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लोकतंत्र की बहाली में न्यायपालिका की भूमिका

Afeias
26 Jul 2021
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लोकतंत्र की बहाली में न्यायपालिका की भूमिका

Date:26-07-21

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मुख्य न्यायाधीश ए एन रमन्ना ने अपने एक व्याख्यान में इस बात को रेखांकित किया है कि दुनिया में कहीं भी वास्तविक लोकतंत्र का क्या अर्थ होना चाहिए। इसका अर्थ केवल चुनाव और लोगों की सरकार बदलने की क्षमता से नहीं है। यह किसी कानून को जनभागीदारी प्रक्रिया से सुगम्य बनाने से भी परे है। इसका अर्थ केवल एक ऐसी स्वतंत्र न्यायपालिका से भी परे है, जो कार्यपालिका एवं अन्य अनुचित प्रभावों से स्वतंत्र हो। न ही इसका अर्थ एक कर्कश सोशल मीडिया तक सीमित है, जो अक्सर सही और गलत के बीच अंतर करने में असमर्थ होता है।

न्यायाधीश रमन्ना ने यह भी कहा कि ‘कुछ वर्षों में शासक को बदलने का अधिकार, अत्याचार के खिलाफ गारंटी नहीं दे सकता…।’ निर्वाचितों के चुनाव के बाद की लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है, जब न्यायपालिका सहित देश के अन्य संगठन अपना काम करें। उनका कहना है कि ‘जनता ने अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाया है, और अब उन लोगों की बारी है, जो देश के प्रमुख अंगों का संचालन कर रहे हैं।’

2018 में न्यायमूर्ति रहे रंजन गोगोई ने कहा था कि मजबूत लोकतंत्र को “न केवल स्वतंत्र न्यायाधीशों और शोर करने वाले पत्रकारों की, बल्कि कभी-कभी शोरगुल करने वाले न्यायाधीशों की भी आवश्यकता होती है।’’

दिखाई देता है कि समस्या न्यायाधीश रमन्ना के कथन के सार में नहीं, वरन् दो अलग-अलग क्षेत्रों में है। एक तो मीडिया और राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति है कि जो कहा जा रहा है, उसे ज्यादा पढ़ लिया जाए। दूसरे, कार्यपालिका की ज्यादतियों को रोकने में न्यायपालिका की भूमिका में है। जब दो न्यायाधीश पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लेते हैं, तो आश्चर्य होता है कि क्या यह उस मामले में कर्तव्य का परित्याग नहीं है, जहां जीवन और स्वतंत्रता सीधे दांव पर हैं।

आज के राजनीतिक और आर्थिक व्यवधान के युग में, डरा हुआ मतदाता स्थितियों के ठीक हो जाने का आश्वासन ढूंढ रहा है। इसके चलते नेता उनकी असुरक्षा का फायदा उठाकर, उन्हें आसान समाधान का वादा करके बरगलाते हैं, और अपने पक्ष में वोट ले लेते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प से लेकर हंगरी में विक्टर ओरबन, रूस में ब्लादिमीर पुतिन, ब्रिटेन में बोरिस जानसन और भारत में नरेंद्र मोदी तक, मतदाताओं ने या तो मजबूत नेताओं को चुना है, या सरल समाधान पेश करने वाले नेताओं को चुना है। यही हाल स्थानीय स्तर पर भी रहा है। हाल के वर्षों में विभाजित जनादेश नहीं देखा गया है।

इस परिदृश्य में निर्वाचित नेता आसानी से यह विश्वास कर सकते हैं कि मतदाताओं ने उन्हें अपनी सोच के अनुसार काम करने की पूर्ण सहमति दे दी है, और इसमें विचार-विमर्श की कोई आवश्यकता नहीं है। कृषि सुधार कानून के मामले में भी यही हुआ है। ये किसानों के लिए जरूरी थे, लेकिन चूंकि इसमें उनको भाग लेने का अवसर नहीं दिया गया, तो वे अब सड़कों पर उतर आए हैं।

लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी केवल एक दिन तक सीमित नहीं रह सकती है। इसमें नियमित जुड़ाव होना चाहिए। न्यायाधीश रमन्ना कदाचित इसी ओर इशारा कर रहे थे। इस प्रकार के नियमित लोकतंत्र का उस समाज में अस्तित्व कहाँ रह सकता है, जहाँ विपक्षी दल नाममात्र का हो। ऐसे में आम सहमति बनाने का मतलब घातक देरी हो सकती है, जो देश को महंगी पड़ सकती है। न्यायपालिका अक्सर संविधान को बनाए रखने से कहीं आगे के मुद्दों पर सामने आकर एक जटिल कारक बन जाती है। 2 जी और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटालों में न्यायिक निर्णयों की नकारात्मकता से निकलने में हमें एक दशक से ज्यादा लग गया।

परिणामतः ,आज राफेल से सेंट्रल विस्टा तक हर सौदे, हर परियोजना को जनहित याचिका का उपयोग करके कानूनी घेराबंदी में बांधने का प्रयास किया जा रहा है। यह अलग बात है कि ऐसा यह कभी-कभी निहित स्वार्थों से प्रेरित भी होता है।

दूसरी ओर, न्यायपालिका व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव वाले मामलों में निर्णय देने में धीमी रही है। रामजन्म भूमि मामले में इलाहबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद अंतिम फैसला सुनाने में उच्चतम न्यायालय को नौ साल क्यों लग गए ? यह सीएए , सबरीमाला आदि अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में तेजी लाने से क्यों कतराता रहा है ?

कार्यपालिका के क्षेत्र में आने वाले मामलों में न्यायपालिका की घुसपैठ भी उतनी ही संदिग्ध है। वैक्सीन मूल्य निर्धारण नीति, ऑक्सीजन सिलेंडर के आवंटन की विधि आदि अनेक ऐसे मामले है, जिनमें न्यायपालिका का दखल ठीक नहीं था। अपने आप को लोगों के अधिकारों के चैंपियन के रूप में चिह्नित करना एक बात है, लेकिन अनजाने में लोकतंत्र के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए आगे बढना, कितना उचित है ? स्वतंत्रता का अधिकार केवल न्यायपालिका के लिए आरक्षित नहीं है।

न्यायपालिका की ऐसी कार्यप्रणाली कहीं से भी न्यायाधीश रमन्ना द्वारा व्यक्त भावनाओं और विचारों का अनुसरण करती नहीं लगती है। उनके विचार एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र के निर्माण के लिए ठोस सिद्धांतों के रूप में खड़े हैं। शेक्सपियर के जूलियस सीजर का एक कथन यहाँ सटीक बैठता है। इस कथानक में रोमन रईस कैसियस ब्रूटस से कहता है, ‘प्रिय ब्रूटस, दोष हमारे सितारों में नहीं है, बल्कि अपने आप में है कि हम अधीनस्थ हैं।’

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित आर जगन्नाथ के लेख पर आधारित। 2 जुलाई, 2021

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