कमजोर मानसून में फसल विविधीकरण की जरूरत

Afeias
12 Aug 2026
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इस वर्ष के कमजोर मानसून की स्थिति में सरकार को किसानों को कम पानी वाली फसलों; दालें, तिलहन और मोटे अनाज की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। इन फसलों का रकबा घट गया है, जबकि सबसे अधिक पानी मांगने वाली गन्ने की खेती बढ़ गई है। यह खाद्य सुरक्षा, पोषण, जल संरक्षण और आयात निर्भरता के लिए चिंता का विषय है।

कुछ बिंदु –

  1. कमजोर मानसून और वर्षा आधारित कृषि –
  • अप्रैल से ही कमजोर मानसून की संभावना थी।
  • भारत का लगभग 45% शुद्ध बोया गया क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है।
  • इसलिए सूखा-सहिष्णु फसलों को बढ़ावा देना आवश्यक था।
  1. दाल, तिलहन और मोटे अनाज का घटता रकबा –

सरकारी आँकड़ों के अनुसार —

  • दालों का रकबा 23% घटा।
  • मोटे अनाज का रकबा 22% घटा।
  • तिलहन का रकबा 21% घटा।

यह भविष्य में उत्पादन और उपलब्धता को प्रभावित करेगा।

  1. खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर असर –
  • दालें भारतीय भोजन में प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं।
  • दालें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके उर्वरता बढ़ाती हैं।
  • भारत सामान्य वर्षों में भी लगभग 20% दालों का आयात करता है।
  • खाद्य तेलों की लगभग 55% आवश्यकता आयात से पूरी होती है।
  • उत्पादन घटने पर आयात बिल और खाद्य महँगाई दोनों बढ़ेंगे।
  1. गन्ने की खेती क्यों बढ़ रही है?

गन्ना अत्यधिक पानी की मांग करता है, फिर भी उसका रकबा बढ़ा क्योंकि —

  • 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) नीति के कारण गन्ने की मांग बढ़ी।
  • गन्ना किसानों को अधिक लाभ देता है।
  • किसान सरकारी मिशनों की तुलना में अधिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं।
  1. सरकारी नीति में विरोधाभास –
  • सरकार एक ओर दाल, तिलहन और मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ाने के मिशन चला रही है।
  • दूसरी ओर एथेनॉल नीति गन्ने की खेती को अधिक लाभदायक बना रही है।
  • परिणामस्वरूप किसान नकदी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

समस्या का विश्लेषण –

  1. आर्थिक
  • दाल एवं खाद्य तेलों का आयात बढ़ेगा।
  • विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा।
  • खाद्य महँगाई बढ़ सकती है।
  1. पर्यावरणीय
  • गन्ने से भूजल का अत्यधिक दोहन होगा।
  • जल संकट और बढ़ेगा।
  • जलवायु परिवर्तन के दौर में यह टिकाऊ कृषि नहीं है।
  1. सामाजिक
  • गरीब परिवारों के लिए प्रोटीन महँगा होगा।
  • कुपोषण की समस्या बढ़ सकती है।

सरकार को क्या करना चाहिए? –

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद के माध्यम से दाल, तिलहन और मोटे अनाज को अधिक आकर्षक बनाया जाए।
  • सूखा-सहिष्णु फसलों के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए जाएँ।
  • फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिले।
  • जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए माइक्रो इरिगेशन को प्रोत्साहित किया जाए।
  • एथेनॉल नीति को इस प्रकार संतुलित किया जाए कि गन्ने पर अत्यधिक निर्भरता न बढ़े।

कुल मिलाकर, यदि मूल्य समर्थन, खरीद नीति और एथेनॉल नीति में संतुलन स्थापित किया जाए, तो भारत खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, किसानों की आय और जल संरक्षण—तीनों उद्देश्यों को साथ लेकर आगे बढ़ सकता है। यही टिकाऊ और जलवायु-स्मार्ट कृषि की दिशा होगी।

द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (16/07/26)