बीमार चिकित्सा शिक्षा

Afeias
18 Aug 2026
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हाल ही में एनईईटी या नीट परीक्षा में हुई अनियमितता ने भारत में चिकित्सा शिक्षा की गहरी संरचनात्मक समस्याओं की ओर ध्यान खींचा है। केवल नीट परीक्षा की पारदर्शिता ही नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्ता, अत्यधिक फीस, कमजोर बुनियादी ढाँचा, कोचिंग संस्कृति और डॉक्टरों की असमान उपलब्धता जैसी समस्याएँ पूरे तंत्र को प्रभावित कर रही हैं।

मुख्य तर्क –

  1. वास्तविक संकट मेडिकल शिक्षा की संरचना में है –

प्रवेश परीक्षा की निष्पक्षता पर्याप्त नहीं है, यदि मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्ता ही कमजोर हो।

  1. निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस बहुत ज्यादा –
  • निजी कॉलेजों में एमबीबीएस की फीस सामान्यतः ₹45–55 लाख तक पहुँचती है।
  • एनआरआई सीटों पर यह ₹1.4 करोड़ तक हो सकती है।
  • इसके विपरीत रूस, यूक्रेन और चीन जैसे देशों में पूरा एमबीबीएस लगभग ₹35 लाख में पूरा हो जाता है।

परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी छात्र चिकित्सा शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

  1. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आधारभूत सुविधाओं की कमी –
  • कई सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अस्पताल, प्रयोगशालाएँ, उपकरण और फैकल्टी की कमी बनी हुई है।
  • निजी कॉलेजों में “घोस्ट फैकल्टी” (केवल कागजों पर मौजूद शिक्षक) जैसी समस्याएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
  1. एमबीबीएस शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न –
  • नीट-पीजी में इस वर्ष क्वालिफाइंग कट-ऑफ शून्य करना पड़ा।
  • यह दर्शाता है कि अनेक एमबीबीएस स्नातकों की बुनियादी चिकित्सा शिक्षा अपेक्षित स्तर की नहीं है।
  • इससे भविष्य के विशेषज्ञ डॉक्टरों की गुणवत्ता पर भी प्रश्न उठते हैं।
  1. मेरिट बनाम आर्थिक क्षमता –

कम कट-ऑफ का लाभ अक्सर उन छात्रों को मिलता है, जो महँगी फीस चुका सकते हैं। इससे वास्तविक योग्यता का महत्व कम हो जाता है।

  1. डॉक्टरों की कमी का असमान वितरण –
  • भारत में डॉक्टरों की कुल संख्या से अधिक समस्या उनके ग्रामीण-शहरी असमान वितरण की है।
  • अधिकांश डॉक्टर शहरों में कार्य करना चाहते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भारी कमी बनी रहती है।

समाधान –

  • सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाई जाए।
  • निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस पर प्रभावी नियमन हो।
  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा नियमित एवं कड़े गुणवत्ता निरीक्षण किए जाएँ।
  • फैकल्टी और अस्पतालों के डिजिटल सत्यापन की व्यवस्था हो।
  • ग्रामीण सेवा हेतु प्रोत्साहन, बेहतर वेतन और बुनियादी सुविधाएँ दी जाएँ।
  • नीट के साथ राज्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक विकेंद्रीकृत प्रवेश एवं मानव संसाधन योजना पर विचार किया जाए।

मेडिकल शिक्षा में सुधार के बिना सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं, ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन होगा।

द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 20/07/26