भारत में सार्वजनिक परिवहन, शहरी गतिशीलता एवं सतत् विकास
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हाल ही में भारत में पहला घरेलू यात्रा सर्वेक्षण किया गया है। इसका केंद्रीय तर्क है कि परिवहन नीति का उद्देश्य केवल सड़क, फ्लाईओवर और मेट्रो का निर्माण करना नहीं, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित, सस्ता, सुलभ और विश्वसनीय परिवहन उपलब्ध कराना होना चाहिए।
कुछ बिंदु –
- सर्वेक्षण के अनुसार, दोपहिया वाहन ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कामकाजी लोगों के आवागमन का प्रमुख साधन हैं। शहरी क्षेत्रों में 52% कामकाजी लोग दोपहिया वाहनों का उपयोग करते हैं, जबकि लगभग 6% कार या कैब से यात्रा करते हैं।
- शहरी विद्यार्थियों में 34% बस से और 30% पैदल स्कूल जाते हैं। 14% ऑटोरिक्शा लेते हैं।
- सर्वेक्षण में कोचिंग और ट्यूशन के परिवहन को शामिल नहीं किया गया है।
- महत्वपूर्ण यह भी है कि धारणीय विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराना भी एक लक्ष्य है।
- सार्वजनिक परिवहन सुविधा में कमी का बहुत बड़ा उदाहरण आईआईटी दिल्ली के एक शोध से उजागर होता है। भारत की सभी मेट्रो अपनी क्षमता का सिर्फ 25-35% ही वहन कर रही हैं।
अतः सार्वजनिक परिवहन की समस्या केवल वाहनों या मेट्रो की कमी नहीं है। परिवहन के विभिन्न साधनों के बीच समन्वय की कमी, अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी का अभाव और बार-बार वाहन बदलने की आवश्यकता लोगों को निजी वाहनों की ओर आकर्षित करती है।
परिवहन व्यवस्था का मूल्यांकन केवल निर्मित बुनियादी ढाँचे से नहीं, बल्कि नागरिकों को मिलने वाली वास्तविक सुविधा से किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07/10/26