निवारक निरोध पर न्यायिक प्रहार
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने निवारक हिरासत के गलत इस्तेमाल को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर दस लाख का जुर्माना लगाया है। यह निर्णय याद दिलाता है कि कठोर कानूनों का होना सरकार को मनमाने ढंग से उन्हें इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। जब सरकार इस व्यवस्था का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक कानून में मिलने वाली जमानत से बचने के लिए करने लगे, तो यह संविधान और कानून की भावना के विरुद्ध है।
- निवारक निरोध बनाम दंडात्मक कार्रवाई – दंडात्मक कार्रवाई में व्यक्ति को किए गए अपराध के लिए सजा देने की प्रक्रिया होती है, जबकि निवारक निरोध या निवारक नजरबंदी संभावित भविष्य के खतरे को रोकने के लिए होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इन दोनों अधिकार-क्षेत्रों के बीच के अंतर को धुंधला किया है।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निवारक हिरासत व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करती है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसलिए ऐसी असाधारण शक्तियों का प्रयोग बहुत सावधानी से होना चाहिए।
- कठोर कानूनों का उद्देश्य जमानत रोकना नहीं – राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, जन सुरक्षा अधिनियम और धन शोधन निवारण अधिनियम जैसे विशेष कानूनों में सामान्य आपराधिक कानून की तुलना में सरकार और जांच एजेंसियों को अधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। इन कानूनों में जमानत हासिल करना भी अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार किसी व्यक्ति को केवल इसलिए विशेष कानून के तहत हिरासत में रखे कि सामान्य कानून के तहत उसे जमानत मिल सकती है।
अगर सामान्य आपराधिक कानून किसी मामले से पर्याप्त रूप से निपट सकता है, तो असाधारण कानून का सहारा लेना न्यायसंगत नहीं होता है।
कानून की कठोरता का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, जमानत के अधिकार को अप्रत्यक्ष रूप से समाप्त करना नहीं।
- ‘कानून व्यवस्था’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ में अंतर – संवैधानिक रूप से कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा के बीच अंतर है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किसी व्यक्ति की गतिविधि वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा है या केवल सामान्य रूप से कानून व्यवस्था की समस्या पैदा करती है।
1966 के लोहिया बनाम बिहार राज्य मामले में न्यायाधीश हिदायतुल्लाह ने इन तीनों को तीन संकेंद्रित वृत्तों के रूप में समझाया था।
कानून व्यवस्था — सबसे व्यापक क्षेत्र
सार्वजनिक व्यवस्था— उससे संकीर्ण क्षेत्र
राज्य की सुरक्षा — सबसे संकीर्ण और गंभीर क्षेत्र
इसका अर्थ है कि कानून व्यवस्था की हर समस्या सार्वजनिक व्यवस्था की समस्या नहीं बन जाती। और कानून व्यवस्था की समस्या राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं होती।
- न्यायपालिका की भूमिका – ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट केवल किसी व्यक्ति की रिहाई का आदेश नहीं दे रहे हैं, बल्कि कार्यपालिका की संवैधानिक सीमा भी तय कर रहे हैं।
कठोर कानून अपने आप में समस्या नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब उनका इस्तेमाल उनकी वैधानिक सीमा से बाहर किया जाता है। राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजबूत कानूनों की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन कानून के शासन का अर्थ ही यही है कि सरकार भी कानून की सीमाओं के भीतर रहे। निवारक निरोध को सामान्य आपराधिक न्याय व्यवस्था का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01/10/26