रक्षा-औद्योगिक तालमेल की ओर बड़ा कदम

Afeias
18 Sep 2026
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हाल ही में केन्‍द्र सरकार ने डीआरडीओ की तैयार की गई पारंपरिक मिसाइल तकनीक को घरेलू निजी कंपनियों को हस्‍तांतरित करने की अनुमति दे दी है। यह रक्षा आत्‍मनिर्भरता की दिशा में महत्‍वपूर्ण कदम है। आधुनिक युद्धों के युग में इसके दो महत्‍वपूर्ण पहलू हैं –

  1. युद्धकाल में हथियारों की मांग तेजी से बढ़ सकती है।
  • पहले से मौजूद स्‍टॉक कुछ ही समय में समाप्‍त हो सकते हैं।
  • हाल ही में यू.के. ने यूक्रेन की जरूरत पर र्स्‍टोम शैडो क्रूज मिसाइल के ब्‍लप्रिंट दिए हैं। लेकिन क्‍या यूक्रेन के लिए उनको जल्‍दी ही बना लेना संभव है?
  • ऐसे उदाहरण बताते हैं कि शांतिकाल में साझा की गई हथियार की तकनीक से समय पर उत्‍पादन बढाया जा सकता है। आयात निर्भरता घटाई जा सकती है।
  1. देशी रक्षा उत्‍पादन और निर्यात को बड़ा प्रोत्‍साहन दिया जा सकेगा।
  • रणनीतिक सुरक्षा के लिए सैन्‍य-औद्योगिक रक्षा बेस विकसित हो सकेगा। एक ऐसा आपसी तालमेल वाला रक्षा तंत्र बन सकेगा, जिसमें डीआरडीओ-सेना के साथ बड़े उद्योग, छोटे उद्योग, स्‍टार्ट अप, विश्‍वविद्यालय और कुशल कार्यबल जुड़ सकते हैं।
  • भारत के रक्षा निर्यात में लगातार वृद्धि हो रही है। 2013-14 के 686 करोड़ रुपए से बढकर 2025-26 में यह 38,424 करोड़ रुपए हो गया है। रक्षा तकनीकों के हस्‍तांकरण से इसके बढ़ने की संभावना अधिक हो जाती है।

फिर भी, अभी भारत को और आगे बढ़ने की जरुरत है। इस हेतु अमेरिकी रक्षा औद्योगिक उत्‍पादन का अनुसरण किया जा सकता है।

  • नवाचार के लिए छूट, लचीलापन और स्‍वतंत्रता, ये तीनों देनी होंगी।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना होगा।
  • बड़े और लंबे रक्षा सामग्री के ऑर्डर उपलब्‍ध कराने होंगे।

सरकार ने इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्‍सीलेंस और गवर्नमेंट ई-मार्केटप्‍लेस जैसे मंचों के माध्‍यम से ड्रोन के क्षेत्र में सफलता पाई है। इसी प्रकार से, प्रशासनिक अनुपालन लागत को कम करते हुए अन्‍य रक्षा-उत्‍पादों में भी लक्ष्‍य प्राप्‍त किया जा सकता है।

(‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-27/08/2026)