गुना बढ़ गई है। यह कार्बन सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करता है। इससे ग्लेशियर पिघलते हैं। औसत से कम वर्षा होने पर भी ग्लेशियर ज्यादा पिघलते हैं।
- उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के अध्ययन से पता चलता है कि पिछले 37 वर्षों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। स्थाई स्नो लाइन 5700 से घटकर 5200 मीटर हो गई है।
यदि हिमनद ऐसे ही पिघलते रहे, तो नेपाल जैसी स्थिति बार-बार आ सकती है।