
पहाड़ों पर पर्यटकों की संख्या पर नियंत्रण हो
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हाल ही में अमरनाथ यात्रा के दौरान बादल फटने की घातक घटना, पहाड़ों में प्रकृति के खतरों की दुखद याद दिलाती है। तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या पहाडों की प्रकृति के प्रतिकूल है। वहाँ की पारिस्थितिकी इस दबाव को सहन नहीं कर पा रही है।
दूसरे, इन विपरीत स्थितियों में अमरनाथ यात्रा को लेकर किए गए अधिकारियों के व्यवस्था संबंधी दावे भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।
- अधिकारियों ने कहा था कि इस यात्रा की व्यवस्था, कुंभ मेले की तरह ही सुचारू रूप से की गई है। यहाँ वे यह भूल गए कि इस यात्रा का क्षेत्र समुद्रतल से 3,880 मीटर ऊपर एक ग्लेशियर डॉटेड क्षेत्र है, जबकि प्रयागराज समुद्रतल से मात्र 90 मीटर ऊपर है।
- पहाड़ों में स्थित आईएमडी के स्वचालित मौसम स्टेशन, इस दूरस्थ क्षेत्र में अत्यधिक तीव्र स्थानीय वर्षा को जानने में असमर्थ रहे।
- रिपोर्टों में कहा गया है कि जो तंबू बह गए थे, उन्हें एक सूखी नदी के तल में बनाया गया था, जिनमें बाढ़ का खतरा पहले से था।
- 1996 में बर्फीले तूफान और खराब मौसम के बाद 243 अमरनाथ तीर्थयात्रियों के मारे जाने के बाद गठित नीतिश सेनगुप्ता समिति ने एक दिन में यात्रियों की अधिकतम सीमा 3,000 रखने का सुझाव दिया था। अधिकारियों ने कुल 8 लाख यात्रियों का अनुमान लगाया था। सभी इस मौसम में आए। इसका अर्थ है कि एक दिन में 18,605 यात्री पहुँचे।
हर गर्मियों में यही कहानी दोहरायी जाती है। पहाड़ों की पर्यटन क्षमता से कहीं अधिक भार पड़ने पर अपूर्णीय क्षति होती है। अतः भारत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पर्यटन केंद्रों में आंगतुकों के प्रवाह का शोध आधारित विनियमन अनिवार्य है। इसे निषेधन न समझकर संरक्षण समझा जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12 जुलाई, 2022