क्या कलात्मक अभिव्यक्ति को रोकना सही है?

Afeias
12 Mar 2026
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हाल ही में एक फिल्म के नाम पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने आपत्ति जताते हुए एफआईआर दर्ज की है। उनका आरोप है कि यह नाम धार्मिक या जातिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।

अभिव्यक्ति पर कानून क्या कहता है –

  • अनुच्छेद 19(1)(ए) बोलने की आजादी की रक्षा करता है।
  • अनुच्छेद 19(2) में वे प्रावधान हैं, जिनसे सरकार इस पर रोक लगा सकती है।
  • न्यायालयों ने ऐसी बातों को अलग किया है, एक वे जो गलत हैं, और दूसरी वे, जो हिंसा या अशांति फैला सकती हैं।

सरकार की मनमानी –

इस मामले में मुख्यमंत्री का एफआईआर फाईल करना आपराधिक कानून की आड़ लेकर धमकी देने जैसा है, क्योंकि सरकार सार्वजनिक बहस से डरती है, और इस मुद्दे को अनुशासनहीनता में बदलना चाहती है। कला के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने का यह मामला नया नहीं है। पहले भी पश्चिम बंगाल ने ‘द केरल स्टोरी’ को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर रोका था। हाल ही में केंद्र ने बीबीसी को ‘इंडिया – द मोदी क्वेश्चन’ के लिंक हटाने का निर्देश दिया था।

कितना सही?

विविधतापूर्ण समाज में भावनाओं के आहत होने के आधार पर कलात्मक अभिव्यक्ति पर आपराधिक प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि समय के साथ विचारों का गुलदस्ता मुरझा जाता है। इसकी रक्षा के लिए सरकार का दायित्व है कि लोगों को अपनी बात कहने की छूट देते हुए, सार्वजनिक अनुशासन बनाए रखने का प्रयत्न करे।

‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 फरवरी, 2026