मूल्य-श्रृंखला उत्सर्जन का डेटा भारत के निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाएगा
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वैश्विक व्यापार में कार्बन-आधारित नियम भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करते हैं। अतः सरकार को सभी निर्यातकों के लिए उनकी पूरी मूल्य-श्रृंखला में होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का डेटा उपलब्ध कराना अनिवार्य बनाना चाहिए। इससे भारतीय निर्यातकों को वैश्विक जलवायु-आधारित व्यापार नियमों के अनुरूप ढलने, कार्बन लागत कम करने, तथा औद्योगिक उत्सर्जन घटाने में सहायता मिलेगी। हालाँकि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
उत्सर्जन की प्रमुख अवधारणाएँ –
स्कोप 1 – प्रत्यक्ष उत्सर्जन
किसी कंपनी के स्वामित्व या नियंत्रण वाले स्रोतों से सीधे होने वाला उत्सर्जन; जैसे कारखाने में ईंधन जलाने से निकलने वाला कार्बन डाइऑक्साइड।
स्कोप 2 – ऊर्जा से संबंधित अप्रत्यक्ष उत्सर्जन
खरीदी गई बिजली, भाप, हीटिंग या कूलिंग के उत्पादन के दौरान होने वाला उत्सर्जन।
स्कोप 3 – मूल्य-श्रृंखला का उत्सर्जन
कंपनी की मूल्य-श्रृंखला में होने वाला अन्य अप्रत्यक्ष उत्सर्जन; जैसे कच्चे माल का उत्पादन, परिवहन, आपूर्तिकर्ताओं की गतिविधियाँ और बेचे गए उत्पादों का उपयोग या निपटान।
प्रमुख मुद्दे –
(क) कार्बन-आधारित व्यापार बाधाएँ
यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) जैसी व्यवस्थाएँ आयातित वस्तुओं में निहित कार्बन उत्सर्जन को ध्यान में रखती हैं। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अपने उत्पादों के उत्सर्जन का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि भारतीय कंपनियाँ समय रहते उत्सर्जन का हिसाब रखना शुरू करती हैं, तो वे संभावित कार्बन लागत को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी, और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत कर सकेंगी।
(ख) एमएसएमई के समक्ष चुनौतियाँ
- उत्सर्जन मापने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है।
- कार्बन लेखांकन प्रणाली स्थापित करने की अतिरिक्त लागत वहन करने की समस्या है।
- आपूर्तिकर्ताओं से विश्वसनीय डेटा प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
- छोटे उद्यमों पर अनुपालन का असमान आर्थिक बोझ पड़ता है।
(ग) हरित औद्योगिक परिवर्तन का अवसर
उत्सर्जन डेटा केवल नियामकीय अनुपालन का साधन नहीं है। इससे कंपनियाँ ऊर्जा की बर्बादी, अधिक कार्बन वाले कच्चे माल, और परिवहन की अक्षमताओं की पहचान कर सकती हैं। परिणामस्वरूप उत्पादन लागत और पर्यावरणीय प्रभाव दोनों कम हो सकते हैं।
कुछ सावधानियाँ आवश्यक हैं –
- स्कोप 3 उत्सर्जन की गणना जटिल होती है, क्योंकि डेटा अनेक स्वतंत्र आपूर्तिकर्ताओं से प्राप्त करना पड़ता है।
- उत्सर्जन रिपोर्टिंग की लागत छोटे उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर सकती है।
- केवल डेटा एकत्र करना पर्याप्त नहीं है; उत्सर्जन कम करने के लिए वास्तविक तकनीकी निवेश भी जरूरी है।
कुल मिलाकर,
- पहले बड़ी कंपनियों और प्रमुख उत्सर्जन वाले क्षेत्रों से शुरुआत की जाए।
- लघु उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन, तकनीकी प्रशिक्षण और साझा उत्सर्जन-मापन प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जाएँ।
- उत्सर्जन की गणना, रिपोर्टिंग और स्वतंत्र सत्यापन के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश विकसित हों।
- आपूर्ति-श्रृंखला में डेटा संग्रह और साझा करने के लिए सरल डिजिटल उपकरण बनाए जाएँ।
- सरकार, उद्योग संघ, निर्यातक और आपूर्तिकर्ता मिलकर समयबद्ध रोडमैप तैयार करें।
- भारतीय उत्सर्जन डेटा को प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की आवश्यकताओं के अनुरूप विश्वसनीय और तुलनीय बनाया जाए।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22/10/26