शहरी विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की जरूरत
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भारत के तेजी से शहरीकरण के दौर में विकास का लक्ष्य केवल अधिक इमारतें और सड़कें बनाना नहीं होना चाहिए। वास्तविक शहरी विकास वह है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय स्थिरता, नागरिक भागीदारी और जीवन की गुणवत्ता भी सुनिश्चित हो। शहरों को केवल रहने योग्य नहीं, बल्कि सांस लेने योग्य भी बनाना होगा।
रोजमर्रा में विकास बनाम हरित क्षेत्र का झूठा द्वंद्व अक्सर देखने को मिलता है। शहरों को बुनियादी ढाँचे और सार्वजनिक सुविधाओं की जरूरत है, लेकिन इसके लिए हर बार पार्क, मैदान और खुले स्थानों की बलि देना उचित नहीं है।
कुछ बिंदु –
- खुले और हरित स्थानों का महत्व केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि ये हीट सिंक, भूजल पुनर्भरण, बेहतर वायु गुणवत्ता और शहरी जीवन की गुणवत्ता में योगदान देते हैं।
- मुंबई का उदाहरण – डिसूजा फुटबॉल मैदान को प्रदर्शनी एवं कन्वेंशन सेंटर में बदलने के प्रस्ताव का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। संपादकीय इसे नागरिकों की भागीदारी और खुले स्थानों की रक्षा के व्यापक सवाल से जोड़ता है।
- बेंगलुरु का उदाहरण – नागरिकों के विरोध के बाद सरकारी पार्कों की भूमि के एक हिस्से को सार्वजनिक उपयोगिताओं के लिए इस्तेमाल करने संबंधी प्रस्ताव का विरोध सफल रहा।
- मानक और वास्तविकता में अंतर – भारत के विकास दिशा निर्देश प्रति व्यक्ति 10–12 वर्ग मीटर खुले स्थान की सिफारिश करते हैं। लेकिन अधिकांश भारतीय शहर इस स्तर से काफी पीछे हैं।
- सरकारी भूमि का बेहतर इस्तेमाल – केंद्र और अन्य सरकारी संस्थाओं; जैसे रेलवे के पास बड़ी मात्रा में भूमि है। ऐसी भूमि का ऑडिट करके उसे शहरी सार्वजनिक सुविधाओं के लिए उपयोग किया जा सकता है।
- सहभागिता पूर्ण शहरी नियोजन किया जाना चाहिए। शहरों का विकास स्थानीय नागरिकों की जरूरतों और आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर होना चाहिए। इस प्रयास में जगह बनाने के साथ-साथ हरित शहरीकरण भी किया जाना चाहिए।
- अंतिम उद्देश्य – शहर केवल आर्थिक गतिविधियों के केंद्र न हों, बल्कि काम करने और रहने योग्य दोनों हों।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14/09/26