परीक्षा सुधार से बढ़कर है रोजगार सृजन की चुनौती
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भारत के युवाओं की समस्या केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की कठिनाई या परीक्षा व्यवस्था की नहीं है, बल्कि शिक्षा से रोजगार तक पूरी व्यवस्था में संरचनात्मक असंतुलन की है।
इससे जुड़े कुछ तथ्य –
- सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने अपने एक सर्वे में बताया है कि एक परिवार अपने बच्चे की पढाई पर किए गए खर्च का 16% केवल कोचिंग पर लगा देता है।
- इस वर्ष की मेडिकल प्रवेश परीक्षा में 1.4 लाख सीटों के लिए 22 लाख विद्यार्थी बैठे। इनमें से कुछ का ही चयन यानि 10,000 का चयन शीर्ष 50 कॉलेजों के लिए हुआ। यही स्थिति जेईई की है। सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद में अच्छी कोचिंग लेनी पडती है, और इस पर खर्च बहुत ज्यादा होता है।
- यह भी एक कारण है कि 2023-24 के उच्च शिक्षा के सर्वेक्षण में स्नातक प्रवेश लेने वाले युवा पुरूषों की संख्या 93,322 कम हो गई है। सबसे अधिक बदलाव उत्तरप्रदेश में हुआ है, जहाँ स्नातक में 1.53 लाख नामांकन कम हुए, जबकि डिप्लोमा कोर्स में 1.38 लाख नामांकन बढे हैं।
- आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण इकाई स्तरीय डेटा बताता है कि 15 से 29 वर्ष के 100 स्नातकों में से 26 ही वैतनिक कार्य में थे। केवल चार के पास सही अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा थी।
- आज के युवाओं की रोजगार की समस्या दो स्तरों पर चलती है। एक तो रोजगार की तैयारी है, और दूसरा रोजगार पाने में है।
- भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग 6-6.5% की वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन की गति अपेक्षित नहीं है। इसके प्रमुख कारण है –
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- विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी सकल मूल्य वर्धन (ग्रॉस वेल्यू एडेड) में लगभग एक-छठे के आसपास बनी हुई है। इसे एक चौथाई तक ले जाने का लक्ष्य लंबे समय से चर्चा मे रहा है।
- जीडीपी में कॉरपोरेट का हिस्सा घटकर 17.3% से 10.3% रह गया है। इससे स्पष्ट है कि केवल करों में कटौती से निजी निवेश और रोजगार स्वत: नही बढ़ते हैं।
- कौशल और उद्योग की मांग में भारी असंगति है।
- सरकार के लिए स्पष्ट संदेश है कि औद्योगिक क्षमता में सार्वजनिक निवेश बढ़ाए, घरेलू बाजार को अत्यधिक संरक्षण देने के बजाय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा और निर्यात प्रदर्शन से जोडे, मध्यम आकार के उद्यमों को जटिल नियमन, अनुपालन लागत और अनिश्चित प्रवर्तन से बचाएं। इससे देश के युवाओं को वियतयनाम की तरह ही बडे पैमाने पर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं।
अंतत: हमारे लिए ‘परीक्षा संकट’ से बडा ‘अवसर संकट’ है। अत: नीति को परीक्षा केंद्रित से हटाकर रोजगार-केन्द्रीत बनाने में कल्याण की आशा है।
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित – 26/08/2026)