अरावली पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तथा एक पूर्व समिति की रिपोर्ट

Afeias
21 Feb 2026
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अरावली पर्वत श्रृंखला –

यह श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली है। अरावली एक प्राचीन भू-वैज्ञानिक, जल-चक्र और पारिस्थितिकी प्रणाली है, जो उत्तर-पश्चिमी भारत में जलस्त्रोत, मरुस्थलीकरण नियंत्रण और स्थानीय जीवन को बनाए रखती है।

अरावली पर्वतमाला पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय –

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों को ही अरावली मानने की मंजूरी दी थी। इस निर्णय पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाते हुए इसे लागू करने से पहले वैज्ञानिक, पर्यावरणीय व कानूनी समीक्षा आवश्यक बताई है। अदालत ने परिभाषा, खनन नियम, संरक्षित क्षेत्र और पारिस्थितिकीय निरंतरता से जुड़े सभी मुद्दों के विस्तृत अध्ययन के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का सुझाव दिया है। अदालत का पहला निर्णय अस्पष्ट भी था। साथ ही अरावली पर अधिक दबाव बढ़ाने वाला भी।

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश तथा पूर्व की एक समिति के प्रावधान –

  • अरावली परिदृश्य में ढलान और ऊंचाई व्यापक रूप से बदलती रहती हैं। समिति के अनुसार 34 में से 23 जिलों में ढलान 6 डिग्री से भी कम है। रिपोर्ट के अनुसार केवल ढाल और ऊँचाई को मानदंड बनाना विसंगति बढ़ाएगा। फिर भी ऐसा आदेश दिया गया था, जिसमें 100 मी. से ज्यादा को ही अरावली माना जाएगा।
  • अरावली जिलों में औसत ऊँचाई कुछ क्षेत्रों में 100-200 मीटर है। केवल एक जिले में 600 मीटर है। इतनी विविधता में एक समान सीमा लागू करना, भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण और सर्वे ऑफ इंडिया के भी प्रावधानों के विरुद्ध है।
  • इसी प्रकार 500 मीटर ‘रेंज कनेक्टिविटी नियम’ भी चिंताजनक था। इसके अनुसार दो या अधिक पहाड़ियाँ यदि 500 मीटर के भीतर हों, तो उन्हें एक अरावली रेंज माना जाएगा।
  • समिति ने अरावली क्षेत्रों में महत्वपूर्ण खनिजों के खनन की अनुमति का प्रावधान सुझाया था, जो सबसे नाजुक कोर क्षेत्रों में खनन का दरवाजा खोल देता।

भविष्य में क्या करना चाहिए –

  • अरावली के लिए अल्पकालिक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि स्थायी एवं वैज्ञानिक समाधान की आवश्यकता है।
  • पर्यावरणविद एक राष्ट्रीय अरावली विकास प्राधिकरण की स्थापना की सिफारिश कर रहे हैं।
  • पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे रिज टॉप, वनाच्छादित पहाड़ियां और वन्यजीव कॉरिडोर में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।
  • अरावली के स्थाई कानून को मान्यता मिलनी चाहिए। चाहे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 में या प्राचीन पर्वत विरासत की अलग श्रेणी बनाकर।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने प्रशासनिक उत्तरदायित्व और न्यायिक विवेक के साथ हमें पुनर्मूल्यांकन का अवसर भी दिया है।

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