केवल नारे से बेटियां नहीं बचेंगी

Afeias
22 May 2026
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हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक भाषण में वर्षों से देश में चली आ रही कन्‍या भ्रूण हत्‍या जैसी बुराई पर फिर से सबका ध्‍यान खींचा है। दुखद है कि तमाम प्रयासों के बाद भी यह विकृति 21वीं सदी में चलती चली जा रही है। इससे जुड़े कुछ बिंदु –

– कन्‍या भ्रूण हत्‍या का डेटा मुख्‍य रूप से दो संकेतकों के जरिए जाना जाता है। पहला, जन्‍म के समय लिंगानुपात और दूसरा, राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्डस ब्‍यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट।

  • हाल के डेटा से पता चलता है कि 2024-25 में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्‍या 929-930 होगी। एक दशक पहले यह 918 थी।
  • वास्‍तविक वातावरण और दर्ज अपराधों के बीच बड़ा अंतर बताता है कि इस अपराध का पंजीकरण ही बहुत कम होता है।
  • झारखंड और बिहार में जन्‍म के समय लिंगानुपात में सबसे ज्‍यादा कमी दिखती है। यह क्रमश: 899 और 900 है। इसके विपरीत, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान में अनुपात में सुधार हुआ है।
  • इस अपराध को खत्‍म करने के लिए सिर्फ कड़े कानून और 1994 के भ्रूण लिंग जांच कानून से कहीं ज्‍यादा की जरुरत है। मूलत: सामाजिक बदलाव की जरुरत है। लड़की के जन्‍म को बोझ न मानकर उस पर उत्‍सव मनाना, उन्‍हें पढ़ाना, घर के आर्थिक मामलों में उनकी राय लेना आदि कुछ ऐसे कदम हैं, जो कन्‍या भ्रूण को बचाने में मदद कर सकते हैं।
  • सरकार को भी पोर्टेबल डिटेक्‍शन टूल्‍स और अल्‍ट्रासाउंड सुविधाओं के गलत इस्‍तेमाल को रोकने के लिए सक्रिय मार्ग अपनाने होंगे। डॉक्‍टरों को उनकी नैतिक जिम्‍मेदारी की गहराई के साथ महसूस कराया जाना चाहिए।

(द इकॉनॉमिक टाइम्‍समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-22/04/26)