08-10-2026 (Important News Clippings)

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08 Oct 2026
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Date: 08-10-26

RBI’s Signal

Small rate hike is a smart call, it doesn’t crush sentiments, but sends a message

TOI Editorials

Wednesday’s rate hike was necessary, and widely expected. Inflation has been inching up since the start of Iran war, and has averaged above RBI’s target of 4% for the past three months. In fact, RBI sees it touching the upper tolerance limit of 6% in the festive quarter that’s just started, before dipping slightly to 5.7% in Jan-March. War isn’t the only reason for high prices. While it’s made fuel costlier, a weak monsoon is likely to affect crop yields and food prices in the months ahead. That’s why a gentle tap on the brakes was necessary.

A 25bps hike, taking the repo rate to 5.5%, is just that – a gentle tap. Yes, it will increase EMIs slightly. Home loans, especially, could cost a few hundred to a few thousand rupees more every month. But nobody expects demand to wilt under a 25bps increase. The momentum built up before the festive season should continue. Which raises the question, what does this hike achieve? Three things mainly. One, it tests demand response. Two, it’s a warning shot. Three, it protects rupee by narrowing the interest rate differential with foreign markets, and dissuading foreign investors from pulling out.

If demand, and inflation, remain high, RBI can implement another hike in a few months. Many analysts expect one in Dec, and some see one more by Feb. But if inflation moderates, RBI can wait and watch. That’s why it has described this intervention as “calibrated tightening”. In RBI guv’s words, it’s “more data-dependent than pre-determined”. And we, consumers, should understand what it means: RBI has made its intent clear – it’s going to curb inflation as long as growth isn’t hampered. If that takes more than one rate hike, so be it. Rate cuts are off the table, for now.

Coming as it did at the beginning of the festive season, the small rate hike is designed to not sharply dampen consumer sentiments. But it’s also a message that things have changed. Last year, RBI’s four rate cuts, together with income tax slab revision and GST cuts, had revved up the economy. Now, global conditions demand an easing off. RBI has already turned cautious. Consumers should look at what happens in Dec.


Date: 08-10-26

लगातार घटती लोकप्रियता का असर दिख रहा है ट्रम्प पर

संपादकीय

ट्रम्प के ताजा बयान ने दुनिया को एक बार फिर चौंका दिया है। एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ईरान भले ही हमला करके कैलिफोर्निया या उसके शहरों- लॉस एंजेलेस और सैन दिआगो को हड़प ले, लेकिन दुनिया और अमेरिका को सुरक्षित रखने के लिए यह सस्ता सौदा होगा। इस पर कैलिफोर्निया के गवर्नर ने ट्रम्प की मानसिक स्थिति को लेकर सवाल उठाया है। कैलिफोर्निया की अधिकांश जनता ट्रम्प को वोट नहीं करती। प्रश्न यह है कि क्या ईरान हजारों किमी दूर यूएस पर हमला कर इस राज्य और उसके सैन दिआगो मिलिट्री बेस पर कब्जा कर सकता है? अमेरिका को फिर से ‘ग्रेट’ बनाने के नारे में क्या उसका सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से सबसे अहम राज्य ही नहीं आता? वास्तव में अमेरिका में ट्रम्प की लोकप्रियता बेहद घटी है और दो माह बाद मध्यावधि चुनाव हैं। महंगाई से जनता त्रस्त है। ईरान लगातार अमेरिका से लोहा ले रहा है। उधर विश्व राजनीति की मर्यादा को तोड़ते हुए ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को हड़पने की बात भी कही थी, लेकिन जब विश्व समुदाय इसके खिलाफ दिखा तो अब एक समझौता किया है। ट्रम्प के मनमाने रवैये से पूरा यूरोप जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका के साये में चल रहा था अचानक तनकर खड़ा हो गया, लिहाजा ट्रम्प को ग्रीनलैंड पर पैर वापस खींचने पड़े। ऐसे में ट्रम्प ईरान पर कुछ ऐसा कर सकते हैं, जो युद्ध के मानवीय मूल्यों के खिलाफ हो। पर क्या अमेरिकी जनता अमानवीय नरसंहार को जीत मानेगी?


Date: 08-10-26

संकट बने दवाओं के मनमाने मूल्य

प्रमोद भार्गव

हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर की दवाओं की एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) और सरकारी खरीद मूल्य के बीच बड़े अंतर को अजूबा करार दिया। यह अंतर 10 गुना से भी ज्यादा है। 2,700 रुपये की खुदरा बिक्री मूल्य वाली कैंसर की दवा पर एमआरपी 27,000 रुपये अंकित होने पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो इसे ‘दिन-दहाड़े’ डकैती कहा और फिर अगली सुनवाई में इस भारी अंतर को दो टूक शब्दों में ‘कत्लेआम’ यानी ‘सामूहिक-संहार’ तक कहने में संकोच नहीं किया। दवा कारोबारी, निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद करने वाले जिम्मेदारों के लिए इससे तीखी टिप्पणी और कोई हो नहीं सकती।

अदालत ने यह सवाल भी खड़ा किया कि इतना पैसा कहां जा रहा है और फायदा किसे हो रहा है? यह टिप्पणी सीधे-सीधे फार्मा कंपनियों, निजी अस्पतालों के मालिकों एवं चिकित्सक तथा सरकारी खरीद में लिप्त जिम्मेदारों का संवेदनहीन चेहरा सामने लाती है। यह विडंबना तब है, जब केंद्र सरकार एक दवा, एक मूल्य और एक गुणवत्ता नीति से जुड़ा कानून फरवरी 2025 में पूरे देश में लागू कर चुकी है। इस नियम के तहत दवा विक्रेताओं और ई-फार्मेसी को दवाओं की मूल्य-सूची को सार्वजनिक रूप से दिखाना अनिवार्य है, ताकि रोगियों को तय दामों पर ही उचित गुणवत्ता की मानक दवाएं मिल सकें, परंतु शीर्ष न्यायालय की इस तीखी प्रतिक्रिया से साफ है कि दवा विक्रेताओं और सरकारी दवा खरीद से जुड़े अधिकारियों ने इस कानून को बट्टे खाते में डाल दिया है।

अधिकांश कारपोरेट अस्पताल अब सेवा नहीं उद्योग बन गए हैं। ये अस्पताल के भीतर स्थित मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। यदि कोई रोगी बाहर से दवा लाने को कहता है तो उपचार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने की बात कहते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर अस्पताल आयुष्मान भारत और अन्य सरकारी लाभदायी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत भी उपचार करते हैं यानी दवा उत्पादकों और अस्पतालों की मनमानी कानून अस्तित्व में आने के बाद भी बनी हुई है। जब दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आती हैं तो एमआरपी की छद्म-आधारित मूल्य व्यवस्था क्यों बनी हुई है?

कुछ समय पहले कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट ने सरकार को आगाह किया था कि दवाएं आम आदमी की पहुंच से जानबूझकर बाहर की जा रही हैं। इस रिपोर्ट ने बताया था कि दवाओं की महंगाई का कारण दवा में लगने वाली सामग्री का महंगा होना नहीं है, बल्कि दवा कंपनियों के मुनाफे का लालच है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं और दवाओं की कीमत कई गुना तक अधिक रख देती हैं। यहां तक कि नामी-गिरामी दवा कंपनियां भी दो सौ से पांच सौ गुना ज्यादा कीमत अपने दवा उत्पादों की रख रही हैं। महंगी दवा सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार के बूते खपाई जाती हैं। इसके पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी देसी-विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इन कंपनियों ने सरकार द्वारा उपलब्ध उत्पाद शुल्क में छूट का लाभ तो लिया, लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की?

यह गोलमाल प्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों के साथ तो हो ही रहा है, अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के साथ राजस्व सेंध के रूप में भी हो रहा है। इसे लेकर कैग ने सरकार को दवा मूल्य नियंत्रण अधिनियम में संशोधन का सुझाव दिया था। ऐसे ही सुझावों को मानते हुए सरकार ने देशभर में फैले सीजीएचएस (केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना) के 1,200 अस्पतालों, 200 जांच केंद्रों, 500 वेलनेस सेंटर और 8,000 से अधिक जन-औषधि केंद्रों पर एक दवा, एक मूल्य लागू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। हालांकि इस योजना पर प्रभावी अमल की दृष्टि से सरकार को मजबूत और पारदर्शी नेटवर्क बनाना होगा, जिसके लिए प्रभावी डाटा भी जरूरी है। दवा वितरण में बोली के आधार पर भागीदारी करने वाले विक्रेताओं की तकनीकी योग्यता से कहीं ज्यादा ईमानदारी के मानदंडों की जरूरत है। दवा क्रय समिति को भी उन दवाओं को खरीदने की जरूरत है, जो उपचार में प्रभावी और कीमत में सस्ती हों, क्योंकि अंततः सरकार का उद्देश्य आम आदमी को सस्ती, असरकारी और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराना ही है।

चूंकि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए उन्हें भी यदि इस योजना में भागीदार बनाया जाए तो दवा वितरण के साथ ही लाभार्थी रोगियों का दायरा भी बढ़ जाएगा। चिकित्सा का व्यवसाय जीवन रक्षा का पेशा है। वह मनुष्यता की संवेदना की सुरक्षा का नैतिक व्यवसाय है। लाचार मरीज चिकित्सक के पास स्वास्थ्य लाभ लेने की उम्मीद से जाता है, न कि दवा उद्योग के लालच को बढ़ाने की दृष्टि से? किंतु पैसा कमाने की अनैतिक होड़ का ही परिणाम है कि रोगी अब चिकित्सक को धरती का भगवान मानने से हिचक रहा है। इस अविश्वास के चलते ही अस्पतालों में चिकित्सक और रोगियों के परिजनों के बीच निरंतर मारपीट और ज्यादा धन वसूलने के विवाद सामने आ रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शीर्ष न्यायालय की डकैती और सामूहिक संहार जैसी टिप्पणियों को बेवजह की प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता है।


Date: 08-10-26

विकसित भारत के मार्ग की चुनौतियों पर देना होगा ध्यान

शैलेश डोभाल

वैश्विक भू-आर्थिक और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी भारत के लिए कई बातें गर्व करने लायक हैं। करीब एक लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले ताइवान को छोड़ दिया जाए जिसकी वर्ष 2026 में आर्थिक वृद्धि दो अंक में रहने की उम्मीद है, तब भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाला नजर आता है। एशियाई विकास बैंक और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) जैसे वैश्विक संस्थान और एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स तथा फिच रेटिंग्स जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने हाल में भारत के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की वृद्धि दर के अनुमान बढ़ाए हैं। इनके पीछे मजबूत घरे​लू मांग, बेहतर निर्यात प्रदर्शन और निवेश में तेजी जैसे कारण बताए गए हैं।

लेकिन इन अच्छी खबरों के बीच अधिकारियों, कारोबार जगत से जुड़े वैश्विक दिग्गजों और शोध संस्थानों की हाल की बातों को ध्यान से सुनें तो भारत की तेज आर्थिक वृद्धि की तस्वीर उतनी आसान नहीं दिखती। इसके साथ कई शर्तें, चेतावनियां और व्यावहारिक चुनौतियां जुड़ी हुई हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मौजूदा शानदार आंकड़ों, भारत की संभावनाओं और उपलब्धियों की सामान्य तारीफ को एक तरफ रख दें तब इन बातों का सार यही निकलता है कि भारत को उन पुरानी और जानी-पहचानी आर्थिक कमियों से सावधान रहना होगा, जो उसकी तेज आर्थिक वृद्धि की यात्रा में बार-बार बाधा बनती रही हैं।

हाल ही में मुंबई में हुए 13वें एसबीआई बैंकिंग ऐंड इकनॉमिक कॉन्क्लेव में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और देश के ताकतवर अफसरशाहों में से एक, पी. के. मिश्रा ने भारत की वैश्विक विनिर्माण प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और युवाओं को बेहतर कौशल देने की जरूरत पर जोर दिया। विदेशी निवेश को आकर्षित करने के मामले में उन्होंने बेहद स्पष्ट बात कही। उन्होंने कहा, ‘इसके लिए कर नीतियों में स्थिरता जरूरी है। राज्यों द्वारा किए जाने वाले अनुबंधों में भरोसा होना चाहिए, लॉजिस्टिक्स व्यवस्था विश्वसनीय होनी चाहिए और सरकारी मंजूरियां वास्तव में समय पर मिलनी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इन चुनौतियों से पूरी तरह अवगत है और उन पर काम कर रही है। उनकी इन टिप्पणियों से यह भी संकेत मिलता है कि विकसित देशों की श्रेणी में पहुंचने के लिए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

इसी सम्मेलन में भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने भी मिश्रा की तरह ही कई महत्त्वपूर्ण चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा का जिक्र किया जिसके जरिए करीब 144 अरब डॉलर जुटाए गए हैं। उन्होंने इसे आरबीआई और सरकार की दूरदर्शिता का उदाहरण बताया और कहा कि इससे निकट भविष्य में भारत को काफी राहत मिलेगी। हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है।

सीईए के मुताबिक भारत को वैश्विक पूंजी आकर्षित करने के लिए आक्रामक प्रतिस्पर्धा करनी होगी और इसके लिए केवल केंद्र सरकार की नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी बल्कि राज्यों की नीतियां भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि निश्चित कर व्यवस्था और उसमें सरलता, निवेशकों की सुरक्षा, अनुबंधों की विश्वसनीयता और निरंतरता तथा कुशल श्रमबल जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करना होगा।

युवा आबादी को जनसांख्यिकीय लाभ के रूप में देखने के मामले में नागेश्वरन ने इसके बेहतर तरीके से प्रबंधन करने की बात कही। उनके अनुसार इस लाभ को केवल आबादी के आधार पर हासिल नहीं किया जा सकता। इसे सही तरीके से संभालना और हासिल करना होगा और इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र, दोनों को अपने काम करने के पुराने तरीकों में बदलाव और नए प्रयोग के लिए तैयार रहना होगा।

यह देश के सरकारी तंत्र की ओर से वास्तविकता का एहसास कराने वाली बात है कि वृद्धि के आंकड़ों से उत्साहित होकर जश्न मनाने के बजाय भारत को अपनी बुनियादी आर्थिक कमजोरियों पर ध्यान देना होगा। संघर्षों से भरी मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच देश ऐसे भुगतान-संतुलन के दबाव से जूझ रहा है जो फिलहाल जल्दी खत्म होता नहीं दिखता।

दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से एक जेपी मॉर्गन चेज के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जेमी डिमन ने भी भारत के कारोबारी माहौल को लेकर कुछ स्पष्ट बातें कही हैं। उन्होंने इकनाॅमिक टाइम्स को दिए गए साक्षात्कार में कहा, ‘भारत में विदेशी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना अक्सर मुश्किल होता है क्योंकि उन्हें इसका मौका ही नहीं मिलता। कई बार स्थानीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा को रोकने के लिए नियमों का सहारा लेती हैं। सरकार को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। मेरे विचार से यह सभी भारतीयों के लिए नुकसानदेह है।’

हालांकि भारत की हाल की 7.8 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि (अप्रैल-जून 2026) की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि ज्यादातर निवेशकों का भारत को लेकर दीर्घकालिक नजरिया सकारात्मक है। उन्होंने कहा कि निवेशकों को असंगत तरीके से लागू होने वाले करों और नियमों को लेकर चिंता रहती हैं और साथ ही उन्होंने देश में निवेश के माहौल को मजबूत और बेहतर करने की बात भी कही। वैश्विक स्तर की कंपनियों की नब्ज की अच्छी समझ रखने वाले महत्त्वपूर्ण शख्स की ओर से आई यह टिप्पणी काफी स्पष्ट और कड़ी है।

वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन की हाल की एक चेतावनी से भरी रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है। रिपोर्ट का मानना है कि इन निवेशकों की बड़े पैमाने पर स्थायी वापसी आसान नहीं होगी। बर्नस्टीन ने इसके लिए भारत के कॉरपोरेट जगत की संरचना को भी एक कारण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की कई बड़ी कंपनियां पुराने आर्थिक ढांचे का प्रतिनिधित्व करती हैं जबकि छोटी कंपनियों में संस्थागत निवेश के लिहाज से पर्याप्त आकर्षण नहीं है।

इसके प्रबंध निदेशक वेणुगोपाल गैरे और सह लेखक विश्लेषक निखिल अरेला ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘कई बड़ी कंपनियां भविष्य में निवेश करने के बजाय अपने मौजूदा कारोबार को मजबूत करने में अधिक ऊर्जा लगा रही हैं।’ बर्नस्टीन के नोट के मुताबिक सबसे खराब बात यह है कि कुछ बड़ी कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचाव के लिए सरकारी नीतियों पर निर्भर रहती हैं।

भारत की एक बड़ी ताकत उसकी विशाल तकनीकी प्रतिभा है और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में भी भारत के पास दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल होने की क्षमता है। इस संदर्भ में सेल्सफोर्स के मुख्य डिजिटल प्रचारक, वाला अफशार का रुख कुछ अलग है। पिछले हफ्ते सैन फ्रांसिस्को में इकनॉमिक टाइम्स से बात करते हुए अफशार ने कहा कि भारत के पास प्रतिभा, युवा आबादी, डेटा और नवाचार जैसे लगभग सभी जरूरी संसाधन मौजूद हैं कि यह देश दुनिया के विशिष्ट एआई क्लब में शामिल हो सके। लेकिन इसमें भी एक चुनौती यह है कि भारत अपने प्रतिभाशाली इंजीनियरों और संस्थापकों को देश में रोक पाता है या नहीं।

उन्होंने भारतीय इंजीनियरों और स्टार्टअप संस्थापकों के लगातार विदेश जाने की ओर ध्यान दिलाया। उनका कहना है कि अब कई भारतीय सॉफ्टवेयर संस्थापक शुरुआत से ही सिलिकन वैली में अपना आधार बना रहे हैं और वहीं से अपनी टीम तैयार कर रहे हैं। वैश्विक तकनीकी कंपनियों के बीच प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की होड़ भी इस चुनौती को और बढ़ा रही है और उनकी कंपनी भी इसमें शामिल है। देश के हित की चिंता करने वाले ऐसे लोगों की बातें निश्चित रूप से गंभीरता से लेने लायक हैं। उम्मीद है कि इन मुद्दों पर जिम्मेदार आर्थिक और राजनीतिक पक्ष जल्द ही ठोस कदम उठाएंगे।