भारत में अंग्रेज़ी का स्थान: पहचान और सांस्कृतिक समावेशन
To Download Click Here.

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में अंग्रेज़ी को भारत की एक “स्वदेशी” भाषा जैसा दर्जा मिलने की बात कही है। लेख का तर्क है कि अंग्रेज़ी अब केवल ब्रिटेन की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय समाज, प्रशासन, शिक्षा, न्यायपालिका और व्यवसाय का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
मुख्य तर्क –
- अंग्रेज़ी का भारतीयकरण – अंग्रेज़ी भारत में औपनिवेशिक शासन के साथ आई, लेकिन आज भारतीयों ने इसे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल लिया है। “इंडियन इंग्लिश” अब वैश्विक स्तर पर अंग्रेज़ी की वैसी ही एक मान्य शैली है, जैसे कि अमेरिकी इंग्लिश या ब्रिटिश इंग्लिश।
- भाषा का स्वामित्व उसके उपयोग से तय होता है। कोई भाषा केवल उसके जन्मस्थान की नहीं रहती। जिस समाज में वह व्यापक रूप से अपनाई जाती है, वहाँ वह उस समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती है। जिस प्रकार भोजन विभिन्न देशों में जाकर स्थानीय रूप लेता है, उसी प्रकार भाषाएँ भी स्थानीय संस्कृति में रच-बस जाती हैं।
- अंग्रेज़ी की शक्ति उसकी लचीलेपन में है। अंग्रेज़ी लगातार अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करती रही है। भारतीय अंग्रेज़ी में “प्रीपोन”, “गोडाउन”, “चार्जशीट” जैसे अनेक शब्द सामान्य हो चुके हैं। यही अनुकूलन-क्षमता अंग्रेज़ी को वैश्विक भाषा बनाती है।
- अंग्रेज़ी अब औपनिवेशिक प्रतीक नहीं है, बल्कि आज वह अवसर, ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संपर्क की भाषा है। इसे केवल उपनिवेशवाद से जोड़कर देखना आज के संदर्भ में उचित नहीं है।
महत्व –
- शिक्षा और उच्च शिक्षा की प्रमुख भाषा।
- न्यायपालिका और प्रशासन में व्यापक उपयोग।
- आईटी, स्टार्टअप और वैश्विक व्यापार की कार्यभाषा।
- भारत की भाषाई विविधता के बीच संपर्क भाषा का कार्य।
विपरीत पक्ष –
- अंग्रेज़ी का अत्यधिक प्रभुत्व भारतीय भाषाओं के विकास को प्रभावित कर सकता है।
- गुणवत्तापूर्ण अंग्रेज़ी शिक्षा तक असमान पहुँच सामाजिक असमानता बढ़ाती है।
- ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों के बीच अवसरों का अंतर पैदा होता है।
- मातृभाषा आधारित प्रारंभिक शिक्षा को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
संपादकीय का मूल संदेश है कि भाषाएँ स्थिर नहीं होतीं, बल्कि समाज के साथ विकसित होती हैं। अंग्रेज़ी भारत में केवल विदेशी भाषा नहीं रह गई है। भारतीय समाज ने इसे अपनी आवश्यकताओं और संस्कृति के अनुरूप आत्मसात कर लिया है। इसलिए इसे औपनिवेशिक विरासत के बजाय भारतीय बहुभाषिकता के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को समान महत्व देना आवश्यक है।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (16/07/26)