तीसरी भाषा को वैकल्पिक रखा जाना चाहिए
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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पाठ्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 9 में तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने पर चिंता जताई है। न्यायालय का मानना है कि यह व्यावहारिक नहीं है और इससे विद्यार्थियों तथा विद्यालयों पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है। इसलिए ऐसी नीति को सत्र के बीच में लागू नहीं किया जाना चाहिए। तीसरी भाषा सीखना वैकल्पिक होना चाहिए, और इसका निर्णय विद्यालयों की क्षमता तथा विद्यार्थियों की रुचि के आधार पर किया जाना चाहिए।
पृष्ठभूमि –
- भारत में त्रि-भाषा सूत्र को वर्ष 1968 में बहुभाषिकता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अंतर्गत विद्यार्थियों को तीन भाषाएँ सीखने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। साथ ही, भाषाओं के चयन में लचीलेपन पर भी बल दिया गया है।
- हाल में सीबीएसई के एक परिपत्र के माध्यम से कक्षा 9 के लिए त्रि-भाषा व्यवस्था को अनिवार्य बनाए जाने की बात सामने आई, जिसके कारण कानूनी और राजनीतिक विवाद उत्पन्न हुए।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विद्यार्थियों और विद्यालयों पर ऐसी नीति लागू करने को लेकर चिंता व्यक्त की।
प्रमुख तर्क –
- तीसरी भाषा अनिवार्य नहीं होनी चाहिए –
- कक्षा 9 में नई भाषा को अनिवार्य करने से विद्यार्थियों का शैक्षणिक बोझ बढ़ सकता है।
- इस स्तर पर विद्यार्थियों को पहले से ही परीक्षाओं और भविष्य की पढ़ाई का दबाव रहता है।
- सत्र के बीच में नई नीति लागू करने से विद्यार्थियों और विद्यालयों की शैक्षणिक योजना प्रभावित हो सकती है।
- अंग्रेजी भारत की संपर्क भाषा बनी हुई है –
- अंग्रेज़ी विभिन्न राज्यों और भाषाई समुदायों के लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य करती है।
- यह उच्च शिक्षा, रोजगार, शोध और वैश्विक संचार के लिए महत्वपूर्ण है।
- अंग्रेज़ी के महत्व को कम करना विद्यार्थियों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
- क्षेत्रीय भाषा भी महत्वपूर्ण है –
- क्षेत्रीय भाषा सीखने से सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय विरासत को मजबूती मिलती है।
- प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा या परिचित भाषा का उपयोग सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकता है।
- प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा को सभी विद्यार्थियों की “मातृभाषा” कहना उचित नहीं है, क्योंकि आधुनिक समाज में प्रवास, बहुभाषी परिवार और विविध जातीय पृष्ठभूमियाँ सामान्य हैं।
- अनिवार्यता के बजाय लचीलापन बेहतर है –
- सभी विद्यालयों में समान संसाधन और पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित भाषा शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।
- विद्यार्थियों की रुचियाँ, क्षमताएँ और करियर के लक्ष्य अलग-अलग होते हैं।
- इसलिए, जहाँ विद्यालयों के पास आवश्यक संसाधन और विद्यार्थियों की पर्याप्त रुचि हो, वहाँ तीसरी भाषा उपलब्ध कराई जा सकती है। इसे सभी पर अनिवार्य रूप से नहीं थोपा जाना चाहिए।
त्रि-भाषा नीति के पक्ष में तर्क –
- बहुभाषिकता और संज्ञानात्मक विकास को बढ़ावा मिलता है।
- राष्ट्रीय एकता और विभिन्न राज्यों के बीच आपसी समझ मजबूत होती है।
- भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन में सहायता मिलती है।
- विद्यार्थियों में विभिन्न संस्कृतियों और साहित्य के प्रति समझ विकसित होती है।
- यह भाषा और शिक्षा से संबंधित संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
आगे की राह –
- उच्च कक्षाओं में तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने से बचा जाना चाहिए।
- विद्यालयों को अपने संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
- अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषा के शिक्षण को मजबूत किया जाना चाहिए।
- तीसरी भाषा को वैकल्पिक विषय या ऐच्छिक पाठ्यक्रम के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है।
- नीति के विस्तार से पहले पर्याप्त संख्या में भाषा शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- भाषा नीति का उद्देश्य शैक्षणिक गुणवत्ता और विद्यार्थियों का समग्र विकास होना चाहिए, न कि राजनीतिक हित।
भारत की भाषाई विविधता उसकी एक बड़ी शक्ति है। इसलिए, भाषा-नीति राजनीतिक दृष्टिकोण के बजाय विद्यार्थी-केंद्रित होनी चाहिए। एक संतुलित नीति भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने में सहायता कर सकती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (17/07/26)