गृहिणियों का आर्थिक योगदान कहाँ है?

Afeias
02 Jul 2026
A+ A-

To Download Click Here.

हमारे देश में गृहिणियों का श्रम केवल परिवार की नहीं, बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था की नींव है। लेकिन इनके काम का मूल्य नहीं समझा जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने सड़क दुर्घटना में मृत गृहिणी के मामले में मुआवजा बढ़ाते हुए गृहणियों को ‘राष्ट्र निर्माता‘ कहा है। न्यायालय ने माना है कि घर के भीतर महिलाओं का काम आर्थिक महत्व रखता है। लेकिन अगर इसे अर्थव्यवस्था में श्रम बाजार की दृष्टि से देखें तो –

  • अवैतनिक घरेलू श्रम को काम नहीं माना जाता है। सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान गिना नहीं जाता है।
  • घरेलू श्रम से जुड़ी लैंगिक असमानता आर्थिक विकास में एक बड़ी बाधा है। इससे जुड़े कुछ आंकड़े –
    • 2011 की जनगणना में 15.99 करोड़ महिलाओं का मुख्य काम घरेलू था।
    • एनएसओ टाइम सर्वे 2019 के अनुसार महिलाएं प्रतिदिन 299 मिनट घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरूष सिर्फ 97 मिनट।
  • यदि जीडीपी में महिलाओं के घरेलू श्रम को जोड़ दें, तो उसमे उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
  • न्यायालय ने इस मामले से पूर्व भी अरूण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी मामले में गृहिणी के योगदान को अमूल्य बताया था।
  • हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 39(डी) (समान कार्य के लिए समान वेतन), और अनुच्छेद 42 (मानवीय कार्य दशाएं और मातृत्व सहायता) में भी स्त्री के श्रम को पुरूष के समकक्ष माने जाने के लिए कई प्रावधान दिए गए हैं।
  • इस मामले में चुनौतियां यह है कि घरेलू श्रम कार्य के घंटे अलग-अलग होते हैं। फिर काम की गुणवत्ता मापना भी कठिन है। फिर भावनात्मक श्रम की स्थिति तो तय की ही नहीं जा सकती है।
  • यदि मृत्यु के बाद गृहिणी को मुआवजा देने के बजाय सरकार नीति निर्माण में घरेलू श्रम को शामिल करे, तो कुछ बात बन सकती है। इससे गृहिणी को आर्थिक और कानूनी अधिकार मिलेंगे। कम-से-कम तलाक या अलगाव की स्थिति में पत्नी को संयुक्त संपत्ति में उचित हिस्सा मिलना चाहिए, जिससे वह अपना जीवनयापन कर सके।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 जून, 2026