विकास की अधूरी राह और असुरक्षित जलमार्ग
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हाल ही में बिहार और उत्तर प्रदेश के गंगा नदी क्षेत्र में असुरक्षित नाव परिवहन तथा बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में बच्चों की डूबने से हुई मृत्यु, ग्रामीण परिवहन व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है।
प्रमुख घटनाएँ एवं तथ्य –
- 13 अक्टूबर: बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में नाव पलटने से कम-से-कम 13 बच्चों की मृत्यु हुई। नाव की स्थिति जर्जर थी, तथा उसकी क्षमता से अधिक लोगों के सवार होने की सूचना थी। सूर्यास्त के बाद नाव संचालन प्रतिबंधित होने के बावजूद रात में यात्रा की गई।
- राघोपुर में सार्वकालिक सड़क संपर्क का अभाव है। बाढ़ के दौरान क्षेत्र का संपर्क बाधित हो जाता है।
- कच्ची दरगाह-बिदुपुर पुल का पहला खंड जून 2025 में तैयार हुआ था। लेकिन मानसून के दौरान संपर्क मार्ग पर बाढ़ के कारण पहुँच बाधित रही।
- महाराष्ट्र के कुछ दूरदराज के गाँवों में भी बच्चों को विद्यालय पहुँचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
समस्या के मूल कारण –
- सड़क, पुल, संपर्क मार्ग और सार्वजनिक परिवहन की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण आबादी नावों पर निर्भर रहती है।
- नावों का पंजीकरण, क्षमता निर्धारण, सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता और बंगाल फेरी अधिनियम के तहत जारी 2011 के मॉडल रूल्स और 2021 के अंतर्देशीय पोत अधिनियम के अनुसार नियमित निरीक्षण प्रभावी रूप से सुनिश्चित नहीं हो पा रहे हैं।
- अप्रशिक्षित या कम उम्र के नाविकों द्वारा नाव संचालन से दुर्घटना का जोखिम बढ़ता है।
- भौगोलिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियाँ हैं। बाढ़, नदी के तल में गाद का जमाव और बदलते नदी मार्ग ग्रामीण संपर्क को कठिन बनाते हैं।
- प्रशासनिक निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय कमजोर होने से अक्सर दुर्घटना के बाद ही कार्रवाई होती है।
समाधान –
बाढ़-रोधी संपर्क मार्ग, सुरक्षित घाट, प्रशिक्षित नाविक, जीवनरक्षक जैकेट, मौसम एवं नदी की स्थिति पर आधारित चेतावनी प्रणाली और आपातकालीन बचाव सेवाओं को एकीकृत किया जाना चाहिए।
लेख का मूल तर्क है कि सुरक्षित परिवहन केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन, शिक्षा, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन से जुड़ा बुनियादी अधिकार-संबंधी प्रश्न है।
जब ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल और सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं होते, तब लोग मजबूरी में जोखिमपूर्ण साधनों का उपयोग करते हैं। इसलिए केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराने, और परिवहन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए।
सरकार को परिवहन सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानने के बजाय सार्वजनिक सेवा, बाल संरक्षण और समान अवसरों के व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा।
‘द हिंदू‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19/10/26