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सिविल सेवा परीक्षा: सरल या कठिन

Afeias
17 Jun 2018
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डॉ०विजय अग्रवाल

यदि मैं आपसे पूछूं कि सिविल सर्विस की परीक्षा बड़ी होती है, या छोटी, तो मैं जानता हूँ कि केवल आपका ही नहीं, बल्कि लगभग-लगभग सभी का एक जैसा ही जवाब होगा-‘‘बड़ी’’। हाँ, यदि मैं इस जवाब को सुनने के बाद फिर से यह प्रश्न करूं कि बड़ी क्यों?’ तो इसके उत्तर एक जैसे नहीं होंगे। कुछ तो सोच में भी पड़ जायेंगे कि वे क्या कहें। आइये, इस स्थिति पर थोड़ा विचार करते हैं।

सामान्यतया, जब हम अधिकांशत प्रश्नों के उत्तर देते हैं, तो वे उत्तर हमारी अपनी धारणाओं से निकलकर आते हैं। और मुश्किल यह है कि जिन्हें हम ‘‘मेरी धारणा’’, ‘‘मेरे विचार’ और यहाँ तक कि ‘मेरा अनुभव’ कहते हैं, वे मेरे होते ही नहीं हैं। वे दूसरों के होते हैं। यानी कि समूह के होते हैं, समाज के होते हैं। मैं जीवन भर उन परम्परागत धारणाओं को  ‘अपनी धारणा’ मानने की गलतफहमी में जीता रहता हूँ, जिनमें ‘मैं’ होता ही नहीं है।

अब आप मेरी इस बात को सिविल सर्विस परीक्षा के बारे में ऊपर पूछे गये प्रश्न पर लागू करके सोचिए। आपको कुछ मजेदार तथ्य जानने को मिलेंगे। क्या ऐसा नहीं है कि चूंकि आप शुरू से यही सुनते आये हैं कि ‘‘यह बहुत बड़ी परीक्षा है’’, इसलिए आप भी कहने लगे हैं कि ऐसा ही है। मैं यहाँ उस आम आदमी की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसका इससे कुछ लेना-देना नहीं है। बावजूद इसके उसके दिमाग में इसके बारे में बड़ी होने की बात बैठी हुई है। मेरा संबंध आप जैसे उन युवाओं से है, जो इसके बारे में सोच रहे हैं, खुद जूझ रहे हैं और कुछ जूझने के बाद या तो पार पा गये हैं, या इस दौड़ से बाहर हो गये हैं।

यदि आप कहते हैं कि यह एक बड़ी परीक्षा है, तो क्या आप मुझे इसके बड़े होने का कोई पैमाना बता पायेंगे; जैसे कि-

– इससे मिलने वाली नौकरी सबसे बड़ी होती है।

– इसमें बड़ी संख्या में प्रतियोगी बैठते हैं।

– इसका पाठ्यक्रम बड़ा है।

– इसके पेपर कठिन होते हैं।

– इसमें सफल होना मुश्किल होता है।

– इसकी तैयारी में बहुत लम्बा समय लगता है, आदि-आदि।

मित्रो, आपका उत्तर इनमें से चाहे कोई भी एक हो या कई-कई अथवा सभी हों, उत्तर पूरी तरह सही नहीं है। यदि आप इन एक-एक कारणों पर थोड़ी भी गम्भीरता से विचार करेंगे, तो पायेंगे कि अन्य कई प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ भी स्थितियां कमोवेश ऐसी ही हैं, सिवाय उस पहले बिन्दु के कि ‘इससे मिलने वाली नौकरी सबसे बड़ी होती है। मैं ऐसे युवाओं को जानता हूँ, जिनके लिए मध्यप्रदेश में पटवारी के पद के लिए होने वाली परीक्षा बेहद तनावपूर्ण और सिरदर्द बनी हुई थी। इसकी परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों की संख्या तो इतनी ज्यादा थी कि परीक्षा लेने का सिस्टम ही ढह गया और परीक्षा स्थगित करनी पड़ी। शायद अब आप थोड़ा-थोड़ा समझ रहे होंगे कि दरअसल, मैं कहना क्या चाह रहा हूँ।

मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि ‘समाज के सच’ एवं ‘व्यक्ति के सच’ में बहुत फर्क होता है। कभी-कभी तो ये दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल विरोधी ही हो जाते हैं। इन दोनों को एक मानकर हम सत्य के स्वरूप के साथ अनजाने ही एक अपवित्र समझौता कर लेते हैं। जैसे ही यह होता है, हमारे लिए चुनौती बढ़ जाती है, क्योंकि अब हम सत्य को देख ही नहीं पा रहे हैं। इसे ही कहा जाता है ‘अंधेरे में तलवार भांजना’। आपको दुश्मन दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन आप वार पर वार किये जा रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसा करना अनावश्यक श्रम करना होगा ?

जब हम इस बात का जवाब दे रहे होते हैं कि अमुक सरल है या कठिन, छोटा है या बड़ा, तो वस्तुतः इस जवाब से स्वयं को खारिज कर देते हैं। और यही हमसे भयानक भूल हो जाती है। जबकि इस प्रश्न का सही उत्तर ‘दो की तुलना’ में निहित है। इनमें से एक है, सिविल सर्विस की परीक्षा तथा दूसरा है ‘परीक्षा देने वाला’ यानी कि आप। दुनिया के लिए यह बहुत कठिन परीक्षा हो सकती है। लेकिन आपको देखना यह है कि यह आपके लिए क्या है-सरल या कठिन या इन दोनों के बीच की। ‘आप’ यानी कि आपकी क्षमता, ‘आप’ यानी कि आपका हौसला। परीक्षा और आपके बीच के इस समानुपातिक संबंध को आपको समझना होगा। तभी आप इस परीक्षा की तैयारी के साथ न्याय कर पायेंगे, और खुद के साथ भी।

सच पूछिये तो यहीं पर आकर मैं एक बहुत बड़े पशोपेश या यूं कह लें कि कठिन धर्मसंकट में फँस जाता हूँ। जब मुझे आई.ए.एस. परीक्षा की तैयारी करने वाले स्टूडेन्ट्स को सम्बोधित करना होता है, तो समझ नहीं पाता कि मैं उनसे क्या कहूँ कि यह परीक्षा कठिन है, या कि यह सरल है, या कि यह कि यदि बहुत सरल नहीं है, तो बहुत कठिन भी नहीं है। मैं यदि उनसे ‘‘सरल’’ की बात कहता हूँ, तो मैंने पाया है कि वे तैयारी के प्रति बेहद ढीलाई बरतने लगते हैं। और कठिन बताने पर शुरू करने से पहले ही हथियार डाल देने का खतरा दिखाई देने लगता है। यदि अंतिम बात कहो, तो वह उनके पल्ले ही नहीं पड़ता। उसे वे बरगलाने वाला कथन मान लेते हैं। तो फिर किया क्या जाये? आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं।

संघ लोक सेवा आयोग हर साल अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट निकालता है, जिसमें सिविल सेवा परीक्षा में सफल उम्मीदवारों की विभिन्न पृष्ठभूमियों को आँकड़ों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इस रिपोर्ट में यह उल्लेख मिलता है कि प्रतिवर्ष सफल होने वाले स्टूडेन्ट्स में लगभग 50 प्रतिशत स्टूडेन्ट्स वे होते हैं, जिनकी महाविद्यालयीन डिग्री द्वितीय श्रेणी की है। यहाँ तक कि मेरा एक जूनियर तो थर्ड डिविजनर था। यदि मैं अपनी ही बात करूं, तो यदि मैं अपने एम.ए. के अंकों को किनारे कर दूं, जिसमें फर्स्ट डिविजन लाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होता है, तो आठवीं के अलावा मेरी नइया सेकेंड डिविजन के सहारे ही पार लगी है। मैं अपने साथ के कुछ फर्स्ट डिविजनर्स को जानता हूँ, यहाँ तक कि एक थ्रू आउट टॉपर स्टूडेन्ट को, जो स्टेट सिविल सर्विस भी क्वालीफाई नहीं कर पाई। फिर यह भी तो नहीं है कि सिविल सर्विस में जितने भी टॉपर, परा स्नातक और पीएचडी वाले स्टूडेन्ट्स बैठते हैं, वे सब सेलेक्ट ही हो जाते हैं।

रिजल्ट के ऐसे परिदृश्य में आप ही यह निष्कर्ष निकालें कि यह परीक्षा, जिसे सिविल सेवा परीक्षा के नाम से नहीं, ‘आई.ए.एस. की परीक्षा’ के नाम से जाना जाता है, सरल है या कठिन है।

यदि आप अभी मेरे इस लेख को पढ़ रहे हैं, तो सामान्य तौर पर मेरा यह मानकर चलना गलत नहीं होगा कि आपके मन में कहीं न कहीं इस परीक्षा के प्रति एक आकर्षण एवं जिज्ञासा का भाव बीज रूप में मौजूद है। मान लीजिये कि कुछ समय बाद आप यह फैसला करते हैं कि ‘‘मुझे यह परीक्षा देनी है।’’ पिछले लगभग सात साल के आँकड़े यह बताते हैं कि इस तरह का फैसला करने वाले युवाओं की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि परीक्षा में बैठने का आपका या आपके जैसे लाखों अन्य युवाओं का यह फैसला सही है या नहीं? अब इसकी थोड़ी सी तहकीकात कर लेते हैं।

मैं इस प्रश्न के उत्तर की खोज की शुरूआत स्थापित अपने इस सत्य से करना चाहूंगा कि ‘‘फैसले अपने आपमें न तो सही होते हैं, और न ही गलत। हमें अपने द्वारा लिये गये फैसलों को सही सिद्ध करना पड़ता है।’’ चूंकि सिविल सेवा परीक्षा अत्यंत खुली एवं व्यापक संभावनाओं तथा आशंकाओं को लेकर चलने वाली परीक्षा है, इसलिए इस पर तो यह वक्तव्य और भी अधिक अच्छी तरह लागू होता है। अन्यथा यूपीएससी इसके लिए योग्यताओं की कई-कई ‘धारायें’ लगाकर संभावनाओं की व्यापकता को सीमित कर सकती थी, और ऐसा करना कोई असंवैधानिक या गैर-कानूनी भी नहीं होता। इसका अर्थ यह हुआ कि इस परीक्षा को आयोजित करने वाला संस्थान इस सामान्य एवं सर्वमान्य धारणा को लेकर चल रहा है कि जिस स्टूडेन्ट ने ग्रेजुएशन कर लिया है, फिर चाहे वह किसी भी श्रेणी में क्यों न हो, और यहाँ तक कि किसी भी विषय से हो, उसमें इस प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त करने की संभावना मौजूद है।

कृपया, ध्यान दीजिये। मैं ‘संभावना’ की बात कर रहा हूँ। क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि मेरी ऐसे एक-दो नहीं बल्कि अब तो बहुत से ऐसे स्नातकों से मुलाकात होती है, जो स्नातक तो हैं, लेकिन स्नातक के लायक नहीं हैं। यानी कि कानूनी रूप से उनके पास ग्रेजुएशन की मार्क्सशीट है, सर्टिफिकेट है। लेकिन बात जब गुणवत्ता की आती है, तो उस मार्क्सशीट और उस प्रमाण-पत्र पर संदेह करने के ढेर सारे कारण उपस्थित हो जाते हैं। और यहीं पर आकर यह परीक्षा निःसंदेह रूप से कठिन ही नहीं, बल्कि बहुत ही कठिन हो जाती है। लेकिन असंभव नहीं। संभावना अभी भी शेष है, बशर्ते कि आप अपने उस अत्यंत कष्टप्रद रूपान्तरण के लिए तैयार हों।

माफ कीजिएगा कि अपने इस लेख का अंत मैं आपको दो ‘होम वर्क’ देकर कर रहा हूँ। इनमें-

  • पहला यह कि आप ‘योग्यता और संभावना’ के अंतर पर विचार करें। तथा
  • दूसरा यह कि फिर इस विचार को स्वयं पर लागू करके अब इस प्रश्न का उत्तर ढूँढें कि सिविल सर्विस परीक्षा आपके लिए सरल है या कठिन।

क्रमषः

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