असहमति का सम्मान: लोकतंत्र की असली पहचान

Afeias
29 Jul 2026
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कतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है असहमति का अधिकार। लोकतंत्र केवल हर पाँच वर्ष में मतदान करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि नागरिकों को सरकार की नीतियों और निर्णयों पर किसी भी समय प्रश्न उठाने, आलोचना करने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने का अधिकार भी देता है।

यदि नागरिकों की असहमति को दबा दिया जाए, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।

कुछ प्रमुख बिंदु –

  1. असहमति का संवैधानिक आधार –
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
  • इसी स्वतंत्रता से शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार भी जुड़ा हुआ है।
  • हालाँकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा, नैतिकता आदि के हित में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • फिर भी, इन प्रतिबंधों का उपयोग नागरिकों की वैध असहमति को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  1. न्यायपालिका का दृष्टिकोण –
  • न्यायाधीश जामदार की हालिया टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एक नागरिक के विरुद्ध जारी “एक्सटर्नमेंट” (Externment) आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट कहा कि केवल सरकारी निर्णय का विरोध करना किसी व्यक्ति को दंडित करने का आधार नहीं हो सकता। यदि विरोध को ही अपराध मान लिया जाए, तो लोकतंत्र नागरिकों की स्वतंत्रता खो देगा।
  1. भारत की लोकतांत्रिक परंपरा –
  • भारत का स्वतंत्रता संग्राम स्वयं शांतिपूर्ण जनआंदोलनों की शक्ति का उदाहरण है।
  • महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह, असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों ने बिना हिंसा के ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
  • इसलिए भारत में शांतिपूर्ण विरोध केवल संवैधानिक अधिकार ही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विरासत भी है।
  1. शोध क्या कहते हैं? –

दुनिया भर के शोध भी यह सिद्ध करते हैं कि अहिंसक आंदोलनों की सफलता की संभावना अधिक होती है।

एरिका चेनेवेथ (Erica Chenoweth) के शोध के अनुसार —

  • अहिंसक आंदोलन हिंसक आंदोलनों की तुलना में लगभग दो गुना अधिक सफल होते हैं।
  • इतिहास में ऐसा कोई शांतिपूर्ण आंदोलन, जिसे जनसंख्या के लगभग 3.5% लोगों का समर्थन मिला हो, विफल नहीं हुआ।
  1. लोकतंत्र का “सेफ्टी वाल्व” –

भारत में —

  • धरना,
  • मोर्चा,
  • पदयात्रा,
  • सत्याग्रह, तथा
  • जनसभाएँ, आदि

लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा रही हैं। ये सरकार और जनता के बीच संवाद का माध्यम हैं तथा सामाजिक असंतोष को हिंसा में बदलने से रोकते हैं। इसलिए इन्हें लोकतंत्र का “सेफ्टी वाल्व” भी कहा जाता है।

चुनौतियाँ –

  • विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस द्वारा कठोर कार्रवाई।
  • धारा 144 तथा अन्य कानूनी प्रावधानों का कभी-कभी अत्यधिक उपयोग।
  • असहमति को राष्ट्र-विरोध या कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति।
  • सभी राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता में आने पर विरोध के प्रति समान असहिष्णुता।

आगे की राह –

  • शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • पुलिस प्रशासन राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होकर निष्पक्ष रूप से कार्य करे।
  • सरकार और नागरिक समाज के बीच नियमित संवाद स्थापित किया जाए।
  • हिंसक और अहिंसक विरोध के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए केवल हिंसा पर कठोर कार्रवाई की जाए।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत किया जाए।

लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि अल्पमत और असहमति के सम्मान का भी नाम है। शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार ही नहीं, बल्कि शासन को उत्तरदायी बनाए रखने का प्रभावी माध्यम भी है। जिस समाज में असहमति को सम्मान मिलता है, वहीं लोकतंत्र वास्तव में मजबूत और जीवंत बना रहता है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 04/07/26