राष्ट्रीय हरित अधिकरण की भूमिका विस्तृत हो

Afeias
11 Feb 2025
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  • वर्ष 2010 में एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) या राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम पारित किया गया था। इसे पर्यावरण से जुड़े सभी दीवानी मामलों की सुनवाई का अधिकार दिया गया था।
  • अधिनियम में इसे स्वतः संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं दिया गया। पारंपरिक न्यायालयों के विपरीत इसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 से मुक्त रखा गया है।
  • हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय में अधिकरण के विरूद्ध ऐसी शिकायतें आई हैं कि यह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दे रहा है। तमिलनाडु के एक ऐसे ही मामले में उच्चतम न्यायालय ने अधिकरण के एक आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अधिकरण के पास राज्य सरकार के आदेश के विरूद्ध आई अपील को सुनने का अधिकार नहीं है।
  • कुछ मामलों में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अधिकरण स्वतः संज्ञान ले सकता है। ऐसा करते हुए उसकी मंशा समाजोन्मुखी होनी चाहिए। साथ ही दो उद्देश्य होने चाहिए – स्थितियों में सुधार करना और नुकसान को रोकना।

स्पष्ट मानदंड और प्रक्रियाएं स्थापित करके एनजीटी ऐसा सुनिश्चित कर सकता है। इससे पर्यावरण न्याय को बढ़ावा मिलेगा, और टिकाऊ विकास भी हो सकेगा।

‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित विजय केलकर के लेख पर आधारित। 23 जनवरी, 2025