वर्क फ्रॉम होम के वैश्विक प्रयोग के पीछे की वास्ततिकताएं

Afeias
03 Sep 2025
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‘वर्क फ्रॉम होम’ या घर से काम करने के विकल्प को एक समय में श्रम का भविष्य माना जाता था। आज यह बहुतों को उपलब्ध भी है। हालांकि, वास्तव में बहुत कम लोग इसका आनंद उठा पा रहे हैं। इसकी जटिलताएं कल्पना से अधिक हो गई हैं।

इससे जुड़े सर्वेक्षण पर कुछ बिंदु –

  • आईएफओ और स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय ने ‘ग्लोबल सर्वे ऑफ वर्किंग अरेंजमेन्ट्स‘ सर्वेक्षण में 40 देशों के 16,000 से अधिक कॉलेज की पढ़ाई किए हुए कर्मियों को शामिल किया है।
  • सर्वेक्षण में पाया गया है कि पश्चिमी देशों की तुलना में एशिया के अधिकांश हिस्सों में प्रति सप्ताह वर्क फ्राम होम का समय कम है। इसके कारण क्या हैं –

1). भारत,चीन,जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य जगहों पर दफ्तर में उपस्थिति को अभी भी वफादारी, अनुशासन और गंभीरता का प्रतीक माना जाता है।

2). इसके साथ ही रहने की तंग जगह, साझा स्थान और इंटरनेट की अविश्सनीयता इसे और भी जटिल बनाते हैं।

भौगोलिक दृष्टि के अलावा, लैंगिक भिन्नता भी ‘वर्क फ्रॉम होम‘ की अलग मांग दिखाती है –

  • स्त्रियों के लिए काम और घर में देखभाल को वर्क फ्रॉम होम से आसानी से मैनेज किया जा सकता है।
  • माँ बन चुकी स्त्रियां घर से काम के लिए प्रति सप्ताह 2.66 दिनों को आदर्श संख्या बताती हैं। वहीं निःसंतान स्त्रियां 2.53 दिनों के लिए घर से काम करना चाहती हैं।
  • स्त्रियों की यह पसंद ऐच्छिक नहीं है, बल्कि समय की मांग है।
  • पुरुषों में यह पसंद स्वतंत्रता से जुडी हुई है। वे घर से काम करते हुए अपने स्वास्थ्य, शौक, रचनात्मकता को समय देना चाहते हैं।

नियोक्ताओं की बेचैनी –

  • वे टीम भावना में गिरावट, निगरानी में कमी और नवाचार में कमी को लेकर चिंतित हैं।
  • कुछ उद्योगों में घर से काम करने के लिए आवश्यक उपकरणों या प्रणालियों का अभाव है।
  • घर से काम करने वालों को अपेक्षाकृत मानसिक समस्याएं ज्यादा आ रही हैं। ज्यादातर घर एर्गोनॉमिक सुरक्षा या मानसिक एकाग्रता के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं।

संभावित विकल्प –

  • हाइब्रिड वर्क, घर और दफ्तर के समय का एक सावधानीपूर्वक डिजाइन किया गया मिश्रण, सबसे अच्छा सिद्ध हो सकता है।
  • विकासशील देशों को इसके लिए अपने ब्रॉडबैंड का विस्तार करना चाहिए।
  • घर से काम का वैश्विक प्रयोग सिर्फ तकनीक या सुविधा तक सीमित नहीं है। इसे बढ़ती लैंगिक समानता की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।

‘द हिंदूमें प्रकाशित पी.जॉन जे. कैनेडी के लेख पर आधारित। 23 जुलाई 2025