17-06-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
For Sarvams to Scale, Tap Global Capital
Partner with EU to build sovereign AI models
ET Editorials
India presents a contradiction in AI. It’s home to the world’s 2nd-largest hub for generative AI startups. Yet, it attracts limited global capital because of constrained ambition. Companies developing foundation models are securing domestic venture funding. But even Sarvam, which became a unicorn after raising $234 mn this week, remains modestly valued compared with Silicon Valley peers. Without pairing local innovation with global capital at a larger scale, India risks missing the AI bus. ‘Bharat Innovates 2026’ at Nice, France, is currently showcasing technical talent in the EU, another market vulnerable to overreliance on offshore AI. A stronger international marketing push may be needed for Indian AI innovation to gain global attention.
The EU is a good starting point. Its consumer-centric approach limits access to data critical for building foundation AI models. India has the technical talent to build AI models to train on enormous data it generates. There is an obvious synergy between these two markets, which are equally at risk of being denied access to frontier AI models developed in the US or China. They also share concerns over data protection and adverse economics of becoming AI-consuming regions. These issues resonate in other parts of the world and can be shaped into coherent policy to widen the field in AI.
Sovereign AI matters in upholding cultural diversity, jurisdiction and security. It requires independent ability to develop, deploy and govern AI using local infra, data and models. This is critical to retaining the productivity gains from AI within the economy. Strategic wake-up calls tilt the debate over sovereign AI towards economics, where countries can negotiate acceptable terms. A hybrid model of global and local AI should emerge where India can play a significant role in tech development. This will be an open-source, culturally-sensitive environment that prioritises public-funded infra. Such a model of AI development will have many takers. But India will have to provide proof of execution.
फूहड़ता पर हंसने वाला समाज हमने आखिर कैसे रच डाला है?
प्रियदर्शन, ( लेखक और पत्रकार )
स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के कार्यक्रम में हिमांशु जांगड़ा और सेजल पवार की स्तब्ध कर देने वाली टिप्पणियों का मामला हो या कुछ समय पहले समय रैना के शो में रणवीर इलाहाबादिया के फूहड़ मजाक का- इन्हें श्लीलता-अश्लीलता या नैतिकता-अनैतिकता की कसौटियों पर कसेंगे तो उस गंभीर सभ्यतागत संकट को पहचान नहीं पाएंगे, जो हमारे समय में बहुत तेजी से घटित हुआ है और बड़ा होता जा रहा है। समाज में कई स्तरों पर टूटन बढ़ी है। पुराने मूल्य बेमानी हो चुके हैं। उनमें छुपे लैंगिक और सामाजिक अन्यायों को हम पहचानने लगे हैं, लेकिन नई मूल्य संहिता हमारे सामने नहीं है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उचित और जरूरी मांग इस समय एक तरह की आम स्वीकृति हासिल कर चुकी है, लेकिन इस स्वतंत्रता के साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी की जो जरूरत है, वह तय नहीं है। संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं, एकल परिवार भी टूट चुके हैं- भावनात्मक रूप से नहीं तो कम से कम भौतिक रूप से। मां-बाप पुराने घरों में बच्चों के इंतजार में हैं और बच्चे अपनी नई नौकरियों में अपनी आजादी का मतलब समझने और अपनी नई हासिल आर्थिक हैसियत से खुशी नाम की वह चीज खरीदने में जुटे हैं, जो उनके अदृश्य अकेलेपन को भर सके।
जो शिक्षा इन बच्चों को जीवन के सरोकारों, संघर्षों या सवालों से जोड़ सकती थी, वह अब नहीं बची है। बारहवीं के बाद अच्छे पैसे वाली नौकरी के नाम पर होने वाली खर्चीली पढ़ाई ने इनकी प्राथमिकताएं निर्धारित कर दी हैं। एक चमचमाता दफ्तर इनका घर और समाज दोनों है, जो लैपटॉप की शक्ल में इनके कंधों पर लदा रहता है और काम के तनाव के बीच खाने-पीने-हंसने-जीने के रास्ते बताता रहता है। ये रास्ते स्टैंडअप कॉमेडी से लेकर ओटीटी पर मिलने वाली अच्छी-बुरी फिल्मों, अजीबो-गरीब वीडियो, रील्स और तरह-तरह के प्रलोभनों के बीच बनते हैं। हर दो-तीन सेकंड में बदल जाने वाली कटी-छंटी देहमुद्राओं वाले दृश्य इनके अवचेतन में अस्थायित्व का भाव भरते चलते हैं- नौकरियां भी बदलती रहनी हैं, रिश्ते भी बनते-टूटते रहने हैं, देह और दैहिक संबंधों को भी बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। यहीं से वह समाज बनता है, जो स्त्रीद्वेषी, गाली-गलौज से भरे फूहड़ हंसी-मजाक को कॉमेडी का हिस्सा समझता है और उस पर हंसता दिखाई पड़ता है।
दुर्भाग्य से यह प्रक्रिया ऐसे समय चल रही है, जब लड़कियां हिंदुस्तान में पहली बार बिल्कुल बराबरी के स्तर पर अपनी आजादी मांग और चाह रही हैं। इस चीज ने नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ियों के मुकाबले कम से कम लैंगिक बराबरी को लेकर ज्यादा संवेदनशील भी बनाया है। लेकिन पुरानी सामंती सड़ांध और नई आधुनिक लंपटता के बीच विकसित जो मर्दवादी मानस है, वह कहीं अवचेतन में अब भी सक्रिय है और वह इस बराबरी के खिलाफ कई मोर्चों पर उसे अपमानित करता है, लड़कियों को 370 रुपये की बिरयानी में खरीद लेने लायक चीज मानता है।
दुर्भाग्य यह भी है कि नए भारत में कोई सांस्कृतिक विमर्श नहीं है- साहित्य, कविता, सृजन के नाम पर बस वायरल वीडियो हैं, जो जीवन में रोमांच पैदा करते हैं। जिस राजनीति का दायित्व यह सांस्कृतिक माहौल बनाना है, वह सांप्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी है। उसके लिए दंगा भी एक अवसर है और दंगे के बाद बांटी जाने वाली राहत भी। तो इस पीढ़ी के पास मूल्य कहां से आएंगे? तो इस दिशाहारा, मूल्यहीन पीढ़ी के लड़के-लड़कियां कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मजाक करते हैं, माफी मांगते हैं और अवसाद में डूब जाते हैं। घर, परिवार, समाज नहीं हो तो सारे न्याय उस सोशल मीडिया पर करने होते हैं, जो बस लुत्फ लेना जानता है।
Date: 17-06-26
अगर हम हर काम को ‘आउटसोर्स’ कर देंगे तो फिर खुद क्या करेंगे?
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, ( जाने माने चिकित्सक )
भारत में मोबाइल, सस्ता डेटा और नए ऐप्स ने जीवन को आसान बनाया है। किराना घर तक आ जाता है, टैक्सी दरवाजे पर मिल जाती है, खाना मोबाइल स्क्रीन से थाली तक पहुंच जाता है। लेकिन अब ऐप के जरिये मानवीय सहायता भी ऑन-डिमांड मिलने लगी है- यानी कोई व्यक्ति आपके साथ बाजार जाएगा, आपके बैग उठाएगा, आपके लिए लाइन में खड़ा होगा, आपको पानी देगा, आपके लिए कुर्सी लगाएगा और आपकी छोटी-बड़ी निजी सुविधाओं का ध्यान रखेगा। इसे आधुनिक सेवा, सुविधा और रोजगार का नया मॉडल बताया जा रहा है। लेकिन क्या यह सचमुच सुविधा है या सामंतवाद का नया ऐप आधारित संस्करण?
सुविधा बुरी नहीं है। लेकिन जब वो हमें बीमार, निष्क्रिय, निर्भर और असंवेदनशील बनाने लगे, तब हमें रुककर सोचना चाहिए। ऐप से मंगाई गई सुविधा सस्ती लग सकती है, पर उसकी सामाजिक और स्वास्थ्यगत कीमत महंगी है। देश को तय करना होगा कि वह बराबरी, आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य की ओर बढ़ेगा या डिजिटल सामंतवाद की ओर? पहले यह रवैया दरबारों, क्लबों और नौकरों की कतारों में दिखता था। अब वही मानसिकता मोबाइल ऐप, डिजिटल भुगतान और स्टार्टअप की चमकदार भाषा में लौट रही है।
किसी व्यक्ति को रोजगार देना भी गलत नहीं है। आखिर सेवा-क्षेत्र अर्थव्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। ड्राइवर, घरेलू सहायक, सुरक्षा गार्ड, नर्सिंग अटेंडेंट, डिलीवरी वर्कर- ये सब भी सम्मानजनक और आवश्यक काम करते हैं। समस्या काम में नहीं, उस मानसिकता में है, जिसमें एक सक्षम, स्वस्थ और चल-फिर सकने वाला व्यक्ति अपना पानी खुद उठाने, अपना सामान खुद संभालने, अपनी बारी आने तक लाइन में खड़े रहने या कुछ कदम पैदल चलने को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ समझने लगे। जब सुविधा प्रदर्शन बन जाए, तब वह वह असमानता का तमाशा बन जाती है।
यह विचार केवल सामाजिक रूप से ही चिंताजनक नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी नुकसानदेह है। आधुनिक शहरी भारत पहले ही बैठी हुई जीवनशैली, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर, पीठ दर्द, तनाव और नींद की कमी से जूझ रहा है। डॉक्टर रोज मरीजों को यही सलाह देते हैं कि अधिक चलें, सीढ़ियां चढ़ें, छोटे काम खुद करें, शरीर को रोजमर्रा की गतिविधियों में लगाएं। लेकिन ऐप-आधारित सुविधा संस्कृति हमें उलटी दिशा में धकेल रही है। यह कहती है- आप मत चलिए, कोई और चलेगा। आप मत उठाइए, कोई और उठाएगा। आप लाइन में मत खड़े रहिए, कोई और खड़ा रहेगा। यानी शरीर को निष्क्रिय और अहंकार को सक्रिय रखिए।
स्वास्थ्य केवल जिम में एक घंटा पसीना बहाने से नहीं बनता। स्वास्थ्य दिनभर की छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधियों से बनता है- बाजार में चलना, अपना सामान उठाना, घर के छोटे काम करना, बस या मेट्रो तक पैदल जाना, कतार में खड़े रहना, पानी खुद लेना, बच्चों के साथ खेलना। ऐसी गतिविधियों को वैज्ञानिक भाषा में नॉन-एक्सरसाइज एक्टिविटी कहा जाता है। आधुनिक जीवन में यही सबसे तेजी से गायब हो रही हैं। जब हम हर छोटे काम को आउटसोर्स कर देते हैं, तब हम सिर्फ पैसा खर्च नहीं करते; अपनी मांसपेशियों, हड्डियों, मेटाबॉलिज्म, आत्मनिर्भरता को भी कमजोर करते हैं।
रोजगार जरूरी है, लेकिन हर रोजगार सामाजिक प्रगति नहीं होता। सभ्य समाज केवल नौकरियों की संख्या से नहीं बनता; वह काम की गरिमा, श्रमिक अधिकारों, सामाजिक बराबरी और मानवीय संबंधों की मर्यादा से भी बनता है। हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जो लोगों को सम्मान दे।
जी-7 की बैठक
संपादकीय
फ्रांस में जी-7 की बैठक के चलते विश्व का ध्यान उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और लोकतंत्र वाले देशों के इस संगठन की ओर जाना स्वाभाविक है। वैसे तो इस संगठन के सदस्य देशों में अमेरिका के अतिरिक्त ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान भी शामिल हैं, लेकिन कुल मिलाकर इस पर अमेरिका का ही दबदबा रहता है। प्रति वर्ष जब भी जी-7 देशों की बैठक होती है। तो यह संगठन चर्चा में तो आता है, लेकिन अभी तक का अनुभव यही बताता है कि वह कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाता। इस बार भी ऐसा ही हो तो हैरत नहीं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप सदस्य देशों को सहयोगी कम, अपना अनुयायी अधिक समझते हैं। राष्ट्रपति के रूप में अपने इस दूसरे कार्यकाल में उन्होंने करीब- करीब सभी सदस्य देशों के साथ टैरिफ और अन्य मामलों में मनमाना व्यवहार किया है कुछ सदस्य देशों के साथ तो उन्होंने बहुत ही बुरा बर्ताव किया है। उनके अपनी ही चलाने वाले रवैये के कारण अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद बढ़े हैं। इसे देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि यह संगठन टैरिफ, जलवायु परिवर्तन, एआइ के उचित उपयोग आदि के मामले में किसी सहमति पर पहुंच कर ऐसे कोई निर्णय ले पाएगा, जो विश्व की समस्याओं के समाधान में सहायक बनेंगे।
यह एक तथ्य है कि आपसी मतभेदों के कारण ही जी 7 संगठन न तो रूस यूक्रेन युद्ध को थाम पाया और न ही पश्चिम एशिया संकट समेत अन्य वैश्विक समस्याओं को समय रहते सुलझा सका। इस बार बैठक का एक प्रमुख एजेंडा व्यापारिक असंतुलन दूर करना भी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस असंतुलन का एक बड़ा कारण तो खुद अमेरिका है। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने सदस्य देशों के साथ ही अन्य कई देशों पर जैसी धौंस जमाने की कोशिश की है, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। चूंकि पिछले वर्षों की तरह इस बार भी भारतीय प्रधानमंत्री को मेहमान के रूप में इस संगठन में आमंत्रित किया गया है, इसलिए भारत के साथ विकासशील एवं निर्धन देशों का ध्यान भी इस बैठक की ओर जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने इन देशों की आकांक्षाओं को रेखांकित करने की बात कही है। वे पहले भी ऐसा करते रहे हैं। जी-7 बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की अमेरिकी राष्ट्रपति से अलग से मुलाकात होने के चलते यह भी विशेष रूप से देखना होगा कि दोनों देशों के संबंधों में व्यापक सुधार का रास्ता साफ होता है या नहीं? यदि अमेरिका इस संगठन को प्रभावी बनाना चाहता है तो उसे सदस्य देशों के साथ समानता का व्यवहार करना होगा। निःसंदेह ऐसी ही अपेक्षा भारत और अन्य मेहमान देशों की भी रहेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति को यह आभास होना चाहिए कि अब अमेरिका पहले जितना सक्षम नहीं रहा ।
Date: 17-06-26
बुनियादी कमियां दूर करें
संपादकीय
यह सही है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के अंतिम परिणाम को लेकर अभी काफी अनिश्चितता बनी हुई है लेकिन रविवार को इसकी घोषणा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव को स्पष्ट रूप से कम कर दिया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट में यातायात धीरे-धीरे बढ़ेगा। कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को सामान्य स्तर पर लौटने में अगर महीनों नहीं तो भी हफ्तों का समय लग सकता है। आंशिक रूप से ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि युद्ध के दौरान इस क्षेत्र में कई संयंत्र-केंद्र क्षतिग्रस्त हो गए। इसके बावजूद कच्चे तेल की कीमतें कम हुई हैं और आपूर्ति दबाव कम होने के साथ इनके और नीचे आने की उम्मीद है। कम ऊर्जा कीमतें और बेहतर उपलब्धता वैश्विक अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाएंगी। खासतौर पर भारत जैसे देशों को जो कच्चे तेल की अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
पश्चिम एशिया में छिड़ी लड़ाई ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव डाला। खासतौर पर बाहरी खातों को संभालने में। देश का चालू खाते का घाटा (सीएडी) तेल और गैस की ऊंची कीमतों के कारण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2 फीसदी तक हो जाने की आशंका थी। व्यापक अनिश्चितता ने पूंजी के बाहर जाने के हालात बनाए। परिणामस्वरूप भारत को चालू खाते और पूंजी खाते दोनों में घाटे का सामना करना पड़ा जिससे रुपये पर दबाव आया।
भारतीय रुपया मार्च से मई के बीच 5 फीसदी से अधिक गिर गया। विदेशी मुद्रा प्रवाह में सुधार लाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ने इस महीने की शुरुआत में कई उपायों की घोषणा की। इनमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के कराधान में विसंगति को ठीक करना, बाहरी वाणिज्यिक उधार को प्रोत्साहित करना और बैंकों को प्रवासी भारतीयों से नई विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (एफसीएनआर-बी) जमा जुटाने के लिए प्रेरित करना शामिल था। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि विदेशी पूंजी लाने के लिए और कदम उठाए जाएंगे। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा घोषित उपायों से पर्याप्त प्रवाह आने में मदद मिलेगी। बैंक आक्रामक रूप से एफसीएनआर-बी जमा जुटाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं इसलिए कुछ अनुमानों के अनुसार इससे 100 अरब डॉलर तक का प्रवाह हो सकता है। अपेक्षित प्रवाह और साथ ही पश्चिम एशिया में अनिश्चितता में कमी के कारण अल्पावधि में बाहरी खातों पर दबाव कम होने की उम्मीद है। इसका प्रतिबिंब हाल के दिनों में रुपये में सुधार में भी दिखता है।
हालांकि नीति-निर्माताओं को निकट भविष्य में स्थिरता की संभावित वापसी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि बाहरी खाता पिछले वर्ष भी दबाव में था। ऐसा आंशिक रूप से व्यापार-संबंधी अनिश्चितताओं के कारण था। भारत को कई मोर्चों पर काम करने की आवश्यकता है क्योंकि विभिन्न मदों के तहत विदेशी उधारी बढ़ाना दीर्घकालिक टिकाऊ समाधान नहीं हो सकता। आमतौर पर हमारे यहां चालू खाते के घाटे की हालत रहती है जो विकास स्तर और निवेश आवश्यकताओं को देखते हुए उचित है। हालांकि हमें अपने बचत और निवेश के अंतर को पाटने के लिए स्थिर दीर्घकालिक पूंजी की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई आमतौर पर विदेशी पूंजी का सबसे वांछित रूप माना जाता है। लेकिन 2024-25 में सकल एफडीआई आवक 2020-21 में प्राप्त स्तर से कम थी। इसके अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा विदेश में निवेश और विदेशी कंपनियों द्वारा रकम वापस ले जाने का स्तर बढ़ गया है जिससे शुद्ध एफडीआई कम हो गया है जो भुगतान संतुलन के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है।
यद्यपि भारतीय कंपनियों द्वारा कुछ विदेशी निवेश और विदेशी कंपनियों द्वारा धन वापसी अपेक्षित है लेकिन लक्ष्य सकल प्रवाह को पर्याप्त रूप से बढ़ाने का होना चाहिए। इसके अलावा भारत को निर्यात बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हाल के महीनों में कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करना एक अच्छा कदम रहा है। हालांकि पिछले दशक या उससे अधिक में बढ़े हुए शुल्कों के प्रभाव की समीक्षा करना उचित होगा। गत 18 महीनों में रुपये में काफी गिरावट आई है जिससे व्यापार योग्य क्षेत्रों को मदद मिल सकती है। शायद अब शुल्क घटाना शुरू करने का समय आ गया है। इसके अलावा बढ़ती अनिश्चित दुनिया में मुद्रा प्रबंधन की भी समीक्षा की जरूरत हो सकती है।
शुचिता की खातिर
संपादकीय
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट यूजी- 2026 ) की शुचिता बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से जिस तरह के उपायों पर जोर दिया जा रहा है, अब उन्हीं पर सवाल उठने लगे हैं। राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी (एनटीए) की सिफारिश पर केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मंगलवार को संवाद ऐप ‘टेलीग्राम’ पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया। एनटीए का कहना है कि यह निर्णय इस ऐप की उस तकनीकी सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है, जिसका इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के संबंध में प्रश्नपत्र लीक के फर्जी साक्ष्य गढ़ने के लिए किया जाता है। मगर क्या सरकार के इस कदम से यह पूरी तरह सुनिश्चित हो पाएगा कि प्रश्नपत्र लीक नहीं होगा। तकनीक के इस दौर में क्या कोई इसी तरह के दूसरे ऐप का इस्तेमाल नहीं कर सकता? जाहिर है कि ऐसे सतही उपाय इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते हैं।
सरकार ने ‘टेलीग्राम’ पर नीट यूजी की पुनः परीक्षा होने तक इसलिए रोक लगा दी, क्योंकि इसका इस्तेमाल प्रश्नपत्र लीक के फर्जी साक्ष्य गढ़ने के लिए किया जा रहा है। मगर इसकी मूल जड़ तो वहां है, जहां से प्रश्नपत्र लीक होता है। विचित्र बात है कि प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर उसके परिवहन तक की व्यवस्था को पुख्ता करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन परीक्षा संचालन से जुड़े लोगों की जवाबदेही पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह बात सही है कि किसी संवाद ऐप पर भ्रामक जानकारियां फैलाने से परीक्षार्थियों के मनोबल पर असर पड़ सकता है, लेकिन क्या इस तरह के ऐप पर प्रतिबंध लगा देने से समस्या का स्थायी समाधान निकल पाएगा। ऐसे तो सोशल मीडिया से जुड़े कई मंच हैं, जिन्हें इस तरह की अफवाह फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘टेलीग्राम’ पर पाबंदी से लाखों ऐसे नागरिक भी प्रभावित होंगे, जो इसका इस्तेमाल वैध तरीके से निजी, शैक्षणिक और पेशेवर जानकारी से जुड़े कामों के लिए करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि सरकार परीक्षा में गड़बड़ी को रोकने के लिए स्थायी समाधान खोजने की दिशा में कदम उठाए।
Date: 17-06-26
मानव संसाधन और कौशल विकास
अजय जोशी
किसी भी देश के आर्थिक विकास में केवल प्राकृतिक संसाधनों, पूंजी या तकनीक का योगदान नहीं होता, बल्कि इसमें मानव संसाधन का भी अहम स्थान होता है इसकी गुणवत्ता और उत्पादकता की विकास में बड़ी भूमिका होती है। मानव संसाधन में उन लोगों को सम्मिलित किया जाता है, जो अपनी शारीरिक, बौद्धिक, तकनीकी तथा प्रबंधकीय क्षमता से उत्पादन और विकास की प्रक्रिया में अमूल्य योगदान करते हैं भारत दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है। इसकी लगभग पैंसठ फीसद जनसंख्या पैंतीस वर्ष से कम आयु के युवाओं की है। यह युवा शक्ति देश की अमूल्य संपत्ति है। यदि युवाओं में बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल का विकास किया जाए, तो वे देश की आर्थिक वृद्धि को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के तीनों महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में रोजगार तथा मानव संसाधन की स्थिति अलग-अलग है। कृषि प्राथमिक क्षेत्र है, जो किसी भी देश में बहुत बड़े कार्यबल को रोजगार देती है। निर्माण वाले द्वितीयक क्षेत्र की उत्पादन में और सेवाओं वाले तृतीयक क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद में अहम भूमिका होती है नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण और सांख्यिकी मंत्रालय के श्रमबल सर्वेक्षण के अनुसार, तीनों क्षेत्रों में प्राथमिक क्षेत्र कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन और खनन जैसी गतिविधियों से जुड़ा है। रोजगार के लिहाज से देखें, तो भारत के कुल मानव संसाधन का लगभग चालीस फीसद हिस्सा आज भी प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत है। भारत की जनसंख्या वर्ष 2025-26 में लगभग 143 करोड़ से अधिक आंकी जाती है। इसमें कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या कुल आबादी का लगभग 67 फीसद है। यह स्थिति भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। मानव संसाधन उत्पादन का सबसे अहम घटक है कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र, सभी में प्रशिक्षित और कुशल श्रमिक उत्पादन क्षमता को बढ़ाते हैं।
देश की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 55 फीसद से अधिक है। इसका भी प्रमुख आधार प्रशिक्षित मानव संसाधन है। सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसे क्षेत्रों में लाखों भारतीय पेशेवर देश की आय और विदेशी मुद्रा अर्जन में योगदान दे रहे हैं। कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों, उन्नत बीजों, सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के प्रसार में प्रशिक्षित मानव संसाधन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हरित क्रांति के बाद कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यह वृद्धि केवल तकनीक के कारण नहीं, बल्कि किसानों के प्रशिक्षण के कारण संभव हुई। मानव संसाधनों की जरूरत उद्योगों के विकास के लिए भी चाहिए। वहां कुशल श्रमिक, इंजीनियर, प्रबंधक और तकनीशियन आवश्यक होते हैं।
आटोमोबाइल, दवा उद्योग, इस्पात और इलेक्ट्रानिक उद्योगों की सफलता के पीछे प्रशिक्षित मानव शक्ति की बड़ी भूमिका है। विशेष रूप से भारतीय औषधि उद्योग विश्व के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में गिना जाता है। इसमें लाखों वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का योगदान है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में लगभग पचास लाख से अधिक पेशेवर कार्यरत है। साफ्टवेयर निर्यात, डिजिटल सेवाएं और ‘बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग’ के माध्यम से भारत को अरबों डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां मानव संसाधन आधारित विकास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
शिक्षा मानव संसाधन विकास का आधार है। शिक्षा व्यक्ति की उत्पादकता, नवाचार क्षमता और आय अर्जित करने की योग्यता को बढ़ाती है। भारत में साक्षरता दर स्वतंत्रता के समय लगभग 18 फीसद थी, जो अब 77 फीसद से अधिक हो चुकी है। उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत में 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, 45 हजार से अधिक महाविद्यालय, हजारों तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान कार्यरत हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की बढ़ती संख्या देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ा रही है। मगर अर्थव्यवस्था में केवल शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है, कौशल भी बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने विभिन्न कौशल विकास कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं। इसके अंतर्गत ‘स्किल इंडिया मिशन’ और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना इत्यादि प्रमुख हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना है।
स्वस्थ मानव संसाधन ही देश का उत्पादक मानव संसाधन होता है। बीमारी और कुपोषण श्रम उत्पादकता को कम कर देते हैं। भारत में औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 70 वर्ष से अधिक हो चुकी है, जबकि शिशु मृत्यु दर में भी निरंतर कमी आई है। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार, टीकाकरण कार्यक्रमों और पोषण योजनाओं ने मानव संसाधन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया है। मानव संसाधन में महिलाओं की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है वे भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि से महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। कृषि, सूक्ष्म एवं लघु उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाएं, उद्यमिता आदि क्षेत्रों में यदि महिला श्रम भागीदारी दर में और वृद्धि की जाए, तो भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।
मानव संसाधन केवल रोजगार प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। यह रोजगार सृजन भी करता है। भारत विश्व के सबसे बड़े नवउद्यम पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है। नवाचार, तकनीकी ज्ञान और उद्यमशीलता के कारण बड़ी संख्या में नए उद्यम स्थापित हुए हैं, जिन्होंने लाखों रोजगार सृजित किए हैं। युवा उद्यमी डिजिटल अर्थव्यवस्था फिनटेक, ई-कामर्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं। इतना सब कुछ होते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था में मानव संसाधनों से जुड़ी चुनौतियां भी कम नहीं है। इनमें बेरोजगारी बड़ी समस्या है। अधिकांश मामलों में उद्योगों की आवश्यकता और युवाओं के कौशल के बीच काफी अंतर पाया जाता है। इस कारण शिक्षित होकर भी वे उद्योगों के लिए अधिक उपयोगी नहीं रह पाते शिक्षा की गुणवत्ता मामले में भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में काफी असमानता है। इस कारण शिक्षित होते हुए भी वे अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में उपयोगी साबित नहीं हो पाते।
|
देश में महिला कार्यबल की भागीदारी अभी भी कई विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। जबकि भारत की युवा आबादी आगामी दशकों में आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार बन सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित मानव संसाधन की मांग तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और कौशल विकास में निरंतर निवेश करता है, तो वह विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। मानव संसाधन भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में प्रभावी नीतियों के माध्यम से मानव संसाधन को उत्पादक मानव पूंजी में परिवर्तित किया जा सकता है।
चाक-चौबंद तैयारी
संपादकीय
देश भर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए रविवार को पुनर्परीक्षा होने जा रही है। प्रश्न-पत्र लीक हो जाने के कारण 3 मई की नीट (यूजी) परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी और समूचे तंत्र को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। ऐसे में, पुनर्परीक्षा के मद्देनजर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘टेलीग्राम’ पर 22 जून तक अस्थायी रोक लगाने के केंद्र सरकार के फैसले की तार्किकता समझी जा सकती है। यह कदम बताता है कि कदाचार मुक्त परीक्षा संपन्न कराने के लिए सरकार बेहद गंभीर है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के अनुरोध पर उसने 30 जून तक टेलीग्राम के किसी संदेश को संपादित करने पर भी रोक लगा दी है। इस सोशल मीडिया मंच के बैकडेट एडिटिंग फीचर के दुरुपयोग की कई शिकायतें सामने आई थीं और इसी के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को यह सख्ती बरतनी पड़ी है। इसके पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने वायु सेना से भी नीट परीक्षा के लिए मदद मांगी थी। साफ है, सरकार अपने तई कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती और परीक्षार्थियों को भी यह भरोसा देना चाहती है कि वे बेखौफ होकर परीक्षा दें और अपने भविष्य को लेकर कतई मायूस न हों।
बीते डेढ़ महीने में इस परीक्षा के 23 लाख अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों को जिस मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा है, उसकी भरपायी तो खैर नहीं हो सकती, मुक्त परीक्षा संपन्न मगर एक निष्पक्ष परीक्षा ही उनके साथ इंसाफ करेगी। नीट (यूजी) 2026 को दागदार बनाने वालों के खिलाफ जिस तत्परता से कार्रवाई की गई और जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया है, उससे यह इत्मीनान हुआ है कि सरकार जल्द से जल्द वास्तविक दोषियों को सजा दिलाना चाहती है। इस तत्परता से उन लोगों को भी पैगाम मिल गया होगा, जो अपने भ्रष्ट आचरण से लाखों मासूम विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने के मनसूबे बांधते रहते हैं। हाल के वर्षों मैं एक के बाद दूसरी परीक्षा के प्रश्न- पत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं, उसके बाद यह लाजिमी हो गया है कि हर परीक्षा के लिए चाक-चौबंद तैयारी की जाए। कदाचार मुक्त परीक्षा न सिर्फ हमारे छात्रों का बुनियादी हक है, बल्कि हमारे पूरे तंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त रखने के लिए भी जरूरी है। आखिर भ्रष्ट तरीके से मेडिकल कॉलेज में पहुंचे बच्चे भविष्य में किस किस्म के डॉक्टर बनते ? क्या वे वाकई उतने संजीदा भी हो पाते, जिसकी अपेक्षा यह प्रतिष्ठत पेशा करता है?
बात सिर्फ नीट (यूजी) 2026 परीक्षा की नहीं है, इस बार सीबीएसई की 12वीं की उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर भी काफी शिकायतें सामने आई हैं। इस सबसे परीक्षा प्रणाली को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। इसलिए हमें एक ऐसे आदर्श परीक्षा तंत्र की दरकार है, जो देश के किसी भी नौनिहाल के साथ कोई धोखा न होने दे। दुर्योग से, जहां सबसे अधिक संवेदनशीलता की जरूरत होती है, वहां भी गैर-जिम्मेदारी और संकीर्ण राजनीति हावी हो जाती है। पहले तो एनटीए नीट परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक होने की बात ही मानने को तैयार न थी, लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ा और प्रतिपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया, तब उसने इसे गंभीरता से लिया। उसके पास संसद की स्थायी समिति तक के सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं थे। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। इसलिए, एक जवाबदेह व्यवस्था तो होनी ही चाहिए। हम अपने बच्चों को कब तक पुनर्परीक्षा और पुनर्मूल्यांकन के दुश्चक्र में फंसने देंगे ?
Date: 17-06-26
सुपर अल-नीनो से निपटने के लिए हम कितने तैयार
पंकज चतुर्वेदी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
सुपर अल-नीनो जैसी गंभीर जलवायु घटना का खतरा हमारे सिर पर खड़ा हो गया है। इस प्राकृतिक आपदा से जूझने के लिए देश को गंभीर और त्वरित नीति की जरूरत है। जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर का पानी असामान्य रूप से गर्म होकर दो डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है, त वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पूरी तरह बिगड़ जाता है। इसका सीधा असर भारतीय उपमहाद्वीप के मानसून पर पड़ता है। मानसून के कमजोर पड़ने का मतलब है खरीफ की बुवाई में देरी, सिंचाई के संसाधनों पर दबाव व अंततः अनाज व ताजा उत्पादों की उपलब्धता में भारी गिरावट। इससे देश के करोड़ों किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और बाजार में महंगाई का पूरा चक्र प्रभावित होता है।
ऐतिहासिक साक्ष्य और आंकड़े गवाह हैं कि जब-जब प्रशांत महासागर में यह हलचल तीव्र हुई, तब-तब भारत में औसत मौसमी वर्षा न सिर्फ कम रही, बल्कि उसकी असमानता भी खतरनाक स्तर तक बढ़ी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और पिछले 150 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि देश ने जितने भी भीषण सूखे झेले हैं, उनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत का सीधा संबंध अल-नीनो वर्षों से रहा है। वर्ष 1997 और 2015 के सुपर अल-नीनो इसके हालिया उदाहरण हैं, जब देश के सैकड़ों जिले सूखे की चपेट में आ गए थे और मानसून सामान्य से चौदह प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया था।
इस साल भी देश के बड़े हिस्से से मानसूनी बादल गायब दिखाई दिए। मौसम विभाग के मुताबिक, 4 जून से 15 जून के बीच देश में सामान्य 53.7 मिमी के मुकाबले सिर्फ 19.2 मिमी बारिश हुई, यानी बारिश में 64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इससे बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत 16 राज्य प्रभावित हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के शोध बताते हैं कि एक तीव्र अल-नीनो से वर्ष में देश के कुल धान उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जब खरीफ फसलों की पैदावार घटती है, तो स्थानीय बाजारों में आपूर्ति कम होती है और कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
इसके साथ ही कृषि लागत का बढ़ना भी एक वास्तविक और बड़ा आर्थिक खतरा है। ये सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के शोध-पत्रों के अनुसार, कमजोर मानसून के कारण पैदा होने वाला यह कृषि संकट सीधे तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति को एक से डेढ़ प्रतिशत तक बढ़ा देता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की रिपोर्टों से स्पष्ट है कि अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो का प्रभाव केवल सूखे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वातावरण में अत्यधिक गर्मी व नमी के कारण बेमौसम तेज बारिश, ओलावृष्टि और तीव्र लू जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ जाती हैं।
इस दोहरे खतरे का सामना करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति के अंतर्गत नीति आयोग के सुझावों पर हमें कृषि-कर्म में विविधता की नीति अपनानी होगी। कम जल-उपयोग वाली फसलों और मोटे अनाजों को बढ़ावा देकर तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को अपनाकर न केवल पानी की बचत की जा सकती है, बल्कि फसल की पैदावार में भी स्थिरता लाई जा सकती है। हमारे कृषि अनुसंधान संस्थानों को चरम मौसमी सहिष्णु बीज विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। नीति-निर्माताओं को त्वरित वित्तीय सहायता, प्रभावी फसल बीमा योजनाएं और राहत कार्यों के लिए बजटीय आवंटन को सुदृढ़ करना होगा। केंद्र व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय ही जल स्रोतों के उचित वितरण और खाद्य उपलब्धता को सुनिश्चित कर सकता है।
यह याद रखना जरूरी है कि सुपर अल-नीनो केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि समूचे आर्थिक और सामाजिक तंत्र की परीक्षा लेने वाली आपदा है। इसलिए तैयारियां केवल कृषि मंत्रालय तक सीमित न होकर खाद्य वितरण, जन-स्वास्थ्य, ऊर्जा आपूर्ति और ग्रामीण बैंकिंग सेवाओं तक विस्तृत होनी चाहिए। भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन इसे जागरूक नीतियों, समयबद्ध कार्रवाई और स्थानीय भागीदारी के मजबूत संबल की जरूरत होगी, तभी हम इस बड़े संकट को टालने में सफल हो सकेंगे।