27-10-2026 (Important News Clippings)

Afeias
27 Oct 2026
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Date: 27-10-26

Economy, Not Ideology

When populists and autocrats lose, is the vote on political theory or economic reality?

TOI Editorials

There’s a view, supported by research, that democracy is in danger. Per Sweden’s V-Dem Institute, the average person has about the same democratic freedoms now as in 1978. So, it’s tempting to read election results from Brazil and Serbia as an endorsement of democracy. In Brazil, voters narrowly denied Flavio Bolsonaro, a candidate with undisguised authoritarian tendencies, and gave Lula another term. In Serbia, they roundly defeated strongman Aleksandar Vucic. The Serbian result has got outsized attention – it’s a country of just 65L people and $112bn GDP – because the winning side is a student protest movement, fronted by academics, doctors, etc. Yet, this may not be the democratic revival many are hoping for.

Rather, as Harvard Prof Steven Levitsky pointed out in 2024, such results could chiefly be anti-incumbency. Even Lula in Brazil lost the first round to Bolsonaro, before staging a spirited fightback. The trend has been clear since 2020, when Covid, and economic disruption, led govts to adopt easy-money policies. The resultant inflation worked for billionaires, but left the middle class, and everyone below, worse off. Levitsky noted that citizen distrust and discontent were running high, and in 41 of 55 polls between 2020 and 2024, the incumbent lost: “almost certainly a product of and part of Covid inflation”.

Were young Serbians, who campaigned against Vucic for two years, fighting for an ideology or their economic future? We’ve seen how Labour won a landslide in UK, only to become unpopular within months. In Germany, Social Democrats aren’t in a happy place either. Or look at US, which ousted Trump, a populist, for Biden, only to vote him back four years later. And now, with US midterms scheduled for Nov 3, it looks like Americans will pounce on the chance to clip Trump’s wings in Congress. Why? Because, far from addressing their cost-of-living crisis, as he promised, he’s worsened their economic pain with the war on Iran.

Israel, another test case for democracy, votes today. And while polls don’t show Netanyahu winning outright, whoever wins is unlikely to go soft on Palestinians. In fact, young Israelis, first-time voters, don’t appear to have much sympathy for Gazans either. What they are weary of is endless war and psychological hardship. And corruption. People everywhere are asking elected leaders, “What have you done for us, for our future?” And incumbents are losing because they usually don’t have a convincing answer.


Date: 27-10-26

Dubious retreat

The National Medical Commission must not be seen as lax on regulation

Editorials

The National Medical Commission (NMC) has denotified and withdrawn its 2023 Maintenance of Standards of Medical Education Regulations (MSMER), diminishing the framework of penalties vis-à-vis educational stan dards and infrastructure at medical colleges. The move is noteworthy as the MSMER provided for fines of up to 25 lakh on faculty members and ad- ministrators for submitting false information.

Fortunately, the Medical Assessment and Rating Board (MARB) retains the power to fine errant in- stitutions up to *1 crore under the 2023 Establish- ment of Medical Institutions, Assessment and Rating Regulations. MSMER was lauded for its in- tention to crack down on the deep-seated cor ruption and malpractice in medical colleges, par- ticularly over ‘ghost faculty’ and ‘ghost patients”. The NMC’s justification is that MSMER also intro- duced a parallel mechanism allowing undergrad- uate and postgraduate boards to evaluate institu- tions, stepping on the MARB’s toes. However, why the NMC scrapped MSMER wholesale is un- clear. The 2023 Postgraduate Medical Education Regulations remain in force and include a provi- sion to fine individual faculty members at post- graduate medical colleges. Nor compliance among medical colleges is not uncommon and seldom nipped in the bud, even as the number of medical seats swells while the transparency of the medical education system has not improved.

Notwithstanding the provision to fine indivi- duals at postgraduate centres, the MARB and the NMC can only penalise institutions, which is har- der and risks creating a perverse incentive to ac- commodate rather than punish, and could miti gate the fear that keeps administrators honest. MSMER also specified timelines to appeal penal ties. Although the MARB regulations retain the appeal processes, their 15-day deadline could conflict with the 60-day period under the NMC Act, potentially creating legal disputes that delay penal action. There is also a telling incident. As part of a proceeding under the RTI Act, the Cen tral Information Commission revealed last year that the NMC had stated in 2024 that MARB had neither formally assessed nor rated medical col leges and that its standard forms need not be made public. In a revised reply in October 2025, it said the responding NMC officer’s records did not include any of the corresponding reports. However, the 2023 MARB regulations require the Board to publish its latest annual assessment re sults. If the NMC withdrew MSMER because the powers thereunder also exist elsewhere, the pu blic deserves to know whether the powers are al- so being exercised and whether the outcomes are as publicly accessible as intended. Unless the NMC has satisfactory answers for all these lacu- nae, the withdrawal will appear less like simplifi- cation and more like regulatory relaxation.


Date: 27-10-26

चीन से कारोबार में आ रही अड़चनें दूर करनी जरूरी हैं

संपादकीय

बैंकाक में आईएमएफ वर्ल्ड बैंक की सालाना बैठक में वित्त मंत्री ने भारतीय वस्तुओं की खरीद पर चीन के गैर-टैरिफ बैरियर्स के कारण द्विपक्षीय व्यापार में बढ़ते असंतुलन पर चिंता तो जताई, लेकिन बातचीत से रास्ता निकालने पर जोर दिया। हालांकि ऐसी बातचीत पिछले दस साल से चल रही है और चीन का रवैया भारतीय उत्पादों को लेकर लगातार नकारात्मक रहा है। दरअसल चीन फाइटो-सैनेटरी कंप्लायंस के नाम पर भारत ही नहीं, अमेरिका, ईयू और ऑस्ट्रेलिया के माल भी खारिज करता रहा है। इसके तहत अनाज, खासकर चावल या अन्य मानव उपभोग की वस्तुओं के खेत में उपजाए जाने के तरीके से उत्पाद की खपत तक बहुस्तरीय जांच की जाती है। लेकिन चीन इसके मानदंड अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलता रहता है। एक ताजा घटना में ऑस्ट्रेलिया के एक उत्पाद को पहले निरस्त किया और जब सरकार बदली तो नए मानदंड बनाकर स्वीकार कर लिया। हमारी मजबूरी यह है कि हमें अपनी प्रमुख निर्यातपरक वस्तुओं में प्रयुक्त एपीआई और माइक्रोचिप्स के लिए भी चीन पर आश्रित रहना पड़ता है। हालांकि हाल ही में भारत ने चीन के करीब 155 उत्पादों पर एंटी डंपिंग टैरिफ लगाया है। भारत का आरोप है कि ये उत्पाद चीनी सरकार की अघोषित सब्सिडी से पोषित होकर भारत के बाजार में दाम गिराकर बेचे जा रहे थे।


Date: 27-10-26

नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर शालीनता का परिचय देना होगा

आरती जेरथ, ( राजनीतिक टिप्पणीकार )

उत्तराखंड के मंत्री सुबोध उनियाल हाल ही में उस समय चर्चाओं में आए, जब उन्होंने नई टिहरी में सरकार द्वारा प्रायोजित एक पर्यटन मेले में प्रस्तुति दे रहे मशहूर पंजाबी गायक दलेर मेहंदी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। कार्यक्रम के बीच में ही उनियाल मंच पर चढ़ गए और मेहंदी पर आरोप लगाया कि वे नशे में हैं, ठीक से खड़े नहीं हो पा रहे हैं या बोल नहीं पा रहे हैं और लाइव गाने के बजाय रिकॉर्ड किए हुए गाने पर केवल होंठ हिला रहे हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मेहंदी इस कार्यक्रम के लिए उन्हें दी गई 35 लाख रुपये की राशि का सम्मान नहीं कर रहे हैं।

घटना का वीडियो वायरल होने के बाद बॉलीवुड की कई प्रमुख हस्तियों ने इस व्यवहार की आलोचना की। इनमें अनुपम खेर के साथ दलेर मेहंदी के भाई व गायक मीका सिंह भी शामिल हैं। उन्होंने कहा एक प्रतिष्ठित व लोकप्रिय कलाकार के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार अनुचित है, वह भी उन दर्शकों के सामने जो उनका गायन सुनने के लिए वहां इकट्ठा हुए थे।

हर कहानी के दो पहलू होते हैं। हो सकता है कि उस रात दलेर मेहंदी का गायन अपेक्षित स्तर का न रहा हो। यह भी सच है कि अगर उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो उन्हें इस कार्यक्रम का निमंत्रण स्वीकार नहीं करना चाहिए था। लेकिन लोगों को दलेर मेहंदी के सार्वजनिक अपमान ने ज्यादा हैरान किया है।

उन पर न केवल नशे में होने के अपुष्ट आरोप लगाए गए, बल्कि कार्यक्रम के लिए उन्हें दी गई पारिश्रमिक राशि का सार्वजनिक रूप से उल्लेख करने में भी शालीनता नहीं थी। अगर दलेर मेहंदी की प्रस्तुति स्तरीय नहीं थी और दर्शक इसको लेकर खुश नहीं थे, तो इस स्थिति को कहीं बेहतर ढंग से संभाला जा सकता था। मसलन, कार्यक्रम के मध्यांतर में मेहंदी को मंच के पीछे ले जाकर विनम्रता से उनसे पूछा जा सकता था कि क्या वे ठीक हैं?

संभवतः यह पहली बार है, जब किसी नेता ने किसी प्रतिष्ठित कलाकार के साथ ऐसा व्यवहार किया हो। आमतौर पर ऐसे व्यवहार का निशाना नौकरशाह बनते हैं, खासकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी, जिनका अपने निर्वाचन क्षेत्रों की विकास परियोजनाओं को लेकर राजनेताओं से टकराव होता रहता है। अधिकारियों को लेकर मिल रही शिकायतों के कुछ वाजिब कारण भी हो सकते हैं। लेकिन नेताओं के अभद्र आचरण की खबरें चिंताजनक रूप से लगातार सामने आ रही हैं।

कभी-कभी ऐसे टकराव केवल तीखी बहस और ऊंची आवाज में कहासुनी तक सीमित रहते हैं। लेकिन अब तो अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल, निलंबन और अन्य दंडात्मक कार्रवाइयों की धमकियां भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं। उदाहरण के लिए कांग्रेस के पूर्व विधायक नीतेश राणे और उनके समर्थकों ने एक बार महाराष्ट्र में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के एक डिप्टी इंजीनियर को पुल की रेलिंग से बांध दिया था और उन पर कीचड़ उड़ेला गया था।

इसकी वजह मुंबई-गोवा राजमार्ग का खराब रखरखाव और सड़क पर मौजूद गड्ढे थे। भाजपा सांसद कंगना रनौत भी मंडी में स्थानीय अधिकारियों को अपमानित करती रही हैं। हाल ही में ऐसे ही एक विवाद के दौरान उन्होंने अधिकारियों को ‘आलसी’ और ‘नाकाबिल’ कहा था।

मध्य प्रदेश में भाजपा विधायक प्रीतम लोधी ने शिवपुरी में एक बैठक के दौरान अधिकारियों को धमकाया था कि सहयोग नहीं करने वाले अधिकारियों के घरों के पानी और बिजली के कनेक्शन काट दिए जाएंगे। कहीं किसी स्थानीय अधिकारी को क्रिकेट के बल्ले से पीटा गया, तो कहीं महिला अधिकारियों और यहां तक कि एक महिला पुलिस कांस्टेबल को भी थप्पड़ मारे गए। कलेक्टर जैसे अधिकारियों के साथ भी तीखी नोकझोंक की कई घटनाएं सामने आई हैं।

यह प्रवृत्ति ऐसे समय में विशेष रूप से दिखाई दे रही है, जब राजनीति में प्रतिस्पर्धा बेहद आक्रामक होती जा रही है। पहले राजनीतिक दल उम्मीदवारों के जनसेवा के रिकॉर्ड को महत्व देते थे, लेकिन अब वे उम्मीदवार चुनते समय उनकी जीतने की क्षमता को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं। नतीजतन, जिस उम्मीदवार के पास धनबल और बाहुबल होता है, उसके लिए चुनाव लड़ने का टिकट हासिल करना आसान हो जाता है।

लेकिन लेगेसी आईएएस रिपोर्ट के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि मौजूदा सांसदों और विधायकों में से लगभग 30 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह जानकारी चुनाव के समय उम्मीदवारों द्वारा दिए गए स्वयं उनके शपथ-पत्रों पर आधारित है। ऐसे में क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि हमारे अनेक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में आजकल शालीनता का अभाव दिखाई देता है?

अब उम्मीदवार चुनते समय उनकी जीतने की क्षमता को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। धनबल और बाहुबल वालों के लिए टिकट हासिल करना आसान हो जाता है। यही कारण है कि मौजूदा सांसदों और विधायकों में से लगभग 30 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।


Date: 27-10-26

मेहनत का उचित मूल्य

संपादकीय

किसानों के लिए धान की सरकारी खरीद केवल उपज बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत का उचित मूल्य पाने की उम्मीद भी है। बीज, खाद और मजदूरी के लिए कर्ज लेने वाले किसानों को समय पर भुगतान की जरूरत होती है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया में देरी या गड़बड़ी उनकी आर्थिक मुश्किलें बढ़ा सकती है। झारखंड सरकार ने किसानों के पंजीकरण से लेकर भुगतान तक व्यवस्था दुरुस्त करने की पहल की है। जमीन के दस्तावेजों के आधार पर धान बिक्री की सीमा तय करने से दूसरे राज्यों के किसानों और बिचौलियों की घुसपैठ रोकने में मदद मिल सकती है, लेकिन नियम ऐसे भी हों कि वास्तविक किसानों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े। जिन किसानों के पास जमीन नहीं है, उनकी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजना भी जरूरी है। राज्य में 29 लाख से अधिक किसानों के बावजूद धान बेचने के लिए दो लाख से कम पंजीकरण होना चिंता का विषय है। सरकार को गांव स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर पंजीकरण बढ़ाना चाहिए। खरीद केंद्रों पर पारदर्शिता, नियमित निगरानी और समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करना होगा। व्यवस्था की सफलता आंकड़ों से नहीं, किसानों को मिलने वाले वास्तविक लाभ से तय होगी। जब समय पर धान की खरीद होगी और किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम मिलेंगे तभी उनकी मेहनत सफल होगी। किसानों की आय बढ़ाना अभी एक बड़ी चुनौती है। लिहाजा झारखंड की सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।


 

Date: 27-10-26

औषधि मूल्य निर्धारण की समस्या

संपादकीय

सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष माना है कि अस्पताल नियमित रूप से दवाओं और अन्य उत्पादों के लिए अतिरिक्त कीमत वसूल करते हैं। इससे दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण की व्यवस्था को बेहतर बनाने की थोड़ी उम्मीद जरूर जगी है। हालांकि एक व्यापक प्रभावी व्यवस्था बनाना आसान नहीं होगा।

कनाडा या यूरोपीय संघ जैसे पश्चिमी देशों में दवाओं के मूल्य-निर्धारण में मुनाफा मार्जिन और विनिर्माताओं की लागत को लेकर जो सीमाएं लगाई जाती हैं उनके पीछे वहां लगभग सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था है। इन देशों में बड़े पैमाने पर दवाओं की सरकारी खरीद की जाती है जो एक तरह से एकाधिकार वाली खरीद व्यवस्था भी है।

दूसरी तरफ, भारत की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में दवाओं की कीमतों पर तय सीमा का पालन सुनिश्चित करना मुश्किल है। यह काफी हद तक अस्पतालों, क्लीनिकों और दवा विक्रेताओं के संयम और स्वेच्छा पर निर्भर करता है। सरकार को इसमें हस्तक्षेप के उपायों पर विचार करना चाहिए।

यह मामला एक जनहित याचिका के बाद सामने आया है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय से जेनेरिक दवाओं, अन्य औषधियों और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग की गई है। सरकार के हलफनामे में कहा गया है कि अस्पताल कई दवाओं पर 170 से 700 फीसदी तक, जबकि चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य वस्तुओं पर 100 से 1,000 फीसदी तक अतिरिक्त मूल्य वसूलते हैं।

अदालत खुद जीवनरक्षक दवाओं विशेषकर कैंसर की दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य में की जाने वाली भारी बढ़ोतरी को ‘डकैती’ कह चुकी है। सरकार ने माना है कि मरीज और अस्पताल के बीच जानकारी की असमानता ही ऐसी अनुचित कीमत वसूली का प्रमुख कारण है। इस समस्या का एक हिस्सा सरकार की दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था में भी निहित है। दवाओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है।

पहली श्रेणी में ‘अनुसूचित’ दवाएं आती हैं। ये आवश्यक दवाएं हैं जिनका मूल्य सरकार तय करती है। इनमें इंसुलिन, कुछ एंटीबायोटिक्स, अवसादरोधी दवाएं और टीबी की दवाएं शामिल हैं।

दूसरी श्रेणी ‘गैर-अनुसूचित’ दवाओं की है जिनकी कीमतें तय करने की छूट विनिर्माताओं को होती है। 80 फीसदी से अधिक दवाएं गैर-अनुसूचित श्रेणी में आती हैं और इनमें कैंसर की दवाएं भी शामिल हैं। 9 नवंबर, 2026 से प्रभावी व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर की 137 दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 फीसदी तक सीमित कर दिया है।

इस हस्तक्षेप से जीवनरक्षक कैंसर दवाओं के मूल्य में 70 फीसदी तक की कमी आने की उम्मीद है। संसद की एक स्थायी समिति ने निजी अस्पतालों के शुल्क को मानकीकृत करने, कमरों का किराया तीन सितारा होटलों की दरों तक सीमित करने और चिकित्सा प्रक्रियाओं की लागत का अनिवार्य खुलासा सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।

प्रश्न यह है कि ऐसे सरकारी निर्देशों को कितने प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। कीमतों पर नियंत्रण के उलटे परिणाम सामने आने का भी खतरा रहता है। कीमतों पर नियंत्रण के कारण जब कई दवाओं का उत्पादन घरेलू निर्माताओं के लिए लाभकारी नहीं रह गया तो बड़ी संख्या में थोक दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख रासायनिक घटकों की आपूर्ति चीन से की जाने लगी।

भारत दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सक्रिय औषधीय घटकों (एपीआई) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा चीन से आयात करता है। कोविड लॉकडाउन के दौरान इस निर्भरता का असर गंभीर रूप से महसूस किया गया। सरकार को दवा उत्पादकों और खुदरा विक्रेताओं की मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाने तथा मरीजों के हितों की रक्षा करने के बीच संतुलन बनाना होगा।

मरीजों के अधिकारों और दवाओं की मूल्य निर्धारण नीतियों के बारे में व्यापक स्तर पर बहुभाषी जागरूकता अभियान चलाने से जानकारी की असमानता को दूर करने में काफी मदद मिल सकती है।

यह तथ्य भी एक बुनियादी नीतिगत असंगति की ओर संकेत करता है कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजाय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन आता है। यह तब है जब स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उनके संचालन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की है। इस नीतिगत विसंगति को भी दूर किए जाने की जरूरत है।


Date: 27-10-26

पूंजी का पलायन

संपादकीय

भारत की गिनती भले ही दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में की जाती है, लेकिन विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से मुंह मोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है। यह स्थिति देश की अर्थव्यवस्था के लिए कई स्तरों पर चिंता पैदा करती है। खबरों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने अक्टूबर में अब तक 48 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि शेयर बाजार से निकाली है, जो सितंबर की करीब 35 हजार करोड़ रुपए की निकासी से कहीं अधिक है। इस वर्ष की कुल निकासी 3.08 लाख करोड़ रुपए के पार जा चुकी है, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 1.66 लाख करोड़ रुपए था। विदेशी निवेशकों के इस रुख को पश्चिम एशिया में तनाव से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, बढ़ती महंगाई और कंपनियों की कमाई को लेकर उपजी आशंकाओं से जोड़ा जा रहा है। मगर केवल बाहरी कारणों का हवाला देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। हालांकि, विदेशी निवेश को प्रोत्साहन के लिए घोषणाएं और सुधार होते रहे हैं। मगर सवाल है कि क्या ये इतने ठोस और प्रभावी हैं कि अनिश्चित दौर में भी निवेशकों को बाजार में टिकाए रख सकें?

ऐसे समय में जब दुनिया के दूसरे उभरते बाजार निवेशकों को रिझाने में जुटे हों, तब सिर्फ संभावनाओं पर जोर देना ही पर्याप्त नहीं होगा। स्थिर नीतियां, पारदर्शी नियम और त्वरित मंजूरी की व्यवस्था टिकाऊ विश्वास का निर्माण करती हैं। भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह का घटता स्तर भी इसी ओर इशारा करता है। विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है, हालांकि राहत की बात यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों और व्यवस्थित निवेश योजनाओं के जरिए आने वाले निवेश ने बाजार को संभाले रखा है। ऐसे में सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से मोह भंग क्यों हो रहा है और उनका भरोसा कायम करने के लिए किस तरह के कदम उठाए जा सकते हैं। डालर के मुकाबले रुपए की मजबूती पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही देश की आर्थिक स्थिरता, निगमित ढांचे की मजबूती और विकास की संभावनाओं को वैश्विक मंचों पर प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की जरूरत है।


Date: 27-10-26

पर्यटन के विकास का पैमाना

श्रवण कुमार

भारत में पर्यटन की चर्चा होते ही हिमालय, समुद्र, रेगिस्तान, मंदिरों, स्मारकों और वन्यजीवों का जिक्र होने लगता है। मगर पर्यटन की संभावनाएं केवल प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा तक सीमित नहीं हैं। यह क्षेत्र रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास से भी जुड़ा है।

इसके बावजूद पर्यटन की सफलता को अक्सर पर्यटकों की संख्या, नए निर्माण और राजस्व अर्जन के पैमाने पर आंका जाता है। जबकि असली सवाल यह होना चाहिए कि पर्यटन से स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिल रहा है और जिन प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के सहारे यह उद्योग फल-फूल रहा है, वे कितनी सुरक्षित हैं।

विश्व आर्थिक मंच के यात्रा एवं पर्यटन विकास सूचकांक-2026 में भारत को 110 अर्थव्यवस्थाओं में 31वां स्थान मिला है। वर्ष 2024 के सूचकांक में भारत 40वें स्थान पर था। इस तरह नौ स्थानों का सुधार दर्ज हुआ है। मगर इस उपलब्धि को पर्यटन क्षेत्र की समग्र सफलता का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। यह सूचकांक पर्यटकों की संख्या या पर्यटन से होने वाली आय के बजाय उन परिस्थितियों का आकलन करता है, जो पर्यटन के विकास को संभव बनाती हैं।

इनमें सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मानव संसाधन, परिवहन, डिजिटल सुविधाएं, कारोबारी वातावरण और पर्यावरणीय स्थायित्व जैसे पहलू शामिल हैं। लिहाजा, बेहतर रैंकिंग के बावजूद यह देखना जरूरी है कि पर्यटन से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का समाधान किस हद तक हुआ है।

भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता उसे पर्यटन के लिहाज से विशिष्ट बनाती है। हिमालय से समुद्र तटों तक, रेगिस्तान से वर्षावनों तक और ऐतिहासिक किलों से प्राचीन धार्मिक स्थलों तक यहां आकर्षणों की लंबी शृंखला है। काशी, केरल, राजस्थान और पूर्वोत्तर के पर्यटन स्थलों की अपनी अलग पहचान है।

बौद्ध परंपरा से जुड़े केंद्रों से लेकर लोक कला और जनजातीय संस्कृति तक, यहां पर्यटकों के लिए अनुभवों की विविधता है। मगर, केवल आकर्षणों की प्रचुरता से पर्यटन का विस्तार नहीं हो सकता। किसी स्थान की लोकप्रियता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वहां पहुंचना कितना आसान है और पर्यटकों को कैसी सुविधाएं मिलती हैं।

भारत में घरेलू पर्यटन का विस्तार इस क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं को स्पष्ट करता है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में घरेलू पर्यटक यात्राओं की संख्या 428.55 करोड़ दर्ज की गई, जबकि विदेशी पर्यटक यात्राएं 2.53 करोड़ रहीं। इसी अवधि में पर्यटन से विदेशी मुद्रा आय 2,76,831 करोड़ रुपए रही। वर्ष 2023-24 में पर्यटन का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 5.22 फीसद था और इस क्षेत्र ने लगभग 8.46 करोड़ रोजगारों को सहारा दिया।

इन आंकड़ों से पर्यटन की आर्थिक महत्ता का पता चलता है, लेकिन यह भी समझना होगा कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचना अभी बड़ी चुनौती है। पर्यटन से रोजगार के अवसर केवल बड़े होटलों और परिवहन कंपनियों तक सीमित नहीं हैं।

स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, छोटे आवास, सांस्कृतिक आयोजन और ग्रामीण उद्यम भी इससे जुड़ सकते हैं। मगर इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय समुदायों को पर्यटन की गतिविधियों में वास्तविक भागीदारी मिले। इसलिए पर्यटन का मूल्यांकन केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले स्थानीय रोजगार और आय के आधार पर भी होना चाहिए। पर्यटन के विकास में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

अनेक ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थल ऐसे हैं, जहां पहुंचने के लिए पर्याप्त परिवहन सुविधाएं नहीं हैं। कहीं स्वच्छ शौचालयों का अभाव है, तो कहीं पेयजल, संकेतक, चिकित्सा सहायता और ठहरने की समुचित व्यवस्था नहीं है। यात्रा के दौरान परिवहन, आवास, खानपान, सुरक्षा और स्थानीय लोगों का व्यवहार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है।

इसलिए नए पर्यटन स्थलों के विकास के साथ पहले से मौजूद स्थलों की सुविधाओं और प्रबंधन में सुधार करना भी जरूरी है। पर्यटन के विस्तार में एक और गंभीर समस्या अत्यधिक भीड़ और अनियंत्रित निर्माण की है। पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती इमारतें, तटीय इलाकों में अव्यवस्थित गतिविधियां और ऐतिहासिक नगरों में वाहनों का दबाव न केवल स्थानीय जीवन को प्रभावित करते हैं, बल्कि पर्यटन की मूल संपदा के लिए भी खतरा पैदा करते हैं।

किसी स्थान की प्राकृतिक और सांस्कृतिक वहन क्षमता की अनदेखी कर पर्यटकों की संख्या बढ़ाने का प्रयास अंतत: नुकसानदेह हो सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाएं यह स्पष्ट करती हैं कि संवेदनशील इलाकों में निर्माण और पर्यटन गतिविधियों के नियोजन में विशेष सावधानी जरूरी है।

इसके लिए प्रत्येक संवेदनशील पर्यटन स्थल की परिस्थितियों के अनुरूप पर्यटकों की संख्या, निर्माण और संसाधनों के इस्तेमाल का नियमन आवश्यक है। सांस्कृतिक पर्यटन के मामले में भी विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, बौद्ध विहार, ऐतिहासिक किले और पारंपरिक बस्तियां केवल पर्यटन के केंद्र नहीं हैं।

वे समाज की स्मृतियों और जीवन-पद्धतियों का हिस्सा हैं। उन्हें महज व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र में बदल देने से उनकी मौलिक पहचान प्रभावित हो सकती है। धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ के प्रबंधन के साथ उनकी गरिमा और ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखना जरूरी है।

पर्यटन के बदलते स्वरूप में डिजिटल तकनीक की भूमिका भी बढ़ रही है। यात्रा से पहले पर्यटक अब इंटरनेट के माध्यम से गंतव्य, परिवहन, आवास और खानपान से जुड़ी जानकारी जुटाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए अलग-अलग भाषाओं में यात्रा संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने और पर्यटकों की रुचि के अनुसार यात्रा कार्यक्रम तैयार करने की संभावनाएं बढ़ी हैं। मगर तकनीक का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब छोटे पर्यटन कारोबारियों और दूरदराज के स्थलों को भी डिजिटल सुविधाओं से जोड़ा जाए।

पर्यटन उद्योग की गुणवत्ता काफी हद तक उसमें काम करने वाले लोगों के कौशल पर निर्भर करती है। प्रशिक्षित गाइड, कुशल होटल कर्मचारी, परिवहनकर्मी और स्थानीय उद्यमी पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बना सकते हैं। इसके लिए प्रशिक्षण में भाषायी दक्षता, आतिथ्य, प्राथमिक चिकित्सा, डिजिटल भुगतान और आपदा प्रबंधन जैसे व्यावहारिक कौशल शामिल किए जाने चाहिए।

भारत में पर्यटन की संभावनाएं व्यापक हैं, मगर उनका लाभ उठाने के लिए विकास की प्राथमिकताओं पर विचार करना होगा। नए होटल, सड़कें और पर्यटन केंद्र बनाना काफी नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि मौजूदा सुविधाओं का रखरखाव कैसा है, पर्यावरण पर कितना दबाव पड़ रहा है और पर्यटन से होने वाली आय का कितना हिस्सा स्थानीय लोगों तक पहुंच रहा है। पर्यटन को केवल आय और रोजगार का साधन मानने के बजाय उसे पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक अस्मिता और स्थानीय आत्मनिर्भरता से जोड़ना होगा। वास्तविक पर्यटन क्षमता तभी सामने आएगी, जब पर्यटकों के लिए बेहतर अनुभव और स्थानीय समुदायों के लिए अवसर एक-दूसरे के पूरक बनेंगे।