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अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक लक्ष्य लेकर चलना होगा

Afeias
15 Sep 2020
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अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक लक्ष्य लेकर चलना होगा

Date:15-09-20

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वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर चल रहा है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद , 2020-21 वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में 23.9% की तेजी से नीचे गिरा है। पूरे विश्व की अर्थव्यवस्थाएं मौजूदा संकट से निपटने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन पैकेज दे रही हैं।

भारत ने भी अपने जीडीपी का 10% प्रोत्साहन पैकेज के रूप में देने की घोषणा की है। यह पैकेज अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को संभालने के लिए दी जा रही है। इसका दीर्घकालीन स्थिति से संबंध नहीं है।

हमें अल्पकालिक प्रोत्साहन और किसी समाज के सतत विकास हेतु अपनायी जानी वाली दीर्घकालिक रणनीति के बीच के अंतर को समझते हुए कदम उठाने चाहिए।

  • सर्वप्रथम कृषि को धारणीय बनाने पर विचार होना चाहिए। यह हमारे देश की 50% भूमि, 85% जल, रसायन की भारी मात्रा के उपयोग, और 50% जनसंख्या को निम्न आय वाली आजीविका देने के लिए जिम्मेदार है। हमारे देश के समाज के सतत विकास हेतु इसकी केंद्रीय भूमिका है।
  • ऊर्जा क्षेत्र का रूपांतरण किया जाना चाहिए। हम इस दिशा में परिवर्तन के बहुत करीब है। थोड़े से प्रोत्साहन और शोध-अनुसंधान से हम ऊर्जा का एक ऐसा नया ढांचा खड़ा कर सकते हैं, जो नवीनीकृत ऊर्जा , बैटरी स्टोरेज , स्मार्ट ग्रिड और उद्योगों के लिए हाइड्रोजन ईंधन का आधार बनेगा।
  • बुनियादी ढांचों को लचीला बनाएं। सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि से अनेक सड़कें, हवाईअड्डे, इमारतें वगैरह बनाई जाती हैं। अगर हम इन्हें धारणीयता की दृष्टि से ‘ग्रीन’ बनाएं, तो इसके दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं।
  • प्रकृति में निवेश करें। हम प्रतिदिन जलवायु परिवर्तन से आने वाली आपदाओं से जूझ रहे हैं। अगर हम वनोन्मूलन को रोक सकें , तो रेगिस्तान का बढ़ता विस्तार रुक सकता है। मृदा की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। वेटलैंडस और वनों से जलवायु में लचीलेपन के साथ आजीविका के साधन बढ़ सकते हैं।
  • छोटे व स्थानीय व्यापार को बढ़ावा दिया जाए। रोज़गार के अवसर बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला की धारणीयता एवं लचीलेपन के लिए छोटे व स्थानीय व्यापार ही आधार बन सकते हैं।
  • सामाजिक पूँजी और प्रशासन में निवेश बढ़ाया जाए। एक शिक्षित स्वस्थ समाज और प्रशासन में सुधार के बिना किसी भी दीर्घकालिक लक्ष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। अतः इस पर निवेश किया जाना चाहिए।

भारत के पुनर्निर्माण में धन और समय, दोनों की ही आवश्यकता रहेगी। हमें हर चाल इस प्रकार से चलनी होगी कि हम अपने समाज और अर्थव्यवस्था को मनचाहे आकार में ढाल सकें।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित चंद्र भूषण के लेख पर आधारित। 29 अगस्त, 2020

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