फुटपाथ और नागरिक गरिमा: सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण संदेश

Afeias
21 Jul 2026
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किसी शहर की वास्तविक पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर पैदल यात्री के लिए कितना सुरक्षित है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।

मुख्य मुद्दा

सर्वोच्च न्यायालय ने फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(डी) (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं गरिमा का अधिकार) से जुड़ा मौलिक अधिकार माना।

भारत के अधिकांश शहरों में फुटपाथ अतिक्रमण, खराब रखरखाव और अपर्याप्त योजना के कारण उपयोग योग्य नहीं हैं।

प्रमुख कारण

  • दुकानों, रेहड़ी-पटरी और वाहनों द्वारा अतिक्रमण।
  • टूटी हुई या अनुपस्थित फुटपाथ।
  • शहरी नियोजन में पैदल यात्रियों की उपेक्षा।
  • नगर निकायों की कमजोर जवाबदेही, तथा
  • निजी वाहनों को प्राथमिकता देने वाली विकास नीति।

प्रभाव

  • सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि।
  • बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगों की सुरक्षा पर खतरा।
  • प्रदूषण और ट्रैफिक जाम में वृद्धि, क्योंकि लोग पैदल चलने से बचते हैं, तथा
  • समानता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हनन।

सरकारी पहल

  • स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पैदल और साइकिल-अनुकूल सड़कों का विकास।
  • शहरी विकास मंत्रालय की स्ट्रीट्स फॉर पीपल चैलेंज (2020)।
  • नॉन-मोटराइज्ड नीति के माध्यम से पैदल एवं साइकिल यातायात को बढ़ावा।
  • एएमआरयूटी ‘अमृत योजना’ के तहत शहरी आधारभूत ढाँचे का सुधार, तथा
  • इंडियन रोड कांग्रेस के दिशा-निर्देश (IRC-103) में सुरक्षित एवं बाधारहित फुटपाथों के मानक निर्धारित।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का महत्व

  • सुरक्षित फुटपाथ को केवल सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता।
  • केंद्र एवं राज्यों से पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा हेतु कानून बनाने का आग्रह, तथा
  • सड़क सुरक्षा और समावेशी शहरी विकास को संवैधानिक आधार प्रदान किया।

आगे की राह

  • “कम्प्लीट स्ट्रीट” मॉडल को सभी शहरों में लागू किया जाए।
  • अतिक्रमण हटाने के लिए नियमित अभियान और कड़ा प्रवर्तन।
  • दिव्यांग-अनुकूल फुटपाथ बनाए जाएँ।
  • नगर निकायों के लिए जवाबदेही और समयबद्ध रखरखाव व्यवस्था सुनिश्चित हो।
  • शहरी परियोजनाओं में “पैदल यात्री प्रथम” सिद्धांत अपनाया जाए, तथा
  • नागरिक सहभागिता और सामाजिक जागरूकता बढ़ाई जाए।

यदि भारत वास्तव में “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य हासिल करना चाहता है, तो विकास का पैमाना केवल एक्सप्रेसवे और फ्लाईओवर नहीं, बल्कि सुरक्षित, सुलभ और गरिमापूर्ण फुटपाथ भी होने चाहिए। यही समावेशी एवं मानव-केंद्रित शहरी विकास की पहचान है।

द इकोनॉमिक टाइम्समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22/06/26

नोट: – यह लेख यूपीएससी-जीएस 2 (शासन, संविधान), जीएस-3 (शहरी विकास एवं अवसंरचना), जीएस-4 (नैतिकता एवं नागरिक उत्तरदायित्व) तथा निबंध के लिए अत्यंत उपयोगी है।