ग्रेट निकोबार से जुड़े दांव-पेंच
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ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट परियोजना को अभी तक एक ऐसे प्रस्तावित कार्यक्रम के रूप में जाना जा रहा है, जिसका राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से गहरा संबंध है। वास्तव में यह तथ्य बहुत ही कमजोर रणनीतिक रिकॉर्ड पर टिका हुआ है –
- वास्तविकता यह है कि केन्द्र सरकार लंबे समय से अपने मुख्य आकर्षण गैलेथिया बे में एक अत्याधुनिक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह के महत्व की बात कहकर पारिस्थिकीय स्वीकृति की जानकारी छिपाती रही है।
- वित्त मंत्रालय के एक निकाय, पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड ने अगस्त 2024 में पाया कि इस बंदरगाह को बनाने के पीछे रणनीतिक उद्देश्य नहीं था। यह एक दिखावे के लिए कही गई बात थी।
- इन्वेस्टमेंट बोर्ड और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी दोनों ने प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी थी। लेकिन कमेटी ने वायबिलिटी गैप फंडिंग में 12,230 करोड़ रुपये देने से मना कर दिया। उसका कहना था कि मंत्रालय स्वयं यह राशि जुटाए। यह बंदरगाह के व्यावसायिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए कहा गया था। साथ ही, यह भी कहा गया कि अगर बंदरगाह का असली उद्देश्य सैन्य है, तो ट्रांसशिपमेंट हब का मामला खत्म ही हो जाता है।
- इस द्वीप का पारिस्थिकीय महत्व बहुत अधिक है।
- यहाँ के निवासियों का भी कहना है कि उन्हें पूरी जानकारी दिए बिना ही स्वीकृति ले ली गई है। उनका यह भी कहना है कि 2004 की सुनामी के बाद पुरखों और पुनर्वास का वादा पूरा किया जाए।
- उनका विरोध पूरी योजना से नहीं है। योजना में पारदर्शिता उनकी मांग है। साथ ही उतना भी बदलाव किया जाए, जितना कि द्वीप झेल सकता है।
अब केन्द्र की जिम्मेदारी है कि वह योजना से जुड़ी उच्च स्तरीय समिति की पूरी रिपोर्ट जारी करे। सरकारी खजाने से होने वाले असली खर्च का खुले तौर पर हिसाब दे, और इसकी पारिस्थिकीय से होने वाले उस नुकसान से तुलना करके देखे, जिसकी भरपाई सरकारी खजाना कभी नहीं कर सकता।
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 09/06/2026)